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सोमवार, 24 जनवरी 2011

जज्बातों का एहसास : मानव मेहता

और कुछ देर में चाँद, बादलों से घिर जायेगा..

बुझ जायेगी शमां अँधेरा रोशन हो जायेगा...

तन्हाई के इस सीले से मौसम में,

फिर कोई दर्द के अलाव जलाएगा...


थक-हार कर बैठ के शबिस्तानों में अपने, वह

तन्हाई समेटेगा और गम की चादर बिछायेगा....

है जिस की खवाहिश उसको रात की इस घडी में,

वो शख्स उससे मिलने आखिरी-ए-शब् तक न आ पायेगा...


इस वक़्त वह अकेला है तो उसे अकेला रहने दो,

इस तन्हाई में ही वो खुद को हल्का कर पायेगा...

ये उदासी, ये आंसू ही उसको कुछ सहारा दे पायेंगे,

वरना वो अपने दिल पर इक बोझ ढोता जायेगा....


जब सूख जायेगा पानी उसकी आँखों का बह-बह कर,

वो खुद ही फिर यहाँ से चुप-चाप चला जायेगा....

शायद यही आंसू उसको कुछ होंसला दें पायें फिर से,

और तभी शायद वो अपने खोये लम्हे तलाश कर पायेगा....


सिर्फ ऐसी ही रातें तो अब उसकी ज़िन्दगी का सरमाया है,

यही कसक है जो उससे बादे-मौत भी जुदा न हो पायेगा...

इक आखिरी-पहर तो उसको उसको चैन से जी लेने दो दुनिया वालों,

कल तक तो वो तुम्हारे लिए अपना सब कुछ लुटा जाएगा...


तुम तंगदिल थे और हमेशा तंगदिल ही रहोगे,

जाने कब तुम्हें उसके जज्बातों का एहसास हो पायेगा...

तुम देते रहे हो और देते रहना आगे भी उसको बद्दुआएं,

फिर भी मरता हुआ, हंस कर वो तुम्हें दुआ दे जायेगा....
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मानव मेहता /स्थान -टोहाना/ शिक्षा -स्नातक (कला) स्नातकोतर (अंग्रेजी) बी.एड./ व्यवसाय -शिक्षक/अंतर्जाल पर सारांश -एक अंत.. के माध्यम से सक्रिय।

सोमवार, 17 जनवरी 2011

सिलवटें : वन्दना गुप्ता

बिस्तर की सिलवटें तो मिट जाती हैं
कोई तो बताये
दिल पर पड़ी सिलवटों को
कोई कैसे मिटाए
उम्र बीत गई
रोज सिलवटें मिटाती हूँ
मगर हर रोज
फिर कोई न कोई
दर्द करवट लेता है
फिर कोई ज़ख्म
हरा हो जाता है
और फिर एक नई
सिलवट पड़ जाती है
हर सिलवट के साथ
यादें गहरा जाती हैं
और हर याद के साथ
एक सिलवट पड़ जाती है
फिर दिल पर पड़ी सिलवट
कोई कैसे मिटाए
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नाम : वंदना गुप्ता / व्यवसाय: गृहिणी / निवास : नई दिल्ली / मैं एक गृहणी हूँ। मुझे पढ़ने-लिखने का शौक है तथा झूठ से मुझे सख्त नफरत है। मैं जो भी महसूस करती हूँ, निर्भयता से उसे लिखती हूँ। अपनी प्रशंसा करना मुझे आता नही इसलिए मुझे अपने बारे में सभी मित्रों की टिप्पणियों पर कोई एतराज भी नही होता है। मेरा ब्लॉग पढ़कर आप नि:संकोच मेरी त्रुटियों को अवश्य बताएँ। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि हरेक ब्लॉगर मित्र के अच्छे स्रजन की अवश्य सराहना करूँगी। ज़ाल-जगतरूपी महासागर की मैं तो मात्र एक अकिंचन बून्द हूँ। अंतर्जाल पर जिंदगी एक खामोश सफ़र के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 10 जनवरी 2011

सुनो सनम : अनामिका (सुनीता)

सुनो सनम आज
मुझे श्रृंगारित कर दो
अपने आगोश में लेकर
इस तन को
सुशोभित कर दो...
सुनो सनम आज
मुझे श्रृंगारित कर दो ...


