जीवन की राहें
बहुत हैं पथरीली
तुम्हें गिर कर
फिर संभलना होगा ।
भ्रम की बाहें
बहुत हैं हठीली
छोड़ बन्धनों को
कुछ कर गुजरना होगा ।
दुनिया की निगाहें
बहुत हैं नोकीली
तुम्हें बचकर
आगे बढ़ना होगा ।
रिश्तों की हवाएँ
बहुत हैं जकड़ीली
छोड़ तृष्णा को
मुक्त हो जाना होगा ।
ऐ ‘मन’
तुम्हें बदलना होगा
बदलना होगा
बदलना होगा !!
******************************************************************************

12 टिप्पणियां:
रिश्तों की हवाएँ
बहुत हैं जकड़ीली
छोड़ तृष्णा को
मुक्त हो जाना होगा ।
बहुत सुन्दर जीनी का राह दिखाती कविता। सुमन जी को बधाई। आपका धन्यवाद।
सुन्दर रचना!
--
मंगलवार के साप्ताहिक काव्य मंच पर इसकी चर्चा लगा दी है!
http://charchamanch.blogspot.com/
sundar rachna badhai suman ji
सुमन मीत जी की यह कविता अच्छी और भाव पूर्ण लगी|बधाई
आशा
bahut sundar!
उम्दा रचना
इस रचना को पसन्द करने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया...
nice
ऐ ‘मन’
तुम्हें बदलना होगा
बदलना होगा
बदलना होगा !!
...खूबसूरत अभिव्यक्ति..बधाई !!
@ मयंक जी,
चर्चा के लिए आभार !!
दुनिया की निगाहें
बहुत हैं नोकीली
तुम्हें बचकर
आगे बढ़ना होगा ।
...अच्छा चेताया जी...खूबसूरत गीत..बधाई.
"ye man tuhe badalna hoga." achhi racana hai, badhai aapko. dr somnath yadav bilaspur c.g.
एक टिप्पणी भेजें