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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

प्रेम एवं सौहार्द के नए रंगों के साथ नूतन वर्ष -2011 की मंगलकामनाएं

नया साल...नया जोश...नई सोच...नई उमंग...नए सपने...आइये इसी सदभावना से नए साल का स्वागत करें !
सुख-समृ्द्धि, शान्ति, प्रेम एवं सौहार्द के नए रंग आपके जीवन में अविरल बहते रहें !!
***नूतन वर्ष -2011 की अनंत मंगलकामनाएं***

चित्र साभार : वेबदुनिया

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

आभास : महेश चंद्र द्विवेदी

दिवस के श्रम से श्लथ थकित
अवनि हो जाती है जब निद्रित
नील-नभ को घेर लेती कालिमा
और नक्षत्र भी सब होते हैं तंद्रित

ऐसे काले कुंतल केश वाली सुंदरि सुमुखि,
सघन तिमिर का रहस्यमय आकाश हो तुम।

ब्रह्मवेला में एक कोकिला बन
चहकती हो देकर चपल चितवन
छा जाती है तव व्रीड़ा पर लालिमा
सलज नयनों से जब देती निमंत्रण

मम हृदय में प्रीति के प्रस्फुटन का सन्देश लाती,
रक्तिम-रवि की प्रथम किरण का प्रकाश हो तुम।

अग्नि बरसाती धरा पर रविकिरन
वायु भी जब करती संतापित बदन
दग्ध धरती और दग्ध जड़-चेतन
पशु-पक्षी सब ढूंढते छाया सधन

मन के इक कोने में जगाकर स्वस्पर्श की कल्पना,
अग्नि-दग्ध इस हृदय की बुझाती प्यास हो तुम।

सूर्य जब जाने लगता है अस्तांचल
एकांत के संताप से मन होता विकल
दैदीप्यमान हो जाती स्मृति तुम्हारी
हृदय होता उतना ही अधिक विह्वल

तब शांति देती तुम्हारी आराधना की आरती ही,
गोधूलिवेला के पवन की मलयज सुवास हो तुम।

ग्रीवा में मयूर-सम मोहक चमक
तब बदन में गमके बेला की महक
तब अंगड़ाई उठाये हृत में कसक
तब दृष्टि में छिपी है गहन तड़ित

तू ही ग्रीष्म, तू ही पावस, और तू ही है शरत,
मधुर मधुमास के आगमन का आभास हो तुम।

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महेश चंद्र द्विवेदी

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

तेरे बगैर : सुमन 'मीत'

मेरे मेहरबां

मुड़ के देख ज़रा

कैसी बेज़ारी से गुजरता है

मेरा हर लम्हा

तेरे बगैर.....



तुम थे – 2

तो रोशन था

मेरे ज़र्रे-ज़र्रे में

सकूं का दिया

अब तू नहीं तो – 2

जलता है मेरा

हर कतरा

गम के दिये में

तेरे बगैर......



तुम थे – 2

तो महकती थी

तेरी खुशबू से

मेरी फुलवारी

अब तू नहीं तो – 2

सिमट गई है मेरी

हर डाली

यादों की परछाई में

तेरे बगैर.......



तुम थे तो मैं था – 2

मेरे होने का था

कुछ सबब

सींच कर अपने प्यार से

बनाया था ये महल

अब तू नहीं तो – 2

टूट कर बिखर गया हूँ

इक मकां सा बन गया हूँ

तेरे बगैर

तेरे बगैर.....
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सुमन 'मीत'

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

बिखरे अस्तित्व : वंदना गुप्ता

इस मकान के
कमरों में
बिखरा अस्तित्व
घर नही कहूँगी
घर में कोई
अपना होता है
मगर मकान में
सिर्फ कमरे होते हैं
और उन कमरों में
खुद को
खोजता अस्तित्व
टूट-टूट कर
बिखरता वजूद
कभी किसी
कमरे की
शोभा बनती
दिखावटी मुस्कान
यूँ एक कमरा
जिंदा लाश का था
तो किसी कमरे में
बिस्तर बन जाती
और मन पर
पड़ी सिलवटें
गहरा जाती
यूँ एक कमरा
सिसकती सिलवटों का था
किसी कमरे में
ममता का
सागर लहराता
मगर दामन में
सिर्फ बिखराव आता
यूँ एक कमरा
आँचल में सिसकते
दूध का था
किसी कमरे में
आकांक्षाओं, उम्मीदों
आशाओं की
बलि चढ़ता वजूद
यूँ एक कमरा
फ़र्ज़ की कब्रगाह का था
कभी रोटियों में ढलता
कभी बर्तनों में मंजता
कभी कपड़ों में सिमटता
तो कभी झाड़ू में बिखरता
कभी नेह के दिखावटी
मेह में भीगता
कभी अपशब्दों की
मार सहता
हर तरफ
हर कोने में
टुकड़े - टुकड़े
बिखरे अस्तित्व
को घर कब
मिला करते हैं
ऐसे अस्तित्व तो
सिर्फ कमरों में ही
सिमटा करते हैं.

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वंदना गुप्ता

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

तुमसे जो नहीं कहा


'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सूरज पी.सिंह की इक छोटी सी कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
तुम होते गमले की पौध
और जो मैं कहीं
माटी की ऊर्वरा बन
तुम्हारी जड़ों में पड़ा होता,
तब भी क्या तुम मुझे
अपने भीतर आने से रोक देते?
..और, जो मैं फूल बनकर
तुम्हारे वृंत पर खिल जाता,
बताओ,
फिर तुम क्या करते?

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सूरज पी. सिंह/ शिक्षा : एम. ए. ‘प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व’। ‘भारतीय संस्कृति’ में यूजीसी नेट उत्तीर्ण।
अभिरुचियाँ :कविता, फोटोग्राफी,जंगल-हरियाली,प्रकृति और मानव-संस्कृति से लगाव।
संप्रति: स्वतंत्र अनुवाद कार्य।
पता:सूरज पी. सिंह, A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई
ई-मेल : surajprakash.prakash@gmail.com


सोमवार, 6 दिसंबर 2010

मैं और मेरी तन्हाई

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक की कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

इस सूने कमरे में है बस
मैं और मेरी तन्हाई
दीवारों का रंग पड गया फीका
थक गयी ऑंखें पर वो न आयी
छवि जो उसकी दिल में समाया
दीवारों पर टांग दिया
तू नहीं पर तेरी छवि से ही
टूटे मन को बहला लिया
पर क्या करूँ इस अकेलेपन का
बूँद-बूँद मन को रिसता है
उस मन को भी न तज पाऊँ मैं
जिस मन में वो छब बसता है
शायद वो आ जाए एक दिन
एकाकी घर संवर जाए
इस निस्संग एकाकीपन को
साथ कभी तेरा मिल जाए
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नाम:अनामिका घटक
जन्मतिथि : २७-१२-१९७०
जन्मस्थान :वाराणसी
कर्मस्थान: नॉएडा
व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत
शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.