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सोमवार, 31 जनवरी 2011

कमनीय स्वप्न : आशीष

कौन थी वो प्रेममयी , जो हवा के झोके संग आई
जिसकी खुशबू फ़ैल रही है , जैसे नव अमराई
क्षीण कटि, बसंत वसना, चंचला सी अंगड़ाई

खुली हुई वो स्निग्ध बाहें , दे रही थी आमंत्रण
नवयौवन उच्छश्रीन्खल. लहराता आंचल प्रतिक्षण
लावण्य पाश से बंधा मै, क्यों छोड़ रहा था हठ प्रण

मृगनयनी,तन्वांगी , तरुणी, उन्नत पीन उरोज
अविचल चित्त , तिर्यक दृग ,अधर पंखुड़ी सरोज
क्यों विकल हो रहा था ह्रदय , ना सुनने को कोई अवरोध

कामप्रिया को करती लज्जित , देख अधीर होता ऋतुराज
देखकर दृग कोर से मै , क्यों बजने लगे थे दिल के साज
उसके , ललाट से कुंचित केश हटाये,झुके नयन भर लाज

नहीं मनु मै, ना वो श्रद्धा, पुलकित नयन गए थे मिल
आलिंगन बद्ध होते ही उनकी , मुखार्व्रिंद गए थे खिल
हम खो गए थे अपने अतीत में , आयी समीप पुनः मंजिल .
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आशीष / अभियांत्रिकी का स्नातक, भरण के लिए सम्प्रति कानपुर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चाकरी ,साहित्य पढने की रूचि है तो कभी-कभी भावनाये उबाल मारती हैं तो साहित्य सृजन भी हो जाता है /अंतर्जाल पर युग दृष्टि के माध्यम से सक्रियता.

10 टिप्‍पणियां:

Tarkeshwar Giri ने कहा…

bahut khub

वन्दना ने कहा…

बहुत ही भावभीनी अभिव्यक्ति है।

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर श्रिंगार रस और प्रेम रस का अद्भुत संगम। बधाई इस रचना के लिये।

आलोकिता ने कहा…

bahut achi rachna hai

ashish ने कहा…

आकांक्षा जी आपका आभार , मेरी इस रचना को अपने ब्लॉग पर स्थान देने के लिए . मै कृत कृत हुआ .

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता...बधाई !!

shikha varshney ने कहा…

बेहद खूबसूरत शब्दों से सजी ..प्रेम रस की बेहतरीन अभिव्यक्ति.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही भावभीनी अभिव्यक्ति है।

Kailash C Sharma ने कहा…

शब्दों का बेजोड संगम..बहुत भावपूर्ण कोमल अभिव्यक्ति..