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सोमवार, 4 मार्च 2013

लौट आओ...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता सोम ठाकुर जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

लौट आओ,
माँग के सिंदूर की सौगंध
तुमको नयन का सावन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
आज पहिले प्यार की सौगन्ध
तुमको प्रीत का बचपन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
मानिनी, है मान की सौगन्ध
तुमको बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
हारती मनुहार की सौगंध तुमको
भीगता आँगन निमंत्रण दे रहा है !

- सोम ठाकुर


 

मंगलवार, 26 फरवरी 2013

मैं तुझमें तू कहाँ खो गयी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता  जय कृष्ण राय 'तुषार' का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

यह भी क्षण
कितना सुन्दर है
मैं तुझमें तू कहीं खो गयी |
इन्द्रधनुष
की आभा से ही
प्यासी धरती हरी हो गयी |

जीवन बहती नदी
नाव तुम ,हम
लहरें बन टकराते हैं ,
कुछ की किस्मत
रेत भुरभुरी कुछ
मोती भी पा जाते हैं ,
मेरी किस्मत
बंजारन थी
जहाँ पेड़ था वहीँ सो गयी |

तेरी इन
अपलक आँखों में
आगत दिन के कुछ सपने हैं ,
पांवों के छाले
मुरझाये अब
फूलों के दिन अपने हैं ,
मेरा मन
कोरा कागज था
उन पर तुम कुछ गीत बो गयी |
 

रविवार, 10 फरवरी 2013

सखी तू मत हो उदास

 
हल्दू हल्दू बसंत का मौसम
शीतल हवा कभी गर्म है मौसम
रक्तिम रक्तिम फूले प्लास
सखी तू क्यों है उदास?

सज़ल नेत्र क्यों खड़ी हुई है ?
दुखियारी सी बनी हुई है
क्यों छोड़ रही गहरी श्वास
सखी तू क्यों भई उदास?

केश तुम्हारे खुले हुए हैं
बादल जैसे मचल रहे हैं
बसंत मे सावन कि आस
सखी तू क्यों है उदास?

वृक्ष पल्लवित हो रहे हैं
पीत पत्र संग छोड़ रहे हैं
नव जीवन सी सजी आस
सखी तू कैसे बनी उदास?

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
भंवरे उन पर मचल रहे हैं
तितली भी मकरंद कि आस
सखी तू किसलिए भई उदास?

कलियाँ खिलती,भंवरे गाते
पेड़ों पर पक्षी शोर मचाते
चहुँ और सजा है मधु मास
सखी तू कैसे भई उदास?

पिया मिलन जल्दी होगा
भँवरा फूल संग होगा
रखो जीवन मे विश्वास
सखी तू मत हो उदास|

डॉ अ कीर्तिवर्धन

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

काश तुम ......

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता राकेश श्रीवास्तव का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
 
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते
काश तुम ......
जब से ये जाना मोहब्बत का नाम
मोहब्बत को दे दिया तेरा ही नाम
मोहब्बत का पैगाम , कब का पेश कर दिए होते
काश तुम ......
मेरे होठ सिले के सिले रह गए
इजहारे मोहब्बत , न हम कर सके
मोहब्बत है तुझसे , हम तुमको बता देते
काश तुम ......
तेरा नाम लेके मै जीती रही
तेरा नाम लेके मै मरती रही
तुम करते हो प्यार मुझसे
काश पहले ही बता देते
काश हमदोनो एक दुसरे को बता देते
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते .
 
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भारतीय रेल में कार्यरत. फ़िलहाल कपूरथला में. अध्ययन-लेखन में अभिरूचि. अपने हिंदी ब्लॉग 'राकेश की रचनाएँ' के माध्यम से सक्रियता.