अब तक सुनती आई हूँ..
नदी सागर में गिरती है
पर आज तुम सागर बन कर
मुझ नदी में समा जाओ
प्यार की बदली बन कर
मुझ पर बरस जाओ
सुनो सनम आज
अपने हाथों से
मुझे श्रृंगारित कर दो ...


मेरी मांग सिन्दूरी करो ..
मेरी जुल्फों की
चूडा-मणि खोल
मेरी जुल्फों की खुशबू में
अपनी साँसों को घोलो ..
आज मुझ में
खुद को डुबो लो...


मेरे माथे पर
अपने प्यासे लबों से
बिंदिया सजा दो ..
अपने कमल नयन से दर्पण में
मुझे मेरी सूरत दिखा दो ..


अपने प्यार की मुहर
मेरे रुखसारों पर दे दो
मेरे शुष्क होठों पर
अपने लरज़ते होठों की
लाली दे दो ..
सुनो सनम आज
मुझे श्रृंगारित कर दो ...!!


अपनी बाहों का
हार पहना दो ..
अपने स्पर्श से
मेरे बदन की डाली को
खिला दो..
आज आसमान बन
इस धरती को ढक दो


हाँ, सनम
आज मैं कुछ ज्यादा ही
मांगती हूँ तुमसे..
कि मेरे दिल पर
अपना हाथ रखो
मेरी धडकनों को
अपनी धडकनें सुना दो ..


आज कुछ मनुहार करो
अपनी बाहों में समेटो
कंप-कंपाते अरमानों को
अपने प्यार की
तपिश दे दो.
आज मुझे अपने हाथों से
दुल्हन सा सजा दो...!!


अंदर जो सदियों की आग है
अपने प्यार की बरखा से
तन-मन की प्यास बुझा दो
इस प्यासी ज़मीं को
आज पुलकित कर दो
अपने प्यार के सैलाब से
इसे जल-जल कर दो


सुनो सनम
आज कुछ ज्यादा ही
मांगती हूँ तुमसे
कि आज मुझे
श्रृंगारित कर दो ..!!

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नाम : अनामिका (सुनीता)जन्म : 5 जनवरी, 1969निवास : फरीदाबाद (हरियाणा)शिक्षा : बी।ए , बी.एड.व्यवसाय : नौकरीशौक : कुछः टूटा-फूटा लिख लेना, पुराने गाने सुनना।मेरे पास अपना कुछ नहीं है, जो कुछ है मन में उठी सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएं चाहे वो दुःख की हों या सुख की....मेरे भीतर चलती हैं॥ ...... महसूस होती हैं ...और मेरी कलम में उतर आती हैं.
ब्लोग्स : अनामिका की सदायें और अभिव्यक्तियाँ

सोमवार, 3 जनवरी 2011

जख्म को मत इतना कुरेदो कोई : प्रकाश यादव "निर्भीक"

जख्म को मत इतना कुरेदो कोई
कि फिर से यह हरा न हो जाए
वरना कांटो भरी राहों में चलना
फिर से हमारा मुश्किल हो जायेगा

एक ही तो गुलाब था जिन्दगी में
जिसे देख मुस्कुराते थे कभी हम
उसका न होने का अहसास न कराओ
वरना फिर संभलना मुश्किल हो जायेगा

अधुरी ख्वाहिश रह गई तो क्या हुआ
पूरी होती ख्वाहिश कहां किसी की यहां
अधुरेपन में ही यहां जीने का मजा है
वरना सफर में हमसफर याद आती कहां

दूर होकर भी हरवक्त आसपास है वो
जीवन के हरपल में एक श्वांस है वो
तमन्ना पूरी हुई नहीं हमारी तो क्या हुआ
जिन्दगी का टुटा हुआ एक ख्वाब है वो

मजबुर थे हालात से हम दोनों इस कदर
चाहकर भी न बन सके हम हमसफर
दूर रहकर ही बांट लेगें सारे गम अपने
"निर्भीक" की तरह कट जायेगा जीवन सफर.

