फ़ॉलोअर

शनिवार, 11 सितंबर 2010

कहां थमता है प्यार

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अरुणा राय की कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

प्रेमी
गौरैये का वो जोड़ा है
जो समाज के रौशनदान में
उस समय घोसला बनाना चाहते हैं
जब हवा सबसे तेज बहती हो
और समाज को प्रेम पर
उतना एतराज नहीं होता
जितना कि घर में ही
एक और घर तलाशने की उनकी जिद पर
शुरू में
खिड़की और दरवाजों से उनका आना-जाना
उन्हें भी भाता है
भला लगता है चांय-चू करते
घर भर में घमाचौकड़ी करना
पर जब उनके पत्थर हो चुके फर्श पर
पुआल की नर्म सूखी डांट और पत्तियां गिरती हैं
एतराज
उनके कानों में फुसफुसाता है
फिर वे इंतजार करते हैं
तेज हवा
बारिश
और लू का
और देखते हैं
कि कब तक ये चूजे
लड़ते हैं मौसम से
बावजूद इसके
जब बन ही जाता है घोंसला
तब वे जुटाते हैं
सारा साजो-सामान
चौंकी लगाते हैं पहले
फिर उस पर स्टूल
पहुंचने को रोशनदान तक
और साफ करते हैं
कचरा प्रेम का
और फैसला लेते हैं
कि घरों में रौशनदान
नहीं होने चाहिए
नहीं दिखने चाहिए
ताखे
छज्जे
खिड़कियां में जाली होनी चाहिए

पर ऐसी मार तमाम बंदिशों के बाद भी
कहां थमता है प्यार

जब वे सबसे ज्यादा
निश्चिंत
और बेपरवाह होते हैं
उसी समय
जाने कहां से
आ टपकता है एक चूजा

भविष्यपात की सारी तरकीबें
रखी रह जाती हैं
और चूजा
बाहर आ जाता है..!!
************************************************************************************
नाम - अरूणा राय

उपनाम - रोज

जन्म : १८ नवंबर १९८४ को इलाहाबाद में।

शिक्षा : बी.एससी. इलाहाबाद से

कार्यक्षेत्र : पुलिस सेवा में सब इंस्पेक्टर।

रुचियाँ : लेखन, चित्रकला व नृत्य

ई मेल- arunarai2010@gmail.com

सोमवार, 6 सितंबर 2010

तन्हा चाँद निहारा करती हूँ.

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका (सुनीता) जी की ग़ज़ल। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तेरे प्यार की चाहत में ये दिये जलाया करती हूँ.
खामोश सितारों में ये तन्हा चाँद निहारा करती हूँ.

आकाश में ज्यूँ बदली लुका-छिपी सी करती हो
नर्म बाहों के ख़यालों में यूँ ही सिमटा करती हूँ.

तमन्नाओ के पंख लगा हवा से बातें करती हूँ.
हिज्र की रातो में बस तुझको ही ढूंढा करती हूँ.

लब चूम तब मेरी आँखों में तुम भी झाँका करते हो ..
सवालिया नज़रों से मैं भी ये चाहत जाना करती हूँ.

बिखर जाती हूँ मैं तब बेताब हो तेरी बाहों में..
ये शब् न ढले, रब से यूँ दुआएं माँगा करती हूँ.

उदास हो यूँ तेरी यादों के दिये जलाया करती हूँ.
खामोश सितारों में ये तन्हा चाँद निहारा करती हूँ.
********************************************************************************
नाम : अनामिका (सुनीता)
जन्म : 5 जनवरी, 1969
निवास : फरीदाबाद (हरियाणा)
शिक्षा : बी.ए , बी.एड.
व्यवसाय : नौकरी
शौक : कुछः टूटा-फूटा लिख लेना, पुराने गाने सुनना।
मेरे पास अपना कुछ नहीं है, जो कुछ है मन में उठी सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएं चाहे वो दुःख की हों या सुख की....मेरे भीतर चलती हैं.. ...... महसूस होती हैं ...और मेरी कलम में उतर आती हैं.
ब्लोग्स : अनामिका की सदायें और अभिव्यक्तियाँ

सोमवार, 30 अगस्त 2010

प्रेम - गीत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

भाग्य निज पल-पल सराहूँ,
जीत तुमसे, मीत हारूँ.
अंक में सर धर तुम्हारे,
एक टक तुमको निहारूँ.....

नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,
कहें अनकही गाथा.
तप्त अधरों की छुअन ने,
किया मन को सरगमाथा.
दीप-शिख बन मैं प्रिये!
नीराजना तेरी उतारूँ...

हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,
मदिर महुआ मन हुआ है.
विदेहित है देह त्रिभुवन,
मन मुखर काकातुआ है.
अछूते प्रतिबिम्ब की,
अँजुरी अनूठी विहँस वारूँ...

बाँह में ले बाँह, पूरी
चाह कर ले, दाह तेरी.
थाह पाकर भी न पाये,
तपे शीतल छाँह तेरी.
विरह का हर पल युगों सा,
गुजारा, उसको बिसारूँ...

बजे नूपुर, खनक कँगना,
कहे छूटा आज अँगना.
देहरी तज देह री! रँग जा,
पिया को आज रँग ना.
हुआ फागुन, सरस सावन,
पी कहाँ, पी कँह? पुकारूँ...

पंचशर साधे निहत्थे पर,
कुसुम आयुध चला, चल.
थाम लूँ न फिसल जाए,
हाथ से यह मनचला पल.
चाँदनी अनुगामिनी बन.
चाँद वसुधा पर उतारूँ...
************************************************************************************
(आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

हसरत-ए-मंजिल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सुमन 'मीत' जी की एक कविता 'हसरत-ए-मंजिल'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

न मैं बदला
न तुम बदली
न ही बदली
हसरत-ए-मंजिल
फिर क्यूं कहते हैं सभी
कि बदला सा सब नज़र आता है
शमा छुपा देती है
शब-ए-गम के
अंधियारे को
वो समझते हैं
कि हम चिरागों के नशेमन में जिया करते हैं !
****************************************************************************
(सुमन 'मीत' जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

बुधवार, 18 अगस्त 2010

सपना सपना ही रहने दो

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीलम पुरी जी की एक ग़ज़ल. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

सपना सपना ही रहने दो,
सपने मैं ही सही तुम्हे अपना कहने दो,

तुम्हें मुबारक हो घर अपना
दीवारों से मुझको लिपटा रहने दो,

महफ़िल में गाना तुम गीत अपने ,
ग़ज़ल मेरी है मुझे ग़ज़ल कहने दो,

लहरों ने छुआ साहिल को कई बार,
मुझे तुम्हारा अहसास ही रहने दो,

खामोश हैं लब मेरे तो कोई बात नहीं ,
कहते है कहानी आँखों के अश्क उन्हें कहने दो,

मील के पत्थर बताते हैं मंजिल का पता.
पत्थर ही सही उसे मेरा हम सफ़र रहने दो,

सब कह लेते है जज़्बात अपनी जुबान से,
कलम मेरी भी कुछ कहती है उसे कहने दो.

इंतज़ार की हद्द बाकी है अभी,
आँखों को मरने के बाद भी खुला रहने दो,

सपना सपना ही रहने दो,
सपने मैं ही सही तुम्हे अपना कहने दो.
**********************************************************************************

(नीलम पुरी जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

"क्या फिर ऋतुराज का आगमन हुआ है ?"