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

रंग बिरंगी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अवनीश कुमार की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
तुम-
 
गुलाबी हो
जैसे नवजात की नज़र

 
तुम-
 
हरी हो
जैसे नवेली वसंत की ऊष्मा

 
तुम-
 
नीली हो
जैसे बड़े परदे की बड़ी सी फिल्म
 
तुम-
 
उजली हो
जैसे हर रोज़ धुलती कमीज़
 
तुम-
 
नारंगी हो
जैसे छनती हुई रौशनी

 
तुम-
 
लाल हो
जैसे मध्य भारत की मिट्टी

 
तुम-
 
भूरी हो
जैसे शाम के वक़्त चौखट
 
रंग-बिरंगी हो
जैसे स्कूल से लौटी बच्ची
जैसे आंग्ल-भाषाई चपलता
जैसे हमारी बातचीत
 
-अवनीश
 
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अवनीश कुमार. लेखन-अध्ययन में रूचि . फ़िलहाल अपने ब्लॉग असहमति की कविता और सशब्द-विद्रोह के माध्यम से सक्रियता.

बृहस्पतिवार, 25 अक्तूबर 2012

ना बदले कभी प्रेम के रंग

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक' का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...


प्रेमिका:
.
तुझसे लागी प्रीत साजना,
तुझसे लागे मेरे नैन.
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
मैन मन हारी,
मैन तन हारी,
तुझ पर ओ रे मेरे साजन,
मैने पुरी दुनिया वारी.
.
खोकर सुध-बुध,होकर बेसुध,
तुझको पूजू सुबह-शाम,
ओ साजन मै तेरी राधा,
तुम मेरे प्रियवर घनश्याम.
.
घात लगा क्यो हृदय मे बैठे,
ओ मतवारे क्यो छीने चैन,
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
प्रेमी:
.
चाह में जिसके डूबी दुनिया,
तुम उस यौवन कि हाला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
कोई गीत लिखू, कोई काव्य लिखू,
या सुन्दरता का हर भाव लिखू,
इस चन्द्रकिरण से चेरे पर,
हर एक हृदय कि आह लिखू|
.
नैनों में मदिरा है जिनकी,
और अधरों में प्याला हो,
कैसे रोके खुद को कोई,
जब हृदय इतना मतवाला हो|
.
कहाँ रंग हो, कहाँ छंद हो,
अब क्यों दीपों कि माला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
दोनों संयुक्त:
.
अब ना बीते रैन साँवरे,
जब हम तुम हो संग-संग,
ना गुजरे अब बरस प्रेम के,
ना बदले कभी प्रेम के रंग|

- प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक'

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के तहत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय गोपालसिंह नेपाली जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,
सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चाँद जाँचा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो,
मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में
दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो.


 

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा : श्रीलाल शुक्ल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा
प्यासे नयन ज्यों नयन में समा जाएँ
सारे निराधार आधार पा जाएँ
जाओ तभी जब हृदय-कम्प खो जाएँ
मेरे अधर पर तुम्हारा खिले हाथ
मेरा उदय खींच के ज्योति घेरा
छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा

- श्रीलाल शुक्ल


मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

प्रेम-गीत : तुम्हारे नहीं होने पर यहाँ कुछ भी नहीं होता

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता जय कृष्ण राय 'तुषार' का प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तुम्हारे
नहीं होने पर
यहाँ कुछ भी नहीं होता |
सुबह से
शाम मैं
खामोशियों में जागता -सोता |
तुम्हारे
साथ पतझर में
भी जंगल सब्ज लगता है ,
सुलगते
धुँए सा सिगरेट के,
अब चाँद दिखता है ,
भरे दरिया में
भी लगता है
जैसे जल नहीं होता |

नहीं हैं रंग
वो स्वप्निल
क्षितिज के इन्द्रधनुओं में ,
न ताजे
फूल में खुशबू
चमक गायब जुगुनुओं में ,
प्रपातों में
कोई खोया हुआ
बच्चा दिखा रोता |

मनाना
रूठना फिर
गुनगुनाना और बतियाना ,
किताबों में
मोहब्बत का
नहीं होता ये अफ़साना ,
हमारे सिर
का भारी बोझ
अब कोई नहीं ढोता |

किचन भी
हो गया सूना
नहीं अब बोलते बर्तन ,
महावर पर
कोई कविता नहीं
लिखता है अन्तर्मन |
टंगे हैं
खूंटियों पर अब
कोई कपड़े नहीं धोता |