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प्रकाश यादव "निर्भीक"
अधिकारी, बैंक ऑफ बड़ौदा, तिलहर शाखा,
जिला शाहजहाँपुर, उ0प्र0 मो. 09935734733
E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

प्रेम एवं सौहार्द के नए रंगों के साथ नूतन वर्ष -2011 की मंगलकामनाएं

नया साल...नया जोश...नई सोच...नई उमंग...नए सपने...आइये इसी सदभावना से नए साल का स्वागत करें !
सुख-समृ्द्धि, शान्ति, प्रेम एवं सौहार्द के नए रंग आपके जीवन में अविरल बहते रहें !!
***नूतन वर्ष -2011 की अनंत मंगलकामनाएं***

चित्र साभार : वेबदुनिया

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

आभास : महेश चंद्र द्विवेदी

दिवस के श्रम से श्लथ थकित
अवनि हो जाती है जब निद्रित
नील-नभ को घेर लेती कालिमा
और नक्षत्र भी सब होते हैं तंद्रित

ऐसे काले कुंतल केश वाली सुंदरि सुमुखि,
सघन तिमिर का रहस्यमय आकाश हो तुम।

ब्रह्मवेला में एक कोकिला बन
चहकती हो देकर चपल चितवन
छा जाती है तव व्रीड़ा पर लालिमा
सलज नयनों से जब देती निमंत्रण

मम हृदय में प्रीति के प्रस्फुटन का सन्देश लाती,
रक्तिम-रवि की प्रथम किरण का प्रकाश हो तुम।

अग्नि बरसाती धरा पर रविकिरन
वायु भी जब करती संतापित बदन
दग्ध धरती और दग्ध जड़-चेतन
पशु-पक्षी सब ढूंढते छाया सधन

मन के इक कोने में जगाकर स्वस्पर्श की कल्पना,
अग्नि-दग्ध इस हृदय की बुझाती प्यास हो तुम।

सूर्य जब जाने लगता है अस्तांचल
एकांत के संताप से मन होता विकल
दैदीप्यमान हो जाती स्मृति तुम्हारी
हृदय होता उतना ही अधिक विह्वल

तब शांति देती तुम्हारी आराधना की आरती ही,
गोधूलिवेला के पवन की मलयज सुवास हो तुम।

ग्रीवा में मयूर-सम मोहक चमक
तब बदन में गमके बेला की महक
तब अंगड़ाई उठाये हृत में कसक
तब दृष्टि में छिपी है गहन तड़ित

तू ही ग्रीष्म, तू ही पावस, और तू ही है शरत,
मधुर मधुमास के आगमन का आभास हो तुम।

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महेश चंद्र द्विवेदी

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

तेरे बगैर : सुमन 'मीत'

मेरे मेहरबां

मुड़ के देख ज़रा

कैसी बेज़ारी से गुजरता है

मेरा हर लम्हा

तेरे बगैर.....



तुम थे – 2

तो रोशन था

मेरे ज़र्रे-ज़र्रे में

सकूं का दिया

अब तू नहीं तो – 2

जलता है मेरा

हर कतरा

गम के दिये में

तेरे बगैर......



तुम थे – 2

तो महकती थी

तेरी खुशबू से

मेरी फुलवारी

अब तू नहीं तो – 2

सिमट गई है मेरी

हर डाली

यादों की परछाई में

तेरे बगैर.......



तुम थे तो मैं था – 2

मेरे होने का था

कुछ सबब

सींच कर अपने प्यार से

बनाया था ये महल

अब तू नहीं तो – 2

टूट कर बिखर गया हूँ

इक मकां सा बन गया हूँ

तेरे बगैर

तेरे बगैर.....
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सुमन 'मीत'