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती वन्दना गुप्ता जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

सोमरस -सा
प्राणों को
सिंचित करता
तुम्हारा ये नेह
ज्यों प्रोढ़ता की
दहलीज पर
वसंत का आगमन
नव कोंपल सी
खिलखिलाती
स्निग्ध मुस्कान
ज्यों वीणा के तार
झनझना गए हो
स्नेहसिक्त नयनो से
बहता प्रेम का सागर
ज्यों तूफ़ान कोई
दरिया में
सिमट आया हो
सांसों के तटबंधों
को तोड़ते ज्वार
ज्यों सैलाब किसी
आगोश में
बंध गया हो
प्रेमारस में
भीगे अधर
ज्यों मदिरा कोई
बिखर गयी हो
धडकनों की
ताल पर
थिरकता मन
ज्यों देवालय में
घंटियाँ बज रही हों
आह ! ये कैसा
अनुबंध है प्रेम का
क्या फिर
ऋतुराज का
आगमन हुआ है ?
*****************************************************************************
(वंदना गुप्ता जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

शनिवार, 7 अगस्त 2010

रुकते थमते से ये कदम

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती शिखा वार्ष्णेय जी की कविता 'रुकते थमते से ये कदम'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

रुकते थमते से ये कदम
अनकही कहानी कहते हैं
यूँ ही मन में जो उमड़ रहीं
ख्यालों की रवानी कहते हैं
रुकते थमते.....
सीने में थी जो चाह दबी
होटों पे थी जो प्यास छुपी
स्नेह तरसती पलकों की
दिलकश कहानी कहते हैं
रुकते थमते....
धड़कन स्वतः जो तेज हुई
अधखिले लव जो मुस्काये
माथे पर इठलाती लट की
नटखट नादानी कहते हैं।
रुकते थमते....
सघन अंधेरी रातों में
ज्यों हाथ लिए हो हाथों में
दो जुगनू सी जो चमक
रही आँखों की सलामी कहते हैं
रुकते थमते...
लावण्या अपार ललाटो पर
सिंदूरी रंग यूँ गालों
पर मद्धम -मद्धम सी साँसों की
मदमस्त खुमारी कहते हैं
रुकते थमते....!!
********************************************************************************

(शिखा वार्ष्णेय जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

सोमवार, 2 अगस्त 2010

प्यार, प्यार और प्यार !!

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती मुकेश कुमार सिन्हा जी की कविता 'प्यार, प्यार और प्यार'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

न आसमान को मुट्ठी में,
कैद करने की थी ख्वाइश,
और न, चाँद-तारे तोड़ने की चाहत!
कोशिश थी तो बस,
इतना तो पता चले की,
क्या है?
अपने अहसास की ताकत!!
इतना था अरमान!
की गुमनामी की अँधेरे मैं,
प्यार के सागर मैं,
धुधु अपनी पहचान!!
इसी सोच के साथ,
मैंने निहारा आसमान!!!
और खोला मन को द्वार!
ताकि कुछ लिख पाऊं,
आखिर क्या है?
ढाई आखर प्यार!!
पर बिखर जाते हैं,
कभी शब्द तो कभी,
मन को पतवार!!!
रह जाती है,
कलम की मुट्ठी खाली हरबार!!!!
फिर आया याद,
खुला मन को द्वार!
कि किया नहीं जाता प्यार!!
सिर्फ जिया जाता है प्यार!!!
किसी के नाम के साथ,
किसी कि नाम के खातिर!
प्यार, प्यार और प्यार !!
*************************************************************************
मुकेश कुमार सिन्हा झारखंड के धार्मिक राजधानी यानि देवघर (बैद्यनाथधाम) का रहने वाला हूँ! वैसे तो देवघर का नाम बहुतो ने सुना भी न होगा,पर यह शहर मेरे दिल मैं एक अजब से कसक पैदा करता है, ग्यारह ज्योतिर्लिंग और १०८ शक्ति पीठ में से एक है, पर मेरे लिए मेरा शहर मुझे अपने जवानी की याद दिलाता है, मुझे अपने कॉलेज की याद दिलाता है और कभी कभी मंदिर परिसर तथा शिव गंगा का तट याद दिलाता है,तो कभी दोस्तों के संग की गयी मस्तियाँ याद दिलाता है..काश वो शुकून इस मेट्रो यानि आदमियों के जंगल यानि दिल्ली मैं भी मिल पाता. पर सब कुछ सोचने से नहीं मिलता और जो मिला है उससे मैं खुश हूँ.क्योंकि इस बड़े से शहर मैं मेरी दुनिया अब सिमट कर मेरी पत्नी और अपने दोनों शैतानों (यशु-रिशु)के इर्द-गिर्द रह गयी है और अपने इस दुनिया में ही अब मस्त हूँ, खुश हूँ.अंतर्जाल पर जिंदगी की राहें के माध्यम से सक्रियता.

