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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

बाँसुरी प्रीति की - नीरजा द्विवेदी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीरजा द्विवेदी जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
गुनगुनी धूप है सहला रही तन-बदन,
खिलखिलाती कली उड़ा रही है सुगन्ध,
सनसनाती हुई बह रही शीतल पवन,
अनसुनी प्रिय कथा सुना रही है मगन.

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
गुलाल किन्चती निशा, छुप गयी है गगन.
छुई-मुई सी उषा, लजा गयी बन दुल्हन.
प्रकृति ज्यों रति बनी, बढ़ा रही है अगन.
बयार सन्दली बही, जला रही तन-बदन.

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
धौंकनी श्वांस की बजा रही जल तरंग,
कामदेव तीर पर सजा रहे हैं सुमन,
करती नृत्य राधिका, ताल दे रहे मोहन,
जी की कैसे कहूँ, आओ न मेरे सजन.
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नामः नीरजा द्विवेदी/ शिक्षाः एम.ए.(इतिहास).वृत्तिः साहित्यकार एवं गीतकार. समाजोत्थान हेतु चिंतन एवं पारिवारिक समस्याओं के निवारण हेतु सक्रिय पहल कर अनेक परिवारों की समस्याओं का सफल निदान. सामाजिक एवं मानवीय सम्बंधों पर लेखन. ‘ज्ञान प्रसार संस्थान’ की अध्यक्ष एवं उसके तत्वावधान में निर्बल वर्ग के बच्चों हेतु निःशुल्क विद्यालय एवं पुस्तकालय का संचालन एवं शिक्षण कार्य.
प्रकाशन/ प्रसारण - कादम्बिनी, सरिता, मनोरमा, गृहशोभा, पुलिस पत्रिका, सुरभि समग्र आदि अनेकों पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में लेख, कहानियां, संस्मरण आदि प्रकाशित. भारत, ब्रिटेन एवं अमेरिका में कवि गोष्ठियों में काव्य पाठ, बी. बी. सी. एवं आकाशवाणी पर कविता/कहानी का पाठ। ‘
कैसेट जारी- गुनगुना उठे अधर’ नाम से गीतों का टी. सीरीज़ का कैसेट.
कृतियाँ- उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण एवं शोध विधाओं पर आठ पुस्तकें प्रकाशित- दादी माँ का चेहरा, पटाक्षेप, मानस की धुंध(कहानी संग्रह,कालचक्र से परे (उपन्यास, गाती जीवन वीणा, गुनगुना उठे अधर (कविता संग्रह), निष्ठा के शिखर बिंदु (संस्मरण), अशरीरी संसार (साक्षात्कार आधारित शोध पुस्तक). प्रकाश्य पुस्तकः अमेरिका प्रवास के संस्मरण.
सम्मानः विदुषी रत्न-अखिल भारतीय ब्रज साहित्य संगम, मथुरा, गीत विभा- साहित्यानंद परिषद, खीरी, आथर्स गिल्ड आफ़ इंडिया- 2001, गढ़-गंगा शिखर सम्मान- अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, भारत भारती- महाकोशल साहित्य एवं संस्कृति परिषद, जबलपुर, कलाश्री सम्मान, लखनऊ, महीयसी महादेवी वर्मा सम्मान- साहित्य प्रोत्साहन संस्थान लखनऊ, यू. पी. रत्न- आल इंडिया कान्फ़रेंस आफ़ इंटेलेक्चुअल्स, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान- सर्जना पुरस्कार.
अन्य- अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश पुलिस परिवार कल्याण समिति के रूप में उत्तर प्रदेश के पुलिसजन के कल्याणार्थ अतिश्लाघनीय कार्य. भारतीय लेखिका परिषद, लखनऊ एवं लेखिका संघ, दिल्ली की सक्रिय सदस्य.
संपर्क- 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनऊ. दूरभाषः 2304276 , neerjadewedy@yahoo.com

