समर्थक

सोमवार, 27 दिसम्बर 2010

आभास : महेश चंद्र द्विवेदी

दिवस के श्रम से श्लथ थकित
अवनि हो जाती है जब निद्रित
नील-नभ को घेर लेती कालिमा
और नक्षत्र भी सब होते हैं तंद्रित

ऐसे काले कुंतल केश वाली सुंदरि सुमुखि,
सघन तिमिर का रहस्यमय आकाश हो तुम।

ब्रह्मवेला में एक कोकिला बन
चहकती हो देकर चपल चितवन
छा जाती है तव व्रीड़ा पर लालिमा
सलज नयनों से जब देती निमंत्रण

मम हृदय में प्रीति के प्रस्फुटन का सन्देश लाती,
रक्तिम-रवि की प्रथम किरण का प्रकाश हो तुम।

अग्नि बरसाती धरा पर रविकिरन
वायु भी जब करती संतापित बदन
दग्ध धरती और दग्ध जड़-चेतन
पशु-पक्षी सब ढूंढते छाया सधन

मन के इक कोने में जगाकर स्वस्पर्श की कल्पना,
अग्नि-दग्ध इस हृदय की बुझाती प्यास हो तुम।

सूर्य जब जाने लगता है अस्तांचल
एकांत के संताप से मन होता विकल
दैदीप्यमान हो जाती स्मृति तुम्हारी
हृदय होता उतना ही अधिक विह्वल

तब शांति देती तुम्हारी आराधना की आरती ही,
गोधूलिवेला के पवन की मलयज सुवास हो तुम।

ग्रीवा में मयूर-सम मोहक चमक
तब बदन में गमके बेला की महक
तब अंगड़ाई उठाये हृत में कसक
तब दृष्टि में छिपी है गहन तड़ित

तू ही ग्रीष्म, तू ही पावस, और तू ही है शरत,
मधुर मधुमास के आगमन का आभास हो तुम।

***********************************************************************************

महेश चंद्र द्विवेदी

14 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

दिवस के श्रम से श्लथ थकित
अवनि हो जाती है जब निद्रित
नील-नभ को घेर लेती कालिमा
और नक्षत्र भी सब होते हैं तंद्रित

itne visheshan aur saaare pyare...:)
bahut khub......!!

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

महेश जी ने प्रियतमा के विभीन्ऩ रूपोँ का बहुत ही सुन्दर व सघन वर्णन किया है। ह्रृदयस्पर्शी रचना।

Kailash C Sharma ने कहा…

ग्रीवा में मयूर-सम मोहक चमक
तब बदन में गमके बेला की महक
तब अंगड़ाई उठाये हृत में कसक
तब दृष्टि में छिपी है गहन तड़ित

बहुत सुन्दर प्रेम गीत..बहुत सुन्दर शब्द संयोजन ..

Mohd. Ghazi : गुफ्तगू ने कहा…

तू ही ग्रीष्म, तू ही पावस, और तू ही है शरत,
मधुर मधुमास के आगमन का आभास हो तुम।

ठंडी में मधुमास का खूबसूरत आभास...बधाई.

वन्दना ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

Krishna Kr. Yadav ने कहा…

बहुत सुन्दर गीत...बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


http://charchamanch.uchcharan.com/

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

महेश चन्द्र जी एक और अनुपम रचना..मन को छू गई.

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

@ संगीता जी,

सप्तरंगी प्रेम की पोस्ट की चर्चा के लिए आभार.

ZEAL ने कहा…

बेहतरीन रचना-बधाई।

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर रचना!

वाणी गीत ने कहा…

तू ही ग्रीष्म, तू ही पावस, और तू ही है शरत,
मधुर मधुमास के आगमन का आभास हो तुम।

मधुर गीत !

padmsingh ने कहा…

सूर्य जब जाने लगता है अस्तांचल
एकांत के संताप से मन होता विकल
दैदीप्यमान हो जाती स्मृति तुम्हारी
हृदय होता उतना ही अधिक विह्वल

तब शांति देती तुम्हारी आराधना की आरती ही,
गोधूलिवेला के पवन की मलयज सुवास हो तुम।

सुन्दरतम! ...

Dorothy ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.