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बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

काश तुम ......

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता राकेश श्रीवास्तव का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
 
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते
काश तुम ......
जब से ये जाना मोहब्बत का नाम
मोहब्बत को दे दिया तेरा ही नाम
मोहब्बत का पैगाम , कब का पेश कर दिए होते
काश तुम ......
मेरे होठ सिले के सिले रह गए
इजहारे मोहब्बत , न हम कर सके
मोहब्बत है तुझसे , हम तुमको बता देते
काश तुम ......
तेरा नाम लेके मै जीती रही
तेरा नाम लेके मै मरती रही
तुम करते हो प्यार मुझसे
काश पहले ही बता देते
काश हमदोनो एक दुसरे को बता देते
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते .
 
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भारतीय रेल में कार्यरत. फ़िलहाल कपूरथला में. अध्ययन-लेखन में अभिरूचि. अपने हिंदी ब्लॉग 'राकेश की रचनाएँ' के माध्यम से सक्रियता.

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

रंग बिरंगी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अवनीश कुमार की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
तुम-
 
गुलाबी हो
जैसे नवजात की नज़र

 
तुम-
 
हरी हो
जैसे नवेली वसंत की ऊष्मा

 
तुम-
 
नीली हो
जैसे बड़े परदे की बड़ी सी फिल्म
 
तुम-
 
उजली हो
जैसे हर रोज़ धुलती कमीज़
 
तुम-
 
नारंगी हो
जैसे छनती हुई रौशनी

 
तुम-
 
लाल हो
जैसे मध्य भारत की मिट्टी

 
तुम-
 
भूरी हो
जैसे शाम के वक़्त चौखट
 
रंग-बिरंगी हो
जैसे स्कूल से लौटी बच्ची
जैसे आंग्ल-भाषाई चपलता
जैसे हमारी बातचीत
 
-अवनीश
 
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अवनीश कुमार. लेखन-अध्ययन में रूचि . फ़िलहाल अपने ब्लॉग असहमति की कविता और सशब्द-विद्रोह के माध्यम से सक्रियता.

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

ना बदले कभी प्रेम के रंग

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक' का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...


प्रेमिका:
.
तुझसे लागी प्रीत साजना,
तुझसे लागे मेरे नैन.
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
मैन मन हारी,
मैन तन हारी,
तुझ पर ओ रे मेरे साजन,
मैने पुरी दुनिया वारी.
.
खोकर सुध-बुध,होकर बेसुध,
तुझको पूजू सुबह-शाम,
ओ साजन मै तेरी राधा,
तुम मेरे प्रियवर घनश्याम.
.
घात लगा क्यो हृदय मे बैठे,
ओ मतवारे क्यो छीने चैन,
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
प्रेमी:
.
चाह में जिसके डूबी दुनिया,
तुम उस यौवन कि हाला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
कोई गीत लिखू, कोई काव्य लिखू,
या सुन्दरता का हर भाव लिखू,
इस चन्द्रकिरण से चेरे पर,
हर एक हृदय कि आह लिखू|
.
नैनों में मदिरा है जिनकी,
और अधरों में प्याला हो,
कैसे रोके खुद को कोई,
जब हृदय इतना मतवाला हो|
.
कहाँ रंग हो, कहाँ छंद हो,
अब क्यों दीपों कि माला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
दोनों संयुक्त:
.
अब ना बीते रैन साँवरे,
जब हम तुम हो संग-संग,
ना गुजरे अब बरस प्रेम के,
ना बदले कभी प्रेम के रंग|

- प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक'

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के तहत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय गोपालसिंह नेपाली जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,
सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चाँद जाँचा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो,
मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में
दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो.


 

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा : श्रीलाल शुक्ल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा
प्यासे नयन ज्यों नयन में समा जाएँ
सारे निराधार आधार पा जाएँ
जाओ तभी जब हृदय-कम्प खो जाएँ
मेरे अधर पर तुम्हारा खिले हाथ
मेरा उदय खींच के ज्योति घेरा
छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा

- श्रीलाल शुक्ल


मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

प्रेम-गीत : तुम्हारे नहीं होने पर यहाँ कुछ भी नहीं होता

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता जय कृष्ण राय 'तुषार' का प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तुम्हारे
नहीं होने पर
यहाँ कुछ भी नहीं होता |
सुबह से
शाम मैं
खामोशियों में जागता -सोता |
तुम्हारे
साथ पतझर में
भी जंगल सब्ज लगता है ,
सुलगते
धुँए सा सिगरेट के,
अब चाँद दिखता है ,
भरे दरिया में
भी लगता है
जैसे जल नहीं होता |