खिड़कियों से
डूबता सूरज
नहीं हम देख पाते ,
अब परिन्दों
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
लौट आओ
झील में डूबें -
लगाएं साथ गोता |
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जन्म 01-01-1969 को ग्राम -पसिका पोस्ट -बरदह जनपद -आजमगढ़ में माँ चन्द्रावती राय और पिता स्व० त्रिवेणी राय के पुत्र के रूप में हुआ |मेरा दस्तावेजों में नाम जयकृष्ण नारायण शर्मा है |मेरी प्रारम्भिक शिक्षा आजमगढ़ में हुई |उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |सम्प्रति उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत |मेरी कविताएँ बी० बी०सी० हिंदी पत्रिका लन्दन ,नया ज्ञानोदय ,आजकल ,अहा!जिंदगी ,दैनिक भाष्कर ,जनसत्ता ,आधारशिला ,नये -पुराने हिन्दुस्तानी एकेडमी ,नव निकष , अक्षर पर्व ,अप्रतिम अपरिहार्य ,युगीन काव्या नवगीत के नए प्रतिमान आदि अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं |सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में कविताएँ प्रकाशित ,आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा प्राइवेट चैनलों से कविताओं का प्रसारण |प्रथम हरिवंश राय बच्चन पुरस्कार 2006 से सम्मानित |इंटरनेट पर छान्दसिक अनुगायन और सुनहरी कलम से साहित्यिक ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय |सम्पर्क जयकृष्ण राय तुषार 63जी/7बेलीकालोनी ,स्टैनली रोड ,इलाहाबाद[ यू० पी० ]पिन -211002 Mob.no.09005912929

बृहस्पतिवार, 16 फरवरी 2012

यादें - नीलम पुरी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीलम पुरी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

ए जाने जाना ,
ए नादान हसीना ,
तुम जब इठलाती हो और इतराती हो ,
मुझे बल खाती नदी सी लगती हो ,
बिलकुल ऐसे जैसे ...
लहरों का उठना फिर नदी में ही समां जाना .
कभी लगती हो शोख तितली सी ..
फूलों से रंग चुरा कर ज्यूँ तितली उड़ जाती है ,
तुम भी जब आती हो ...
मेरे सारे रंग समेट कर चली जाती हो .
तेरा ये मरमरी जिस्म ..
मेरे होश उड़ा देता है ..
तुम मासूम सी ,कुछ नादान सी ,
जब भी तुम्हे देखता हूँ तब होश नहीं रहता ,
तुम्हारा बदन है या संगेमरमर से तराशी हुई मूरत कोई ,
तुम्हे देखता हूँ तो होश गँवा बैठता हूँ ,
फिर भी तुम्हे दिल मे समां लेना चाहता हूँ .
खुद को खो देना चाहता हूँ तेरे ही अंदर कहीं ,
तेरे आने की इक आह्ट ,
भर देती है इन्द्रधनुषी रंगों से मेरी आँखें ,
क्यूँ तेरे आने से सारा आलम महक जाता है ,
क्यूँ तेरी खुशबु मदहोश कर जाती है मुझे ,
जब भी आती हो अपनी यादें दे जाती हो ,
तब य़े अरमान जाग उठते हैं ,
कसम खायंगे फलक तक साथ निभाएँगे ,
रहें ना रहें हम साथ साथ ,
फिर भी साथ निभाएंगे ,
और तुम अक्सर ,बिना कोई वादा किये लौट जाती हो,
तुम्हारे ख्यालों का अहसास ,
तुम्हारे बदन की तपिश ,
दे जाती है दर्द भरा सुकून ,
और छोड़ जाती हो भीनी भीनी अपनी खुशबु के साथ ,
मुझे यूँ ही तनहा ,
लेकिन अपनी हसीं यादों के साथ !

*********************************************************************************** नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.