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

तुम : कृष्ण कुमार यादव

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण कुमार यादव जी की एक कविता 'तुम'. आज आकांक्षा जी का जन्मदिन भी है, सो यह प्यार भरी कविता पतिदेव कृष्ण कुमार जी की तरफ से आकांक्षा जी के लिए..आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा !!


सूरज के किरणों की
पहली छुअन
थोड़ी अल्हड़-सी
शरमायी हुयी
सकुचायी हुयी
कमरे में कदम रखती है
वही किरण
अपने तेज व अनुराग से
वज्र पत्थर को भी
पिघला जाती है
शाम होते ही
ढलने लगती हैं किरणें
जैसे कि अपना सारा निचोड़
उन्होंने धरती को दे दिया हो
ठीक ऐसे ही तुम हो।



********************************************************************************
कृष्ण कुमार यादव : एक परिचय- सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक. प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। जवाहर नवोदय विद्यालय-आज़मगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1999 में राजनीति-शास्त्र में परास्नातक. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन. व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. इंटरनेट पर 'कविता कोश' में भी कविताएँ संकलित. 50 से अधिक पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित. आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारण. कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित -'अभिलाषा'(काव्य-संग्रह,2005), 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श'(निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years'(2006),'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा'.विभिन्न सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त. व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा'(सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008 द्वारा विशेषांक जारी. व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित.


मंगलवार, 27 जुलाई 2010

प्यार-मुहब्बत नित कीजै..

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी की एक मुक्तिका 'प्यार-मुहब्बत नित कीजै'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

अंज़ाम भले मरना ही हो हँस प्यार-मुहब्बत नित कीजै..

रस-निधि पाकर रस-लीन हुए, रस-खान बने जी भर भीजै.


जो गिरता वह ही उठता है, जो गिरे न उठना क्या जाने?

उठकर औरों को उठा, न उठने को कोई कन्धा लीजै..


हो वफ़ा दफा दो दिन में तो भी इसमें कोई हर्ज़ नहीं

यादों का खोल दरीचा, जीवन भर न याद का घट छीजै..


दिल दिलवर या कि ज़माना ही, खुश या नाराज़ हो फ़िक्र न कर.

खुश रह तू अपनी दुनिया में, इस तरह कि जग तुझ पर रीझै..


कब आया कोई संग, गया कब साथ- न यह मीजान लगा.

जितने पल जिसका संग मिला, जी भर खुशियाँ दे-ले जीजै..


अमृत या ज़हर कहो कुछ भी पीनेवाले पी जायेंगे.

आनंद मिले पी बार-बार, ऐसे-इतना पी- मत खीजै..


नित रास रचा- दे धूम मचा, ब्रज से यूं.एस. ए.-यूं. के. तक.

हो खलिश न दिल में तनिक 'सलिल' मधुशाला में छककर पीजै..

******************************************************************************
रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है।

आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है।

आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप कार्यपालन यंत्री , मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के रूप में कार्यरत हैं।

आपको अंतरजाल पर विश्व की किसी भी भाषा में पिंगल (काव्यशास्त्र) संबंधी दो सर्वाधिक लम्बी लेख श्रृंखलाएँ ('दोहा गाथा सनातन' हिन्दयुग्म पर ६५ कड़ियाँ, तथा 'काव्य का रचना शास्त्र' साहित्य शिल्पी पर ७५ कड़ियाँ) रचकर हिन्दी काव्य के विकास में अप्रतिम योगदान करने का गौरव प्राप्त है. आप वर्तमान में ''काव्य दोषों'' पर लेखमाला रचना हेतु जुटे हैं ताकि नवोदित कवियों को काव्य-शास्त्र के मानकों की जानकारी हो सके. उनके अनुसार: 'हिन्दी भावी विश्व भाषा है इसलिए साहित्य के विविध पक्षों पर गंभीर कार्य अंतरजाल पर किया जाना अपरिहार्य है किन्तु ऐसे सारस्वत अनुष्ठानों के प्रति अंतरजाल पाठकों की उदासीनता चिंतनीय है.'अंतर्जाल पर दिव्य नर्मदा के माध्यम से सक्रियता. आप ५० से अधिक चिट्ठों में सृजन-प्रकाशन कर रहे हैं. सम्पर्क सूत्र: सलिल.संजीव@जीमेल