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

बिखरे अस्तित्व : वंदना गुप्ता

इस मकान के
कमरों में
बिखरा अस्तित्व
घर नही कहूँगी
घर में कोई
अपना होता है
मगर मकान में
सिर्फ कमरे होते हैं
और उन कमरों में
खुद को
खोजता अस्तित्व
टूट-टूट कर
बिखरता वजूद
कभी किसी
कमरे की
शोभा बनती
दिखावटी मुस्कान
यूँ एक कमरा
जिंदा लाश का था
तो किसी कमरे में
बिस्तर बन जाती
और मन पर
पड़ी सिलवटें
गहरा जाती
यूँ एक कमरा
सिसकती सिलवटों का था
किसी कमरे में
ममता का
सागर लहराता
मगर दामन में
सिर्फ बिखराव आता
यूँ एक कमरा
आँचल में सिसकते
दूध का था
किसी कमरे में
आकांक्षाओं, उम्मीदों
आशाओं की
बलि चढ़ता वजूद
यूँ एक कमरा
फ़र्ज़ की कब्रगाह का था
कभी रोटियों में ढलता
कभी बर्तनों में मंजता
कभी कपड़ों में सिमटता
तो कभी झाड़ू में बिखरता
कभी नेह के दिखावटी
मेह में भीगता
कभी अपशब्दों की
मार सहता
हर तरफ
हर कोने में
टुकड़े - टुकड़े
बिखरे अस्तित्व
को घर कब
मिला करते हैं
ऐसे अस्तित्व तो
सिर्फ कमरों में ही
सिमटा करते हैं.

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वंदना गुप्ता

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

तुमसे जो नहीं कहा


'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सूरज पी.सिंह की इक छोटी सी कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
तुम होते गमले की पौध
और जो मैं कहीं
माटी की ऊर्वरा बन
तुम्हारी जड़ों में पड़ा होता,
तब भी क्या तुम मुझे
अपने भीतर आने से रोक देते?
..और, जो मैं फूल बनकर
तुम्हारे वृंत पर खिल जाता,
बताओ,
फिर तुम क्या करते?

***********************************************************************************
सूरज पी. सिंह/ शिक्षा : एम. ए. ‘प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व’। ‘भारतीय संस्कृति’ में यूजीसी नेट उत्तीर्ण।
अभिरुचियाँ :कविता, फोटोग्राफी,जंगल-हरियाली,प्रकृति और मानव-संस्कृति से लगाव।
संप्रति: स्वतंत्र अनुवाद कार्य।
पता:सूरज पी. सिंह, A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई
ई-मेल : surajprakash.prakash@gmail.com


सोमवार, 6 दिसंबर 2010

मैं और मेरी तन्हाई

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक की कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

इस सूने कमरे में है बस
मैं और मेरी तन्हाई
दीवारों का रंग पड गया फीका
थक गयी ऑंखें पर वो न आयी
छवि जो उसकी दिल में समाया
दीवारों पर टांग दिया
तू नहीं पर तेरी छवि से ही
टूटे मन को बहला लिया
पर क्या करूँ इस अकेलेपन का
बूँद-बूँद मन को रिसता है
उस मन को भी न तज पाऊँ मैं
जिस मन में वो छब बसता है
शायद वो आ जाए एक दिन
एकाकी घर संवर जाए
इस निस्संग एकाकीपन को
साथ कभी तेरा मिल जाए
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नाम:अनामिका घटक
जन्मतिथि : २७-१२-१९७०
जन्मस्थान :वाराणसी
कर्मस्थान: नॉएडा
व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत
शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.

सोमवार, 29 नवंबर 2010

ऐ मेरे प्राण बता...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीरजा द्विवेदी जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

ऐ मेरे प्राण बता
क्या भुला पाओगे?

वो झरोखे में छुपी
तेरे नयनों की चुभन,
गोरे रंग में जो घुली-
वो गुलाबों की घुलन,
तेरा तन छूकर आती
संदली मलय पवन.

ऐ मेरे प्राण बता
क्या भुला पाओगे?

तेरी चूडी में बसी
मेरे दिल की धडकन.
मेरे आंगन में बजी
वो पायल की रुनझुन.
मेरी नींदें थपकाती
तेरे अधरों की धुन.

ऐ मेरे प्राण बता
क्या भुला पाओगे?

तेरे घूंघट में छिपी
जो रतनारी चितवन,
वो कपोलों पे बसी
मृदु स्मिति की थिरकन,
मेरा अन्तर अकुलाती-
वो प्रिया-प्रिया की रटन.

