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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

मैं तुझमें तू कहाँ खो गयी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता  जय कृष्ण राय 'तुषार' का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

यह भी क्षण
कितना सुन्दर है
मैं तुझमें तू कहीं खो गयी |
इन्द्रधनुष
की आभा से ही
प्यासी धरती हरी हो गयी |

जीवन बहती नदी
नाव तुम ,हम
लहरें बन टकराते हैं ,
कुछ की किस्मत
रेत भुरभुरी कुछ
मोती भी पा जाते हैं ,
मेरी किस्मत
बंजारन थी
जहाँ पेड़ था वहीँ सो गयी |

तेरी इन
अपलक आँखों में
आगत दिन के कुछ सपने हैं ,
पांवों के छाले
मुरझाये अब
फूलों के दिन अपने हैं ,
मेरा मन
कोरा कागज था
उन पर तुम कुछ गीत बो गयी |
 

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नहीं समझ आता कि कौन किसमें खो गया है

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

मेरा मन
कोरा कागज था
उन पर तुम कुछ गीत बो गयी............

सुन्दर रचना !!

Manav Mehta 'मन' ने कहा…

bahut sunder...