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

ढलती शाम

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सुमन 'मीत' जी की एक कविता 'ढलती शाम'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

अकसर देखा करती हूँ
शाम ढलते-2
पंछियों का झुंड
सिमट आता है
एक नपे तुले क्षितिज में
उड़ते हैं जो
दिनभर
खुले आसमां में
अपनी अलबेली उड़ान
पर....
शाम की इस बेला में
साथी का सानिध्य
पंखों की चंचलता
उनकी स्वर लहरी
प्रतीत होती
एक पर्व सी
उनके चुहलपन से बनती
कुछ आकृतियां
और
दिखने लगता
मनभावन चलचित्र
फिर शनै: शनै:
ढल जाता
शाम का यौवन
उभर आते हैं
खाली गगन में
कुछ काले डोरे
छिप जाते पंछी
रात के आगोश में
उनकी मद्धम सी ध्वनि
कर्ण को स्पर्श करती
निकल जाती है
दूर कहीं...!!
*******************************************************************************

सुमन 'मीत'/मण्डी, हिमाचल प्रदेश/ मेरे बारे में-पूछी है मुझसे मेरी पहचान; भावों से घिरी हूँ इक इंसान; चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ; वादा है मेरा न छोडूगी हाथ; जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत; इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी “मीत”!अंतर्जाल पर बावरा मन के माध्यम से सक्रियता.

शनिवार, 17 जुलाई 2010

सार्थक संगीत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को तरंगित करती डॉ.मीना अग्रवाल जी की कविता 'सार्थक संगीत'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

स्मृतियाँ

धुन हैं बाँसुरी की

जो सुनाई देती हैं

कहीं दूर बहुत दूर,

मन की वीणा

झंकृत हो

मिलाती है स्वर

बाँसुरी के स्वर में,

तन के घुँघुरू

लगते हैं थिरकने

वे भी हैं आतुर

मिलाने को स्वर

बाँसुरी के स्वर में

और हो जाते हैं

बाँसुरी के साथ !

तभी दुखों की थाप

झाँझ बनकर

करती है लय भंग

बजती है विषम ताल !

जब बजती है

पीड़ा की ढोलक

देती है संताप

उदास मन को

तब लेता है

आकार तांडव

और नहीं उठती

कोई तरंग उर में,

तब निद्रामग्न सुख

आहट पाकर

करते हैं नर्तन

भावों की जलतरंग पर,

कभी लास्य, कभी रास

तो कभी महारास,

मन के मंजीरे

मंगलम् की धुन पर

लगते हैं खनकने,

बाँसुरी के साथ

होता है आनंद का

प्रत्यावर्तन,

जन्म लेता है

मधुर गीत

यही तो है जीवन का

सार्थक संगीत !