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

कैसे मीत बनूँ मैं तेरा : कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय‘


कैसे मीत बनूँ मैं तेरा।
काँटों भरा सफर है मेरा।।

कौन सारथी बने हमारा।
विरह सिन्धु में कौन सहारा ?
कैसे लड़ूँ वाहव्य वैरी से,
मैं अपनों से हारा।
क्या आयेगा पुनः सवेरा।।

कितना गम है किसे सुनाऊँ?
अपना सीना चीर दिखाऊँ।
कोई मुझे नहीं पढ़ पाया,
विवश भाव से होंठ चबाऊँ।
ऊपर से घनघोर अंधेरा।।

कैसे मीत बनूँ मैं तेरा।
काँटों भरा सफर है मेरा।।


कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय‘
ग्राम-सहिनवा पो0 गौसैसिंहपुर, सुल्तानपुर (उ0प्र0)

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

प्रेम, वसंत और वेलेण्टाइन

प्यार क्या है ? यह एक बड़ा अजीब सा प्रश्न है। पिछले दिनों इमरोज जी का एक इण्टरव्यू पढ़ रही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब वे अमृता प्रीतम के लिए कुछ करते थे तो किसी चीज़ की आशा नहीं रखते थे। ज़ाहिर है प्यार का यही रूप भी है, जिसमें व्यक्ति चीज़े आत्मिक ख़ुशी के लिए करता है न कि किसी अपेक्षा के लिए। पर क्या वाकई यह प्यार अभी ज़िंदा है? हम वाकई प्यार में कोई अपेक्षा नहीं रखते। यदि रखते हैं तो हम सिर्फ़ रिश्ते निभाते हैं, प्यार नहीं? क्या हम अपने पति, बच्चों, माँ-पिता, भाई-बहन, से कोई अपेक्षा नहीं रखते। सवाल बड़ा जटिल है पर प्यार का पैमाना क्या है? यदि किसी दिन पत्नी या प्रेमिका ने बड़े मन से खाना बनाया और पतिदेव या प्रेमी ने तारीफ़ के दो शब्द तक नहीं कहे, तो पत्नी का असहज हो जाना स्वाभाविक है। अर्थात् पत्नी/प्रेमिका अपेक्षा रखती है कि उसके अच्छे कार्यों की सराहना की जाय। यही बात पति या प्रेमी पर भी लागू होती है। वह चाहे मैनर हो या औपचारिकता, मुख से अनायास ही निकल पड़ता है- ’धन्यवाद या इसकी क्या ज़रूरत थी।’ यहाँ तक कि आपसी रिश्तों में भी ये चीज़ें जीवन का अनिवार्य अंग बन गई हैं। जीवन की इस भागदौड़ में ये छोटे-छोटे शब्द एक आश्वस्ति सी देते हैं। पर सवाल अभी भी वहीं है कि क्या प्यार में अपेक्षायें नहीं होती हैं? सिर्फ़ दूसरे की ख़ुशी अर्थात् स्व का भाव मिटाकर चाहने की प्रवृत्ति ही प्यार कही जायेगी। यहाँ पर मशहूर दार्शनिक ख़लील जिब्रान के शब्द याद आते हैं- ‘‘जब पहली बार प्रेम ने अपनी जादुई किरणों से मेरी आँखें खोली थीं और अपनी जोशीली अँगुलियों से मेरी रूह को छुआ था, तब दिन सपनों की तरह और रातें विवाह के उत्सव की तरह बीतीं।”

भारतीय संस्कृति में तो इस प्यार के लिए एक पूरा मौसम ही है- वसंत। वसंत तो प्रकृति का यौवन है, उल्लास की ऋतु है। इसके आते ही फ़िज़ा में रूमानियत छाने लगती है। निराला जी कहते हैं-

