सोने की थाली में यदि
मैं चांदनी भर पाऊँ,
प्रेम रूप पर गोरी तेरे
भर भर हाथ लुटाऊँ।
हवा में घुल पाऊँ यदि
तेरी सांसो मे बस जाऊँ,
धड़कन हृदय की
वक्ष के स्पंदन मैं बन जाऊँ।
अलसाया सा यौवन तेरा
अंग अंग में तरुणाई,
भर लूँ मैं बांहे फ़ैला
बन कर तेरी ही अंगड़ाई।
चंदन बन यदि तन से लिपटूं
महकूँ कुंआरे बदन सा,
मदिरा बन मैं छलकूँ
अलसाये नयनों से प्रीत सा।
स्वछंद-सुवासित-अलकों में
वेणी बन गुंध जाऊँ,
बन नागिन सी लहराती चोटी
कटि स्पर्श सुख पाऊँ।
अरुण अधर कोमल कपोल
बन चंद्र किरन चूम पाऊँ,
सेज मखमली बन
तेरे तन से लिपट जाऊँ।
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13 टिप्पणियां:
बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
मराठी कविता के सशक्त हस्ताक्षर कुसुमाग्रज से एक परिचय, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें
itne saare alankaro ko samahit kar, ek shandaar prem yukt rachna........:)
itne saare alankaro ko samahit kar, ek shandaar prem yukt rachna........:)
वाह, अच्छा लिखा आपने..बधाई.
बहुत सुन्दर रचना ..
बहुत सुंदर भाव युक्त कविता
अरुण अधर कोमल कपोल
बन चंद्र किरन चूम पाऊँ,
सेज मखमली बन
तेरे तन से लिपट जाऊँ।
..कुलवंत जी का कवि-मन आजकल खूब तरंगित हो रहा है...मनभावन रचना..बधाई.
स्वछंद-सुवासित-अलकों में
वेणी बन गुंध जाऊँ,
बन नागिन सी लहराती चोटी
कटि स्पर्श सुख पाऊँ।
....इसके आगे क्या कहूँ...उत्तम रचना.
बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!
बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!
बड़ी बेहतरीन कविता और उसकी खूबसूरत प्रस्तुति...बधाई.
badhiya prastuti...aabhaar.
लाजवाब...इस शानदार कविता के लिए बधाई स्वीकारें.
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