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बुधवार, 7 जुलाई 2010

कायनात का जादू बाकी है

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रश्मि प्रभा जी की एक कविता 'कायनात का जादू बाकी है'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

इनदिनों
शब्द मुझसे खेल रहे हैं
मैं पन्नों पर उकेरती हूँ
वे उड़ जाते हैं
तुम्हारे पास
ध्यानावस्थित तुम्हारी आँखों को छूकर
कहते हैं
- आँखें खोलो
हमें पढ़ो ....
मैं दौड़ दौडकर थक गई हूँ
समझाया है
-तंग नहीं करते
पर ये शब्द !
जो कल तक समझदारी की बातें करते थे
आज ख्वाब देखने लगे हैं
एक तलाश थी बड़ी शिद्दत से
रांझे की
इनदिनों मेरे शब्द
हीर के ख्वाब संजोने लगे हैं
रांझे को जगाने लगे हैं
अनकहे जज्बातों को सुनाने लगे हैं
जब भी हाथ बढा पिटारी में रखना चाहती हूँ
ये यादों की मीठी गलियों में छुप जाते हैं
कहते हैं हंसकर
" कायनात का जादू
अभी बाकी है हीर "
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(रश्मि प्रभा जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)
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