सखि वसंत आया
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया।

वसंत के सौंदर्य में जो उल्लास मिलता है, फिर हर कोई चाहता है कि अपने प्यार के इज़हार के लिए उसे अगले वसंत का इंतज़ार न करना पड़े। भारतीय संस्कृति में ऋतुराज वसंत की अपनी महिमा है। प्यार के बहाने वसंत की महिमा साहित्य और लोक संस्कृति में भी छाई है। तभी तो ‘अज्ञेय‘ ऋतुराज का स्वागत करते नज़र आते हैं-

अरे ऋतुराज आ गया।
पूछते हैं मेघ, क्या वसंत आ गया?
हंस रहा समीर, वह छली भुला गया।
कितु मस्त कोंपलें सलज्ज सोचती-
हमें कौन स्नेह स्पर्श कर जगा गया?
वही ऋतुराज आ गया।

प्रेम आरम्भ से ही आकर्षण का केंद्र बिंदु रहा है। कबीर ने तो यहाँ तक कह दिया कि-’ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।’ प्रेम को लेकर न जाने कितना कुछ कहा गया, रचा गया। यहाँ तक कि वैदिक ऋचायें भी इससे अछूती नहीं रहीं। वहाँ भी प्रेम की महिमा गाई गई है। अथर्ववेद के एक प्रेम गीत ‘प्रिया आ’ के हिन्दी में रूपांतरित सुमधुर बोल अनायास ही दिलोदिमाग़ को झंकृत करने लगते हैं-

मत दूर जा/लिपट मेरी देह से/
लता लतरती ज्यों पेड़ से/मेरे तन के तने पर /
तू आ टिक जा/अंक लगा मुझे/
कभी न दूर जा/पंछी के पंख कतर/
ज़मीं पर उतार लाते ज्यों/छेदन करता मैं तेरे दिल का/
प्रिया आ, मत दूर जा।/धरती और अंबर को /
सूरज ढक लेता ज्यों/तुझे अपनी बीज भूमि बना/
आच्छादित कर लूंगा तुरंत/प्रिया आ, मन में छा/
कभी न दूर जा/आ प्रिया!

प्रेम एक बेहद मासूम अभिव्यक्ति है। अर्थववेद में समाहित ये प्रेम गीत भला किसे न बांध पायेंगे। जो लोग प्रेम को पश्चिमी चश्मे से देखने का प्रयास करते हैं, वे इन प्रेम गीतों को महसूस करें और फिर सोचें कि भारतीय प्रेम और पाश्चात्य प्रेम का फर्क क्या है? प्रेम सिर्फ़ दैहिक नहीं होता, तात्कालिक नहीं होता, उसमें एक समर्पण होता है। अथर्ववेद के ही एक अन्य गीत ‘तेरा अभिषेक करूँ मैं‘ में अतर्निहित भावाभिव्यक्तियों को देखें-

पृथ्वी के पयस से/अभिषेक करूँ/
औषध के रस से/करूँ अभिषेक/
धन-संतति से/सुख-सौभाग्य सभी/तुझ पर वार करूँ मैं।/
यह मैं हूँ/वह तुम/मैं साम/तुम ऋचा/मैं आकाश/तुम धरा/
हम दोनों मिल/सुख सौभाग्य से/संतति संग/जीवन बिताएँ।

वेदों की ऋचाओं से लेकर कबीर-बानी के तत्व को सहेजता यह प्रेम सिर्फ लौकिक नहीं अलौकिक और अप्रतिम भी है। इसकी मादकता में भी आत्म और परमात्म का ज्ञान है। तभी तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- “वसंत का मादक काल उस रहस्यमय दिन की स्मृति लेकर आता है, जब महाकाल के अदृश्य इंगित पर सूर्य और धरती-एक ही महापिंड के दो रूप-उसी प्रकार वियुक्त हुए थे जिस प्रकार किसी दिन शिव और शक्ति अलग हो गए थे। तब से यह लीला चल रही है।“ हमारे यहाँ तो प्रेम अध्यात्म से लेकर पोथियों तक पसरा पड़ा है। उसके लिए किसी साकार और निर्विकार का भेद नहीं बल्कि महसूस करने की जरूरत है। राधा-कृष्ण का प्रेम भी अपनी पराकाष्ठा था तो उसी कृष्ण के प्रेम में मीरा का जोगन हो जाना भी पराकाष्ठा को दर्शाता है। आख़िर इस प्रेम में देह कहाँ है ? खजुराहो और कोणार्क की भित्तिमूर्तियाँ तो देवी-देवताओं को भी अलंकृत करती हैं। फिर कबीर भला क्यों न कहें- ’ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।’

