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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटते मुक्तक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटते नीलम पुरी जी के कुछ मुक्तक. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

१)आँखों के अश्क बह नहीं पाए,
खामोश रहे किसी से कुछ कह नहीं पाए,
किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,
जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.
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२).जब भी रातों मे तेरी याद आती है ,
वीरान रातों में चाँदनी उतर आती है,
सोचती हूँ तुम मिलोगे खवाबों मे,
मगर ना तुम आते हो ना नींद आती है.
***********************
३)मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,
हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,
ये खनक है शायद उनके आने की,
जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है.
*************************
४)खामोशियो मे भी गुनगुनाने को जी चाहता है,
तन्हायियो में भी महफिलें सजाने को जी चाहता है,
जाने क्या सर कर गया उसका पल दो पल का साथ,
बेगानों को भी अपना बनाने को जी चाहता है.
******************************
५)पल पल पलकों पर सजाये मैंने,
पल पल अश्क आँखों में छुपाये मैंने,
पल पल इंतज़ार किया और,
पल पल ज़िन्दगी के यूँही बिताये मैंने.
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६)अपने अश्कों को छलकाना चाहती हूँ,
तुझे अपने सीने से लगाना चाहती हूँ,
जहाँ मिलती है ज़मी आसमा से ,
वहां अपना आशियाना बनाना चाहती हूँ.
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७) खामोशिओं के दरमियान सरगोशिया मत रखना,
मेरे तकिये तले कोई स्वप्न मत रखना ,
हर रात आधी अधूरी जीती हूँ मैं,
नीलम की दहलीज़ पर उम्मीद के दिए मत रखना.
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८)सूरज की बाहों मे चाँद तड़प गया,
तारों की छाँव मे ,मैं कल रात भटक गया,
पोंछता रहा रात भर नाम पलकों से उसे,
और वो मेरी आँखों मे टूटे ख्वाब सा चटख गया.
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९)रात ढलती गयी ,
दिन भी गुज़रता गया,
उस से मिलने की उम्मीद का,
ये पल भी फिसलता गया.
************************
१०) दिल की गहराईओं मैं बस जाते हैं वो,
धड़कन की तरह जिस्म मे समाते हैं वो,
जब जब दिल धडकता है तो अहसास होता है,
आज भी मेरे लिए मुस्कुराते तो हैं वो.

 *********************************************************************************** नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.

22 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

खूबसूरत मुक्तक...नीलम पुरी जी को बधाई.

समयचक्र ने कहा…

बहुत बढ़िया खूबसूरत मुक्तक प्रस्तुति ...

vandan gupta ने कहा…

बहुत सुन्दर मुक्तक्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत अशआर

दीपक बाबा ने कहा…

खामोशिओं के दरमियान सरगोशिया मत रखना,
मेरे तकिये तले कोई स्वप्न मत रखना ,
हर रात आधी अधूरी जीती हूँ मैं,
नीलम की दहलीज़ पर उम्मीद के दिए मत रखना.


सुंदर

Akanksha Yadav ने कहा…

दिल की गहराईओं मैं बस जाते हैं वो,
धड़कन की तरह जिस्म मे समाते हैं वो,
जब जब दिल धडकता है तो अहसास होता है,
आज भी मेरे लिए मुस्कुराते तो हैं वो....Bahut khub kaha..badhai !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 28 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

सदा ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है इस प्रस्‍तुति में ..आभार ।

Dolly ने कहा…

बहुत बढ़िया खूबसूरत मुक्तक प्रस्तुति ..

Neelam ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
दिगंबर नासवा ने कहा…

मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,
हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,
ये खनक है शायद उनके आने की,
जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है....

सभी मुक्तक एक से बढ़ कर एक ... प्रेम की नदी जैसे बह रही हो ... बधाई इन सुन्दर मुक्तक पर ..

Unknown ने कहा…

Ek se badhkar ek...badhai.

vidhya ने कहा…

बहुत बढ़िया खूबसूरत मुक्तक प्रस्तुति ...

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

सभी मुक्तक बढ़िया हैं.

Unknown ने कहा…

मुक्तक खूबसूरत है बधाई

Dorothy ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

बेनामी ने कहा…

सभी मुक्तक एक से बढ़ कर एक

Anamikaghatak ने कहा…

sabhi muktak prashansniya hai ...kiski taarif kare ...uttam rachana

Satish Saxena ने कहा…

किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,
जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.

अभिव्यक्ति में कामयाब रचना बधाई नीलम जी ! ...

Udan Tashtari ने कहा…

bahut umda

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुंदर मुक्तक!

Dr.R.Ramkumar ने कहा…

खामोशियो मे भी गुनगुनाने को जी चाहता है,
तन्हायियो में भी महफिलें सजाने को जी चाहता है,
जाने क्या असर कर गया उसका पल दो पल का साथ,
बेगानों को भी अपना बनाने को जी चाहता है.


द्विविधा में हूं कि क्या कहूं?
जिसके असर से ऐसा हुआ उसी के लिए निवेदन है कि जरा बेगानों से सावधान!!

हा हा हा
सभी मुक्तक अच्छे