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सोमवार, 13 दिसंबर 2010

तुमसे जो नहीं कहा


'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सूरज पी.सिंह की इक छोटी सी कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
तुम होते गमले की पौध
और जो मैं कहीं
माटी की ऊर्वरा बन
तुम्हारी जड़ों में पड़ा होता,
तब भी क्या तुम मुझे
अपने भीतर आने से रोक देते?
..और, जो मैं फूल बनकर
तुम्हारे वृंत पर खिल जाता,
बताओ,
फिर तुम क्या करते?

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सूरज पी. सिंह/ शिक्षा : एम. ए. ‘प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व’। ‘भारतीय संस्कृति’ में यूजीसी नेट उत्तीर्ण।
अभिरुचियाँ :कविता, फोटोग्राफी,जंगल-हरियाली,प्रकृति और मानव-संस्कृति से लगाव।
संप्रति: स्वतंत्र अनुवाद कार्य।
पता:सूरज पी. सिंह, A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई
ई-मेल : surajprakash.prakash@gmail.com


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