नहीं हैं रंग
वो स्वप्निल
क्षितिज के इन्द्रधनुओं में ,
न ताजे
फूल में खुशबू
चमक गायब जुगुनुओं में ,
प्रपातों में
कोई खोया हुआ
बच्चा दिखा रोता |

मनाना
रूठना फिर
गुनगुनाना और बतियाना ,
किताबों में
मोहब्बत का
नहीं होता ये अफ़साना ,
हमारे सिर
का भारी बोझ
अब कोई नहीं ढोता |

किचन भी
हो गया सूना
नहीं अब बोलते बर्तन ,
महावर पर
कोई कविता नहीं
लिखता है अन्तर्मन |
टंगे हैं
खूंटियों पर अब
कोई कपड़े नहीं धोता |

खिड़कियों से
डूबता सूरज
नहीं हम देख पाते ,
अब परिन्दों
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
लौट आओ
झील में डूबें -
लगाएं साथ गोता |
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जन्म 01-01-1969 को ग्राम -पसिका पोस्ट -बरदह जनपद -आजमगढ़ में माँ चन्द्रावती राय और पिता स्व० त्रिवेणी राय के पुत्र के रूप में हुआ |मेरा दस्तावेजों में नाम जयकृष्ण नारायण शर्मा है |मेरी प्रारम्भिक शिक्षा आजमगढ़ में हुई |उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |सम्प्रति उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत |मेरी कविताएँ बी० बी०सी० हिंदी पत्रिका लन्दन ,नया ज्ञानोदय ,आजकल ,अहा!जिंदगी ,दैनिक भाष्कर ,जनसत्ता ,आधारशिला ,नये -पुराने हिन्दुस्तानी एकेडमी ,नव निकष , अक्षर पर्व ,अप्रतिम अपरिहार्य ,युगीन काव्या नवगीत के नए प्रतिमान आदि अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं |सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में कविताएँ प्रकाशित ,आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा प्राइवेट चैनलों से कविताओं का प्रसारण |प्रथम हरिवंश राय बच्चन पुरस्कार 2006 से सम्मानित |इंटरनेट पर छान्दसिक अनुगायन और सुनहरी कलम से साहित्यिक ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय |सम्पर्क जयकृष्ण राय तुषार 63जी/7बेलीकालोनी ,स्टैनली रोड ,इलाहाबाद[ यू० पी० ]पिन -211002 Mob.no.09005912929

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

यादें - नीलम पुरी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीलम पुरी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

ए जाने जाना ,
ए नादान हसीना ,
तुम जब इठलाती हो और इतराती हो ,
मुझे बल खाती नदी सी लगती हो ,
बिलकुल ऐसे जैसे ...
लहरों का उठना फिर नदी में ही समां जाना .
कभी लगती हो शोख तितली सी ..
फूलों से रंग चुरा कर ज्यूँ तितली उड़ जाती है ,
तुम भी जब आती हो ...
मेरे सारे रंग समेट कर चली जाती हो .
तेरा ये मरमरी जिस्म ..
मेरे होश उड़ा देता है ..
तुम मासूम सी ,कुछ नादान सी ,
जब भी तुम्हे देखता हूँ तब होश नहीं रहता ,
तुम्हारा बदन है या संगेमरमर से तराशी हुई मूरत कोई ,
तुम्हे देखता हूँ तो होश गँवा बैठता हूँ ,
फिर भी तुम्हे दिल मे समां लेना चाहता हूँ .
खुद को खो देना चाहता हूँ तेरे ही अंदर कहीं ,
तेरे आने की इक आह्ट ,
भर देती है इन्द्रधनुषी रंगों से मेरी आँखें ,
क्यूँ तेरे आने से सारा आलम महक जाता है ,
क्यूँ तेरी खुशबु मदहोश कर जाती है मुझे ,
जब भी आती हो अपनी यादें दे जाती हो ,
तब य़े अरमान जाग उठते हैं ,
कसम खायंगे फलक तक साथ निभाएँगे ,
रहें ना रहें हम साथ साथ ,
फिर भी साथ निभाएंगे ,
और तुम अक्सर ,बिना कोई वादा किये लौट जाती हो,
तुम्हारे ख्यालों का अहसास ,
तुम्हारे बदन की तपिश ,
दे जाती है दर्द भरा सुकून ,
और छोड़ जाती हो भीनी भीनी अपनी खुशबु के साथ ,
मुझे यूँ ही तनहा ,
लेकिन अपनी हसीं यादों के साथ !

*********************************************************************************** नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.