ऐ मेरे प्राण बता
क्या भुला पाओगे?

मेरे मन में जो लगी,
इक अनोखी सी अगन.
मेरे मानस में बसी,
तेरे अधरों की छुअन.
मेरा तन सिहराती
तेरे श्वासों की तपन.

ऐ मेरे प्राण बता
क्या भुला पाओगे?

मेरे स्वप्नों में बसा
तेरा मरमरी सा बदन.
स्याह अलकें छितराती
छेडती मदमस्त पवन.
मेरा अन्तर तडपाती
तुझे पाने की लगन.

ऐ मेरे प्राण बता
क्या भुला पाओगे?
************************************************************************************
नामः नीरजा द्विवेदी/ शिक्षाः एम.ए.(इतिहास).वृत्तिः साहित्यकार एवं गीतकार. समाजोत्थान हेतु चिंतन एवं पारिवारिक समस्याओं के निवारण हेतु सक्रिय पहल कर अनेक परिवारों की समस्याओं का सफल निदान. सामाजिक एवं मानवीय सम्बंधों पर लेखन. ‘ज्ञान प्रसार संस्थान’ की अध्यक्ष एवं उसके तत्वावधान में निर्बल वर्ग के बच्चों हेतु निःशुल्क विद्यालय एवं पुस्तकालय का संचालन एवं शिक्षण कार्य.प्रकाशन/ प्रसारण - कादम्बिनी, सरिता, मनोरमा, गृहशोभा, पुलिस पत्रिका, सुरभि समग्र आदि अनेकों पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में लेख, कहानियां, संस्मरण आदि प्रकाशित. भारत, ब्रिटेन एवं अमेरिका में कवि गोष्ठियों में काव्य पाठ, बी. बी. सी. एवं आकाशवाणी पर कविता/कहानी का पाठ। ‘कैसेट जारी- गुनगुना उठे अधर’ नाम से गीतों का टी. सीरीज़ का कैसेट.कृतियाँ- उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण एवं शोध विधाओं पर आठ पुस्तकें प्रकाशित- दादी माँ का चेहरा, पटाक्षेप, मानस की धुंध(कहानी संग्रह,कालचक्र से परे (उपन्यास, गाती जीवन वीणा, गुनगुना उठे अधर (कविता संग्रह), निष्ठा के शिखर बिंदु (संस्मरण), अशरीरी संसार (साक्षात्कार आधारित शोध पुस्तक). प्रकाश्य पुस्तकः अमेरिका प्रवास के संस्मरण.सम्मानः विदुषी रत्न-अखिल भारतीय ब्रज साहित्य संगम, मथुरा, गीत विभा- साहित्यानंद परिषद, खीरी, आथर्स गिल्ड आफ़ इंडिया- 2001, गढ़-गंगा शिखर सम्मान- अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, भारत भारती- महाकोशल साहित्य एवं संस्कृति परिषद, जबलपुर, कलाश्री सम्मान, लखनऊ, महीयसी महादेवी वर्मा सम्मान- साहित्य प्रोत्साहन संस्थान लखनऊ, यू. पी. रत्न- आल इंडिया कान्फ़रेंस आफ़ इंटेलेक्चुअल्स, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान- सर्जना पुरस्कार.अन्य- अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश पुलिस परिवार कल्याण समिति के रूप में उत्तर प्रदेश के पुलिसजन के कल्याणार्थ अतिश्लाघनीय कार्य. भारतीय लेखिका परिषद, लखनऊ एवं लेखिका संघ, दिल्ली की सक्रिय सदस्य.संपर्क- 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनऊ. दूरभाषः 2304276 , neerjadewedy@yahoo.com

सोमवार, 22 नवंबर 2010

सिकता के कणों पर

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

सिकता के कणों पर खींचती हूं चित्र मैं
स्वयं ही, फिर स्वयं ही उन्हें मिटाती हूं;
रात्रि भर जागकर देखती हूं दिवास्वप्न,
उजास में स्वयं सयत्न सब भूल जाती हूं.

दस कदम चलती हूं उनके साथ साथ,
फिर अजनबी बनकर आगे बढ़ जाती हूं;
अनजाने आकाश में स्वयं बढ़ाती पेंग,
ऊंचाई पर पहुंचकर भयभीत हो जाती हूं.

