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सोमवार, 24 जनवरी 2011

जज्बातों का एहसास : मानव मेहता

और कुछ देर में चाँद, बादलों से घिर जायेगा..

बुझ जायेगी शमां अँधेरा रोशन हो जायेगा...

तन्हाई के इस सीले से मौसम में,

फिर कोई दर्द के अलाव जलाएगा...


थक-हार कर बैठ के शबिस्तानों में अपने, वह

तन्हाई समेटेगा और गम की चादर बिछायेगा....

है जिस की खवाहिश उसको रात की इस घडी में,

वो शख्स उससे मिलने आखिरी-ए-शब् तक न आ पायेगा...


इस वक़्त वह अकेला है तो उसे अकेला रहने दो,

इस तन्हाई में ही वो खुद को हल्का कर पायेगा...

ये उदासी, ये आंसू ही उसको कुछ सहारा दे पायेंगे,

वरना वो अपने दिल पर इक बोझ ढोता जायेगा....


जब सूख जायेगा पानी उसकी आँखों का बह-बह कर,

वो खुद ही फिर यहाँ से चुप-चाप चला जायेगा....

शायद यही आंसू उसको कुछ होंसला दें पायें फिर से,

और तभी शायद वो अपने खोये लम्हे तलाश कर पायेगा....


सिर्फ ऐसी ही रातें तो अब उसकी ज़िन्दगी का सरमाया है,

यही कसक है जो उससे बादे-मौत भी जुदा न हो पायेगा...

इक आखिरी-पहर तो उसको उसको चैन से जी लेने दो दुनिया वालों,

कल तक तो वो तुम्हारे लिए अपना सब कुछ लुटा जाएगा...


तुम तंगदिल थे और हमेशा तंगदिल ही रहोगे,

जाने कब तुम्हें उसके जज्बातों का एहसास हो पायेगा...

तुम देते रहे हो और देते रहना आगे भी उसको बद्दुआएं,

फिर भी मरता हुआ, हंस कर वो तुम्हें दुआ दे जायेगा....
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मानव मेहता /स्थान -टोहाना/ शिक्षा -स्नातक (कला) स्नातकोतर (अंग्रेजी) बी.एड./ व्यवसाय -शिक्षक/अंतर्जाल पर सारांश -एक अंत.. के माध्यम से सक्रिय।
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