पर दुर्भाग्यवश आज की युवा पीढ़ी प्यार के लिए भी पाश्चात्य संस्कृति की ओर झाँकती है। लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट के प्यार के किस्से सुनते-सुनते जो पीढ़ियाँ बड़ी हुईं, उनके अंदर प्रेम का अनछुआ अहसास कब घर कर गया पता ही नहीं चला। मन ही मन में किसी को चाहने और यादों में जिन्दगी गुज़ार देने का फ़लसफ़ा देखते ही देखते पुराना हो गया। फ़िल्मों और टी. वी. सीरियलों ने प्रेम को अभिव्यक्त करने के ऐसे-ऐसे तरीक़े बता दिए कि युवा पीढ़ी वाकई ‘मोबाइल’ हो गई, पत्रों की जगह ‘चैट’ ने ले ली और अब प्यार का इजहार ‘ट्वीट’ करके किया जाने लगा। प्रेम का रस उसे वेलेण्टाइन-दिवस में दिखता है, जो कि कुछ दिनों का ख़ुमार मात्र है । ऋतुराज वसंत और इसकी मादकता की महिमा वह तभी जानता है, जब वह ‘वेलेण्टाइन‘ के पंखों पर सवार होकर अपनी ख़ुमारी फैलाने लगे। दरअसल यही दुर्भाग्य है कि हम जब तक किसी चीज़ पर पश्चिमी सभ्यता का ओढ़ावा नहीं ओढ़ा लेते, उसे मानने को तैयार ही नहीं होते। ‘योग’ की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘योगा’ होकर आयातित हुआ। और यही बात इस प्रेम पर भी लागू हो रही है। काश कि वे बसंती बयार में मदमदाते इस प्यार को अंदर से महसूस करते-

शुभ हो वसंत तुम्हें
शुभ्र, परितृप्त, मंद मंद हिलकोरता
ऊपर से बहती है सूखी मंडराती हवा,
भीतर से न्योतता विलास गदराता है
ऊपर से झरते हैं कोटि कोटि सूखे पात
भीतर से नीर कोंपलों को उकसाता है
ऊपर से फटे से हैं सीठे अधजगे होठ
भीतर से रस का कटोरा भरा आता है। (विजयदेव नारायण साही)