***************************************************************************
डॉ. मीना अग्रवाल
जन्म : 20 नवंबर 1947, हाथरस, काका हाथरसी की गोद में पली-बढ़ी
शिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी., संगीत प्रभाकर
वर्तमान पद : एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिदी विभाग, आर.बी.डी. महिला महाविद्यालय, बिजनौर (उ.प्र.) साहित्य : अंदर धूप बाहर धूप (कहानी-संग्रह), सफ़र में साथ-साथ (मुक्तक-संग्रह), विचित्र किंतु सत्य, हारमोनियम एंड कैसियो गाइड, महान लोगों की कहानियाँ, आदर्श बाल कहानियाँ, आधुनिक हिदी गीतिकाव्य में संगीत (पुरस्कृत) ; जो सच कहे (हाइकु संग्रह) ; यादें बोलती हैं (कविता संग्रह) , अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में शोध-निबंधों का नियमित प्रकाशन। सहलेखन : पर्यावरण : दशा और दिशा, नारी : कल और आज, वाद-विवाद प्रतियोगिता, निबंध एवं पत्र-लेखन, हिदी-व्याकरण एवं रचना। संपादन : शोध-संदर्भ (4 खंड), हिंदी-हिंदी-अँग्रेज़ी कोश, हिंदी समांतर कोश, चुने हुए राष्ट्रीय गीत, काका की पाती, अभिनव गद्य विधाएँ, अभिनव निबंध-संकलन, अभिनव कहानी-संकलन, अभिनव एकांकी-संकलन, सूर साहित्य संदर्भ, तुलसी मानस संदर्भ, हिदी साहित्यकार संदर्भ कोश (दो खंड), तुकांत कोश प्रबंध-संपादन : काका हाथरसी अभिनंदन ग्रंथ, शोधिदशा (त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका), संदर्भ अशोक चक्रधर, युगकवि निराला, सफ़र साठ साल का। प्रसारण : आकाशवाणी से कहानियों और वार्ताओं का नियमित प्रसारण, अनेक सेमिनारों में भागीदारी। पुरस्कार एवं ‘ सम्मान : द रोटरी फ़ाउंडेशन डिस्ट्रिक सर्विस अवार्ड। पॉल हैरिस फ़ैलो एवं मेजर डोनर, रोटरी फ़ाउंडेशन, रोटरी इंटरनेशनल। एडवाइजर, रिसर्च बोर्ड ऑफ़ एडवाइजर्स, दॅ अमरीकन बायोग्राफ़िकल इंस्टीट्यूट, अमरीका। रोटरी अंतर्राष्ट्रीय मंडल 3110, रोटरी ह्यूमन वैलफ़ेयर सोसायटी द्वारा हिंदी साहित्य एवं शोध के क्षेत्र में किए गए विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित। उज्जैन (म.प्र.) में विद्योत्तमा सम्मान समारोह में 21000 रुपए का विदुषी विद्योत्तमा सम्मान (2005), पुष्पगंधा प्रकाशन द्वारा 'स्व.श्री हरि ठाकुर पुरस्कार’ (2006), 11000 रुपए का श्री अमनसिंह आत्रेय अखिल भारतीय कृतिकार सम्मान (2007),नई दिल्ली में ‘अक्षरम्‘ द्वारा आयोजित छठा अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के सम्मान समारोह में ‘अक्षरम् हिंदी सेवा सम्मान, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘शब्द भारती सम्मान एवं ‘शब्द माधुरी सम्मान’ 2008), भारतीय वाड.मय पीठ द्वारा ‘सारस्वत साहित्य सम्मान ‘(2008),100000 रुपए का केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा 2004 का शिक्षा पुरस्कार (2008) विदेश-यात्रा : अमरीका, सिंगापुर
Email:drmeena20@gmail।com 16
साहित्य विहार, बिजनौर, उत्तर प्रदेश, भारत

सोमवार, 12 जुलाई 2010

ग़ज़ल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीलम पुरी जी की एक ग़ज़ल. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

मै आज भी तनहा हू,
यकीन नही आता तो यकीन दिलाइये मुझे,

अब फ़िर से आये हो तो ,
एक बार फ़िर से जाकर बताइये मुझे,

अजब गम ज़दा हू मै, आज तक सहला रही हू जख्मो को
इक और नया जख्म दे जाइये मुझे,

मै बहा रही हू आज भी कतरा कतरा आसू,
हो सके इस बारिश से बचाइये मुझे,

बहुत दिनो से मै रास्ते का बेकार सा पत्थर हू,
अब तो मील का पत्थेर बनाइये मुझे,

मै चाहती हू अब तुम सोने कि मुझे दे दो इज़ाज़त ,
इस चिता से अब ना जगाइये मुझे ,

तुम बसे हो राज़ कि तरह आज भी मेरे दिल मे,
आप भी 'नीलम' सा अब ना दुनिया से छुपाइये मुझे.
***********************************************************************************
नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.

बुधवार, 7 जुलाई 2010

कायनात का जादू बाकी है

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रश्मि प्रभा जी की एक कविता 'कायनात का जादू बाकी है'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

इनदिनों
शब्द मुझसे खेल रहे हैं
मैं पन्नों पर उकेरती हूँ
वे उड़ जाते हैं
तुम्हारे पास
ध्यानावस्थित तुम्हारी आँखों को छूकर
कहते हैं
- आँखें खोलो
हमें पढ़ो ....
मैं दौड़ दौडकर थक गई हूँ
समझाया है
-तंग नहीं करते
पर ये शब्द !
जो कल तक समझदारी की बातें करते थे
आज ख्वाब देखने लगे हैं
एक तलाश थी बड़ी शिद्दत से
रांझे की
इनदिनों मेरे शब्द
हीर के ख्वाब संजोने लगे हैं
रांझे को जगाने लगे हैं
अनकहे जज्बातों को सुनाने लगे हैं
जब भी हाथ बढा पिटारी में रखना चाहती हूँ
ये यादों की मीठी गलियों में छुप जाते हैं
कहते हैं हंसकर
" कायनात का जादू
अभी बाकी है हीर "
*************************************************************************************

(रश्मि प्रभा जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

बस एक बार आजा जानाँ

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती वन्दना गुप्ता जी की एक कविता 'बस एक बार आजा जानाँ'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...


तेरी मेरी मोहब्बत
खाक हो जाती
गर तू वादा ना करती
इसी जन्म में मिलने का
एक अरसा हुआ
तेरे वादे पर ऐतबार
करते - करते
पल- छिन्न युगों से
लम्बे हो गए हैं
मगर तेरे वादे की
इन्तिहाँ ना हुई
आज जान जाने को है
आस की हर लौ
बुझने को है
तुझे पुकारता है प्यार मेरा
याद दिलाता है वादा तेरा
क्या भूल गयी हो जानाँ
मोहब्बत की तपिश से
वादे को जलाना
मेरी आवाज़ की
स्वर लहरी पर
हर रस्मो- रिवाज़ की
जंजीरों को तोड़कर
आने के वादे को
क्या भूल गयी हो
धड़कन के साथ
गुंजार होते मेरे नाम को
देख , मुझे तो
तेरी हर कसम
हर वादा
आज भी याद है
ज़िन्दगी की आखिरी
साँस तक सिर्फ
तुझे चाहने का
वादा किया था
और आज भी
उसे ही निभा रहा हूँ
इसी जन्म में
मिलन की बाट
जोह रहा हूँ
तेरे वादे की लाश
को ढोह रहा हूँ
अब तो आजा जानाँ
यारा
मुझे मेरे यार से
मिला जा जानाँ
मेरे प्यार को
मेरे इंतज़ार को
अमर बना जा जानाँ
बस एक बार
आजा जानाँ
बस एक बार…!!
***********************************************************************************
नाम : वंदना गुप्ता / व्यवसाय: गृहिणी / निवास : नई दिल्ली / मैं एक गृहणी हूँ। मुझे पढ़ने-लिखने का शौक है तथा झूठ से मुझे सख्त नफरत है। मैं जो भी महसूस करती हूँ, निर्भयता से उसे लिखती हूँ। अपनी प्रशंसा करना मुझे आता नही इसलिए मुझे अपने बारे में सभी मित्रों की टिप्पणियों पर कोई एतराज भी नही होता है। मेरा ब्लॉग पढ़कर आप नि:संकोच मेरी त्रुटियों को अवश्य बताएँ। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि हरेक ब्लॉगर मित्र के अच्छे स्रजन की अवश्य सराहना करूँगी। ज़ाल-जगतरूपी महासागर की मैं तो मात्र एक अकिंचन बून्द हूँ। अंतर्जाल पर जिंदगी एक खामोश सफ़र के माध्यम से सक्रियता.