परागरस से भरी हुई हूं अन्तस्तल तक,
भ्रमर की मांग को फिर भी ठुकराती हूं;
कुमुदिनी सी मूंदना चाहती हूं स्वयं में
उसे, भौंरे के निकट आने पर घबराती हूं.

अनवरत द्वन्द्व ही है इस जीवन का सच,
पर स्वयं को निर्द्वन्द्वता का पाठ पढ़ाती हूं,
ह्रदय जब भर रहा होता है लम्बी कुलांचें,
मैं सौम्यता की जीवन्त मूर्ति बन जाती हूं.


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नाम: महेश चंद्र द्विवेदी/जन्म-स्थान एवं जन्मतिथिः मानीकोठी, इटावा / 7 जुलाई, 1941/ शिक्षाः एम. एस. सी./भैतिकी/-लखनऊ विश्वविद्यालय /गोल्ड मेडलिस्ट/-एम. एस. सी./सोशल प्लानिंग/-लंदन स्कूल आफ़ इकोनोमिक्स- डिप्लोमा इन पब्लिक एडमिनिसट्रेशन- विशारद/. देश-विदेश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी और अंग्रेजी में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन और आकाशवाणी-दूरदर्शन इत्यादि पर प्रसारण. भारत सहित विदेशों में भी मंचों पर पाठ. रामायण ज्ञान केन्द्र, यू. के. /बर्मिंघम-2007 और विश्व हिंदी सम्मेलन, /न्यूयार्क-२००७ में भागीदारी. विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित- अलंकृत.कुल 7 पुस्तकें प्रकाशित और तीन प्रकाशनाधीन . प्रकाशित पुस्तकें- 1.उर्मि- उपन्यास 2.सर्जना के स्वर- कविता संग्रह 3.एक बौना मानव- कहानी संग्रह 4. सत्यबोध- कहानी संग्रह 5.क्लियर फ़ंडा- व्यंग्य संग्रह 6.भज्जी का जूता- व्यंग्य संग्रह 7. प्रिय अप्रिय प्रशासकीय प्रसंग- संस्मरण 8. अनजाने आकाश में- कविता संग्रह . प्रकाशनाधीन- 1.भीगे पंख- उपन्यास २. मानिला की योगिनी- उपन्यास 3.कहानी संग्रह. आई. पी. एस.- पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत. सम्प्रति साहित्य और समाज सेवा में रत. डा. जितेंन्द्र कुमार सिंह ‘संजय’ द्वारा श्री महेश चंद्र द्विवेदी एवं उनकी पत्नी के साहित्य पर ‘साहित्यकार द्विवेदी दम्पति’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित, एम. फ़िल, लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा कु.श्रुति शुक्ल द्वारा श्री महेश चंद्र द्विवेदी के साहित्य पर शोध. संपर्क :‘ज्ञान प्रसार संस्थान’, 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनऊ -226010 / फोनः 2304276 / 9415063030ई मेलः maheshdewedy@yahoo.com

सोमवार, 15 नवंबर 2010

प्रेयसी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण कुमार यादव जी की कविता 'प्रेयसी'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

छोड़ देता हूँ निढाल
अपने को उसकी बाँहों में
बालों में अंगुलियाँ फिराते-फिराते
हर लिया है हर कष्ट को उसने।

एक शिशु की तरह
सिमटा जा रहा हूँ
उसकी जकड़न में
कुछ देर बाद
खत्म हो जाता है
द्वैत का भाव।

गहरी साँसों के बीच
उठती-गिरती धड़कनें
खामोश हो जाती हैं
और मिलने लगती हैं आत्मायें
मानो जन्म-जन्म की प्यासी हों।

ऐसे ही किसी पल में
साकार होता है
एक नव जीवन का स्वप्न।


( कृष्ण कुमार यादव जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

बुधवार, 10 नवंबर 2010

किसी ने कभी लिखा ही नहीं...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती वंदना गुप्ता जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

मुझे इंतज़ार है
उस एक ख़त का
जिसमें मजमून हो
उन महकते हुए
जज्बातों का
उन सिमटे हुए
अल्फाजों का
उन बिखरे हुए
अहसासों का
जो किसी ने
याद में मेरी
संजोये हों
कुछ न कहना
चाहा हो कभी
मगर फिर भी
हर लफ्ज़ जैसे
दिल के राज़
खोल रहा हो
धडकनों की भी
एक -एक धड़कन
खतों में सुनाई देती हो
आंखों की लाली कर रंग
ख़त के हर लफ्ज़ में
नज़र आता हो
इंतज़ार का हर पल
ज्यूँ ख़त में उतर आया हो
हर शब्द किसी की तड़प का
किस के कुंवारे प्रेम का
किसी के लरजते जज्बातों का
जैसे निनाद करता हो
जिसमें किसी की
प्रतीक्षारत शाम की
उदासी सिमटी हो
आंखों में गुजरी रात का
आलम हो
दिन में चुभते इंतज़ार के
पलों का दीदार हो
किसी के गेसुओं से
टपकती पानी की बूँदें
जलतरंग सुनाती हों
किसी के तबस्सुम में
डूबी ग़ज़ल हो
किसी के बहकते
ज़ज्बातों का रूदन हो
किसी के ख्यालों में
डूबी मदहोशी हो
किसी की सुबह की
मादकता हो
किसी की यादों में
गुजरी शाम की सुगंध हो
हर वो ख्यालात हो
जहाँ सिर्फ़
महबूब का ही ख्वाब हो
प्यार की वो प्यास हो
जहाँ जिस्मों से परे
रूहों के मिलन का
जिक्र हो
हर लफ्ज़ जहाँ
महबूब का ही
अक्स बन गया हो
मुझे इंतज़ार है
उस एक ख़त का
जो किसी ने कभी
लिखा ही नही
किसी ने कभी !!
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( सप्तरंगी प्रेम पर वंदना गुप्ता की अन्य रचनाओं के लिए क्लिक करें)

सोमवार, 1 नवंबर 2010

प्रेम-पत्र

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता जितेन्द्र ‘जौहर’ का 'प्रेम-पत्र' . आपकी प्रतिक्रियाओं और प्रोत्साहन का यथावत इंतजार रहेगा...

आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी वैभवशाली ‘अभाव-महल’ में
आकुल-व्याकुल
उर्मिला के समक्ष
किसी लक्ष्मण का
भावमय गृहागमन !

आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी विस्मरण-गुहा में
उपेक्षित-तिरस्कृत
दमयन्ती के गिर्द
किसी निष्ठुर ‘नल’ की
सहृदय वापसी !

आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी उत्तप्त मरुस्थल में
तृषावंत-क्लांत
मृग के सम्मुख
सहसा किसी नखलिस्तान का
आह्लादक प्राकट्य !


आपका प्रेम-पत्र...
जैसे किसी निर्जन-निर्तृण वनप्रांतर में
शाप-तापग्रस्त
प्रस्तर-शिला के शीश पर
किसी विरल बादल की
जीवन-जलवर्षा !
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नाम : जितेन्द्र ‘जौहर’/जन्म : 26 अगस्त, 1973 (काग़ज़ पर)20 जुलाई, 1971 (माँ ने बताया) / जन्म-स्थान : छिबरामऊ, (कन्नौज) उ.प्र./शिक्षा :एम. ए. (अंग्रेज़ी: भाषा एवं साहित्य), बी. एड., सी.सी.ए.
पी.जी. स्तर पर बैच टॉपर / अ.भा.वै.महासभा द्वारा ‘रजत-प्रतिमा’ से सम्मानित।
लेखन-विधाएँ : गीत, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तछंद, हाइकू, मुक्तक, हास्य-व्यंग्य, लघुकथा,समीक्षा, भूमिका, आलेख, आदि। हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में समानान्तर लेखन।
प्रकाशन : दै.‘हिन्दुस्तान’, ‘दैनिक जागरण’, ‘गाण्डीव’, साप्ता./पाक्षिक‘पाञ्चजन्य’,सीधीबात,प्रेसमैन, बहुजनविकास मासिक ