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मंगलवार, 27 जुलाई 2010

प्यार-मुहब्बत नित कीजै..

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी की एक मुक्तिका 'प्यार-मुहब्बत नित कीजै'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

अंज़ाम भले मरना ही हो हँस प्यार-मुहब्बत नित कीजै..

रस-निधि पाकर रस-लीन हुए, रस-खान बने जी भर भीजै.


जो गिरता वह ही उठता है, जो गिरे न उठना क्या जाने?

उठकर औरों को उठा, न उठने को कोई कन्धा लीजै..


हो वफ़ा दफा दो दिन में तो भी इसमें कोई हर्ज़ नहीं

यादों का खोल दरीचा, जीवन भर न याद का घट छीजै..


दिल दिलवर या कि ज़माना ही, खुश या नाराज़ हो फ़िक्र न कर.

खुश रह तू अपनी दुनिया में, इस तरह कि जग तुझ पर रीझै..


कब आया कोई संग, गया कब साथ- न यह मीजान लगा.

जितने पल जिसका संग मिला, जी भर खुशियाँ दे-ले जीजै..


अमृत या ज़हर कहो कुछ भी पीनेवाले पी जायेंगे.

आनंद मिले पी बार-बार, ऐसे-इतना पी- मत खीजै..


नित रास रचा- दे धूम मचा, ब्रज से यूं.एस. ए.-यूं. के. तक.

हो खलिश न दिल में तनिक 'सलिल' मधुशाला में छककर पीजै..

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रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है।

आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है।

आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप कार्यपालन यंत्री , मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के रूप में कार्यरत हैं।

आपको अंतरजाल पर विश्व की किसी भी भाषा में पिंगल (काव्यशास्त्र) संबंधी दो सर्वाधिक लम्बी लेख श्रृंखलाएँ ('दोहा गाथा सनातन' हिन्दयुग्म पर ६५ कड़ियाँ, तथा 'काव्य का रचना शास्त्र' साहित्य शिल्पी पर ७५ कड़ियाँ) रचकर हिन्दी काव्य के विकास में अप्रतिम योगदान करने का गौरव प्राप्त है. आप वर्तमान में ''काव्य दोषों'' पर लेखमाला रचना हेतु जुटे हैं ताकि नवोदित कवियों को काव्य-शास्त्र के मानकों की जानकारी हो सके. उनके अनुसार: 'हिन्दी भावी विश्व भाषा है इसलिए साहित्य के विविध पक्षों पर गंभीर कार्य अंतरजाल पर किया जाना अपरिहार्य है किन्तु ऐसे सारस्वत अनुष्ठानों के प्रति अंतरजाल पाठकों की उदासीनता चिंतनीय है.'अंतर्जाल पर दिव्य नर्मदा के माध्यम से सक्रियता. आप ५० से अधिक चिट्ठों में सृजन-प्रकाशन कर रहे हैं. सम्पर्क सूत्र: सलिल.संजीव@जीमेल
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