रविवार, 4 दिसम्बर 2011

हाइकु-दिवस पर कृष्ण कुमार यादव के प्रेम-हाइकु

हाइकु हिंदी-साहित्य में तेजी से अपने पंख फ़ैलाने लगा है. कम शब्दों (5-7-5)में मारक बात. भारत में प्रो० सत्यभूषण वर्मा का नाम हाइकु के अग्रज के रूप में लिया जाता है. यही कारण है कि उनका जन्मदिन हाइकु-दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज 4 दिसम्बर को उनका जन्म-दिवस है, अत: आज ही हाइकु दिवस भी है। इस बार हाइकुकार इसे पूरे सप्ताह तक (4 दिसम्बर - 11 दिसम्बर 2011 तक) मना रहे हैं. इस अवसर पर कृष्ण कुमार यादव के कुछ प्रेम-हाइकु का लुत्फ़ उठाएं-

पावन शब्द
अवर्णनीय प्रेम
सदा रहेंगे।

सहेजते हैं
सपने नाजुक से
टूट न जाएं।

जीवंत रहे
राधा-कृष्ण का प्रेम
अलौकिक सा।

फिल्मी संस्कृति
पसरी हर ओर
कामुक दृश्य

अपसंस्कृति
टूटती वर्जनाएँ
विद्रूप दृश्य

ये स्वछंदता
एक सीमा तक ही
लगती भली





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कृष्ण कुमार यादव : 10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ. प्र.) में जन्म. आरंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1999 में राजनीति शास्त्र में परास्नातक. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ और कानपुर में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक पद पर आसीन।


प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, हाइकू, व्यंग्य एवं बाल कविता इत्यादि विधाओं में लेखन. देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, वर्तमान साहित्य, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारतीय, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, गिरिराज, पंजाब सौरभ, अकार, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, युग तेवर, शेष, अक्सर, अलाव, इरावती, उन्नयन, भारत-एशियाई साहित्य, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, अजीत समाचार, लोकायत, शुक्रवार, इण्डिया न्यूज, द सण्डे इण्डियन, छपते-छपते, प्रगतिशील आकल्प, युगीन काव्या, आधारशिला, साहिती सारिका, परती पलार, वीणा, पांडुलिपि, समय के साखी, नये पाठक, सुखनवर, प्रगति वार्ता, प्रतिश्रुति, झंकृति, तटस्थ, मसिकागद, शुभ तारिका, सनद, चक्रवाक, कथाचक्र, नव निकष, हरसिंगार, अभिनव कदम, सबके दावेदार, शिवम्, लोक गंगा, आकंठ, प्रेरणा, सरस्वती सुमन, संयोग साहित्य, शब्द, योजना, डाक पत्रिका, भारतीय रेल, अभिनव, प्रयास, अभिनव प्रसंगवश, अभिनव प्रत्यक्ष, समर लोक, शोध दिशा, अपरिहार्य, संवदिया, वर्तिका, कौशिकी, अनंतिम, सार्थक, कश्फ, उदंती, लघुकथा अभिव्यक्ति, गोलकोंडा दर्पण, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, दक्षिण भारत, केरल ज्योति, द्वीप लहरी, युद्धरत आम आदमी, बयान, हाशिये की आवाज, अम्बेडकर इन इण्डिया, दलित साहित्य वार्षिकी, आदिवासी सत्ता, आश्वस्त, नारी अस्मिता, बाल वाटिका, बाल प्रहरी, बाल साहित्य समीक्षा इत्यादि में रचनाओं का प्रकशन।


इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं-अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, लेखनी, कृत्या, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, हमारी वाणी, लिटरेचर इंडिया, कलायन इत्यादि इत्यादि सहित ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन. व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. इंटरनेट पर 'कविता कोश' में भी कविताएँ संकलित. 50 से अधिक पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित. आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर, Red FM कानपुर और दूरदर्शन पर कविताओं, लेख, वार्ता और साक्षात्कार का प्रसारण।


अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित- 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह,2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years' (2006) एवं 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' . व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा' (सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित. सिद्धांत: Doctrine (कानपुर) व संचार बुलेटिन (लखनऊ) अंतराष्ट्रीय शोध जर्नल में संरक्षक व परामर्श सहयोग। ‘साहित्य सम्पर्क’ (कानपुर) पत्रिका में सम्पादन सहयोग। ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन। विभिन्न स्मारिकाओं का संपादन।


विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त। अभिरूचियों में रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन इत्यादि शामिल।


बकौल पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज' - ‘श्री कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’

बृहस्पतिवार, 22 सितम्बर 2011

तुम और चाँद : कृष्ण कुमार यादव

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण कुमार यादव जी की एक कविता 'तुम और चाँद'.आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

रात का पहर
जब मैं झील किनारे
बैठा होता हूँ
चाँद झील में उतरकर
नहा रहा होता है
कुछ देर बाद
चाँद के साथ
एक और चेहरा
मिल जाता है
वह शायद तुम्हारा है
पता नहीं क्यों
बार-बार होता है ऐसा
मैं नहीं समझ पाता
सामने तुम नहा रही हो
या चाँद
आखिरकार, झील में
एक कंकड़ फेंककर
खामोशी से मैं
वहाँ से चला आता हूँ।
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कृष्ण कुमार यादव :
10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.) के एक प्रतिष्ठित परिवार में श्री राम शिव मूर्ति यादव एवं श्रीमती बिमला यादव के प्रथम सुपुत्र-रूप में जन्म। आरंभिक शिक्षा बाल विद्या मंदिर, तहबरपुर (आजमगढ़), जवाहर नवोदय विद्यालय-जीयनपुर आजमगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद वि.वि. से 1999 में राजनीति शास्त्र में एम.ए. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ और कानपुर में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक पद पर आसीन। 28 नवम्बर, 2004 को आकांक्षा यादव से विवाह। दो पुत्रियाँ: अक्षिता (जन्म- 25 मार्च, 2007) और तान्या (जन्म-27 अक्तूबर 2010)।

प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम। अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित-'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005)'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years'(2006) एवं 'श्क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा' (2007)। देश-विदेश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, वर्तमान साहित्य, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारतीय, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, गिरिराज, पंजाब सौरभ, अकार, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, हिन्दी चेतना (कनाडा), युग तेवर, शेष, अक्सर, अलाव, इरावती, उन्नयन, भारत-एशियाई साहित्य, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, लोकायत, शुक्रवार, इण्डिया न्यूज, द सण्डे इण्डियन, छपते-छपते, प्रगतिशील आकल्प, युगीन काव्या, आधारशिला, वीणा, दलित साहित्य वार्षिकी, बाल वाटिका, गोलकोेण्डा दर्पण, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, दक्षिण भारत, केरल ज्योति, द्वीप लहरी, इत्यादि में रचनाएँ प्रकाशित।

इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में काव्य-रचनाएँ संकलित। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, ब्लॉग- अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, लेखनी, कृत्या, उदंती.काम, काव्यांजलि, रचनाकार, विश्वगाथा, परिकल्पना ब्लॉगोत्सव, हिन्दी हाइकु, हिन्दी नेस्ट, हिंदी मीडिया, हिंदी साहित्य मंच, हमारी वाणी, स्वतंत्र आवाज डाॅट काम, स्वर्गविभा, कलायन, सार्थक सृजन, आखर कलश, शब्दकार, अपनी माटी, वांग्मय पत्रिका, ई-हिन्दी साहित्य, सुनहरी कलम से, नारायण कुञ्ज, कवि मंच, इत्यादि पर रचनाएँ प्रकाशित। व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर डाकिया डाक लाया और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ , ‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉग के माध्यम से सक्रियता।

आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार का प्रसारण। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ संकलित। ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’ (सितम्बर 2007) एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ‘गुफ्तगू‘ (मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित। व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित। भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘ व ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”काव्य शिरोमणि” एवं ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त।

संपर्क: कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com


बृहस्पतिवार, 28 जुलाई 2011

प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटते मुक्तक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटते नीलम पुरी जी के कुछ मुक्तक. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