फ़िलहाल वेलेण्टाइन-डे का ख़ुमार युवाओं के दिलोदिमाग़ पर चढ़कर बोल रहा है। जो प्रेम कभी भीनी ख़ुशबू बिखेरकर चला जाता था, वह जोड़ों को घर से भगाने लगा। कोई इसी दिन पण्डित से कहकर अपना विवाह-मुहूर्त निकलवाता है तो कोई इसे अपने जीवन का यादगार लम्हा बनाने का दूसरा बहाना ढूँढता है। एक तरफ़ नैतिकता की झंडाबरदार सेनायें वेलेण्टाइन-डे का विरोध करने और इसी बहाने चर्चा में आने का बेसब्री से इंतज़ार करती हैं-‘करेंगे डेटिंग तो करायेंगे वेडिंग।‘ यही नहीं इस सेना के लोग अपने साथ पण्डितों को लेकर भी चलते हैं, जिनके पास ‘मंगलसूत्र‘ और ‘हल्दी‘ होगी। अब वेलेण्टाइन डे के बहाने पण्डित जी की भी बल्ले-बल्ले है तो प्रेम की राह में ‘खाप पंचायतें’ भी अपना हुक्म चलाने लगीं। जब सबकी बल्ले-बल्ले हो तो भला बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कैसे पीछे रह सकती हैं। प्रेम कभी दो दिलों की धड़कन सुनता था, पर बाज़ारवाद की अंधी दौड़ ने इन दिलों में अहसास की बजाय गिफ्ट, ग्रीटिंग कार्ड, चाकलेट, फूलों का गुलदस्ता भर दिया और प्यार मासूमियत की जगह हैसियत मापने वाली वस्तु हो गई। ‘प्रेम‘ रूपी बाज़ार को भुनाने के लिए उन्होंने वेलेण्टाइन-डे को बकायदा कई दिनों तक चलने वाले ‘वेलेण्टाइन-उत्सव’ में तब्दील कर दिया है। यही नहीं, हर दिन को अलग-अलग नाम दिया है और लोगों की जेब के अनुरूप गिफ्ट भी तय कर दिये हैं। यह उत्सव फ्रैगरेंस डे, टैडीबियर डे, रोज स्माइल प्रपोज डे, ज्वैलरी डे, वेदर चॉकलेट डे, मेक ए फ्रेंड डे, स्लैप कार्ड प्रामिस डे, हग चॉकलेट किस डे, किस स्वीट हर्ट हग डे, लविंग हार्टस डे, वैलेण्टाइन डे, फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे के रूप में अनवरत चलता रहता है और हर दिन को कार्पोरेट जगत से लेकर मॉल कल्चर और होटलों की रंगीनी से लेकर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स और मीडिया की फ्लैश में चकाचौंध कर दिया जाता है और जब तक प्यार का ख़ुमार उतरता है, करोड़ों के वारे-न्यारे हो चुके होते हैं। टेक्नॉलाजी ने जहाँ प्यार की राहें आसान बनाई, वहीं इस प्रेम की आड़ में डेटिंग और लिव-इन-रिलेशनशिप इतने गड्डमगड्ड हो गए कि प्रेम का ’शरीर’ तो बचा पर उसका ’मन’ भटकने लगा। प्रेम के नाम पर बचा रह गया ‘देह विमर्श’ और फिर एक प्रकार का उबाउपन। काश वसंत के मौसम में प्रेम का वह अहसास लौट आता-

वसंत
वही आदर्श मौसम
और मन में कुछ टूटता सा
अनुभव से जानता हूँ
कि यह वसंत है (रघुवीर सहाय)

आकांक्षा यादव
(मेरा यह लेख 9 फरवरी को सृजनगाथा पर प्रकाशित हुआ था, यहाँ साभार प्रस्तुत)

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ये प्यार है : शिखा वार्ष्णेय

कुछ कोमल से अहसास हैं
कुछ सोये हुए ज़ज्वात हैं
है नहीं ये ज्वाला कोई
सुलगी सुलगी सी आग है
कुछ और नहीं ये प्यार है।
धड़कन बन जो धड़क रही
ज्योति बन जो चमक रही
साँसों में बसी सुगंध सी
महकी महकी सी बयार है
कुछ और नहीं ये प्यार है।
हो कोई रागिनी छिडी जेसे
रिमझिम पड़ती बूंदे वेसे
है झंकृत मन का तार तार
लिए प्रीत का पावन संसार है
कुछ और नहीं ये प्यार है !!
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शिखा वार्ष्णेय, moscow state university से गोल्ड मैडल के साथ
T V Journalism में मास्टर्स करने के बाद कुछ समय एक टीवी चेनेंल में न्यूज़ प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया ,हिंदी भाषा के साथ ही अंग्रेजी ,और रुसी भाषा पर भी समान अधिकार है परन्तु खास लगाव अपनी मातृभाषा से ही है.वर्तमान में लन्दन में रहकर स्वतंत्र लेखन जारी है.अंतर्जाल पर स्पंदन (SPANDAN)के माध्यम से सक्रियता.