कल तुझे डूबते हुए सुर्ख सूरज के साये में
फिर एक बार देखा ...
रात, बड़ी देर तक तेरा साया मेरे साथ ही था ..
एक ख्वाब तेरा चेहरा लिए ;खुदा के घर से
दबे पाँव मेरी नींद की आगोश में सिमट आया ...
और रात की गहराती परछाईयो ने ;
तुझे और मुझे ;
अपने इश्क़ की बाहों में समेट लिया ...
सुबह देखा तो तेरी हथेली में मेरा नाम खुदा हुआ था ..
मेरे जिस्म में तेरे अहसास भरे हुए थे ...
बादलो से भरे आसमान से खुदा ने झाँका और
हमें कुछ मोती दिए मोहब्बत की सौगात में ....
कुछ तुमने अपने भीतर समा लिया
कुछ मेरे पलकों के किनारों पर ;
आंसू बन कर टिक गए ...
खुदा ने जो नूर की बूँद दी है
मोहब्बत के नाम पर ...
उसे अब ताउम्र एक ही ओक में पीना है ;
जिसमे एक हथेली तेरी हो
और एक हथेली मेरी हो .....
आओ इस अहसास को जी ले ,
जिसे मोहब्बत कहते है ...!!
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14 टिप्पणियां:
बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां हैं । विजय जी का लेखन हमेशा ही आकर्षित करता है हमें
मोहब्बत को खूबसूरत शब्दों में ढालती सुन्दर कविता..विजय जी को बधाई.
Blog बहुत ही खूबसूरत हो गया है ।आकाँक्षाजी और कवि विजयजी को बधाई ।
Blog बहुत ही खूबसूरत हो गया है ।आकाँक्षाजी और कवि विजयजी को बधाई ।
सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए आभार!
बहुत ही गहरे भाव भरे हैं……………यही खासियत है विजय जी की रचनाओं की…………………प्रेम का सप्तरंगी रंग्…………………और "उसे अब ताउम्र एक ही ओक में पीना है " इतना खूबसूरत बिम्ब प्रयोग्……………कल्पनाशीलता को दर्शाता है।
bahut hi sundar bhavpoorn panktiya hai..
bahut gahre bhaw...:)
khubsurat mohabbat ko aur khubsurat banata hua......:)
maine aapke ke blog ko oahali bar dekhaa..........bahut sundar post hai...badhai
aao sab dosto ka bahut dhanywaad...
aapka
vijay
सुन्दर प्रस्तुति..
बढ़िया है...
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'पाखी की दुनिया' में 'पाखी का लैपटॉप' जरुर देखने आयें !!
मुहब्बत ... मुहब्बत ... मुहब्बत ... मुहब्बत के भीगे एहसास में डूबी ... लाजवाब नज़्म है .....
आओ इस अहसास को जी ले ,
जिसे मोहब्बत कहते है ...!!
....Khubsurat.
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