१)आँखों के अश्क बह नहीं पाए,
खामोश रहे किसी से कुछ कह नहीं पाए,
किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,
जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.
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२).जब भी रातों मे तेरी याद आती है ,
वीरान रातों में चाँदनी उतर आती है,
सोचती हूँ तुम मिलोगे खवाबों मे,
मगर ना तुम आते हो ना नींद आती है.
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३)मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,
हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,
ये खनक है शायद उनके आने की,
जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है.
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४)खामोशियो मे भी गुनगुनाने को जी चाहता है,
तन्हायियो में भी महफिलें सजाने को जी चाहता है,
जाने क्या सर कर गया उसका पल दो पल का साथ,
बेगानों को भी अपना बनाने को जी चाहता है.
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५)पल पल पलकों पर सजाये मैंने,
पल पल अश्क आँखों में छुपाये मैंने,
पल पल इंतज़ार किया और,
पल पल ज़िन्दगी के यूँही बिताये मैंने.
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६)अपने अश्कों को छलकाना चाहती हूँ,
तुझे अपने सीने से लगाना चाहती हूँ,
जहाँ मिलती है ज़मी आसमा से ,
वहां अपना आशियाना बनाना चाहती हूँ.
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७) खामोशिओं के दरमियान सरगोशिया मत रखना,
मेरे तकिये तले कोई स्वप्न मत रखना ,
हर रात आधी अधूरी जीती हूँ मैं,
नीलम की दहलीज़ पर उम्मीद के दिए मत रखना.
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८)सूरज की बाहों मे चाँद तड़प गया,
तारों की छाँव मे ,मैं कल रात भटक गया,
पोंछता रहा रात भर नाम पलकों से उसे,
और वो मेरी आँखों मे टूटे ख्वाब सा चटख गया.
************************
९)रात ढलती गयी ,
दिन भी गुज़रता गया,
उस से मिलने की उम्मीद का,
ये पल भी फिसलता गया.
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१०) दिल की गहराईओं मैं बस जाते हैं वो,
धड़कन की तरह जिस्म मे समाते हैं वो,
जब जब दिल धडकता है तो अहसास होता है,
आज भी मेरे लिए मुस्कुराते तो हैं वो.

 *********************************************************************************** नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 18 जुलाई 2011

तुम्हारे अंक में


अंशल
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!
अनुराग के साथ
हमने थामा था
एक-दूजे का हाथ
अग्नि के संग-संग
फेरों में
वचनों ने हमें बांधा था
वह बंधन
सदा सुदृढ़ रहा
सरिता
सुजल प्रेम का
हर पल बहा
प्रिय!
सौखिक रहा
तेरा सहारा,
अंशल
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!
कभी ऊंच-नीच
कभी मनमुटाव
कभी वाक-युद्ध
कभी शांत भाव
कभी रूठना
कभी गुनगुनाना
कभी सोचना
कभी खिलखिलाना
हम-हम रहे
हम युग्म हुये
चलते रहे हैं साथ-साथ
प्रशस्त हुआ
मार्ग सारा,
अंशल,
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!

-राजेश कुमार
शिव निवास, पोस्टल पार्क चौराहा से पूरब, चिरैयाटांड,पटना-800001

सोमवार, 4 जुलाई 2011

कल जीवन से फिर मिला : आशीष

कल वो सामने बैठी थी
कुछ संकोच ओढे हुए
सजीव प्रतिमा, झुकी आंखे
पलकें अंजन रेखा से मिलती थी

मेरे मन के निस्सीम गगन में
निर्जनता घर कर आयी थी
आकुल मन अब विचलित है
मुरली बजने लगी जैसे निर्जन में

खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
सद्य स्नाता चंचला जैसे
निकल आयी हो चन्द्र किरण से

उसने जो दृष्टी उठाई तनिक सी
मिले नयन उर्ध्वाधर से
अधखुले अधरों में स्पंदन
छिड़ती मधुप तान खनक सी

ना जाने ले क्या अभिलाष
मेरे जीवन की नवल डाल
बौराए नव तरुण रसाल
नव जीवन की फिर दिखी आस

सुखद भविष्य के सपनो में
निशा की घन पलकों में झांक रहा
बिभावरी बीती, छलक रही उषा
जगी लालसा ह्रदय के हर कोने में !!
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आशीष राय/ अभियांत्रिकी का स्नातक, भरण के लिए सम्प्रति कानपुर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चाकरी, साहित्य पढने की रूचि है तो कभी-कभी भावनाये उबाल मारती हैं तो साहित्य सृजन भी हो जाता है /अंतर्जाल पर युग दृष्टि के माध्यम से सक्रियता.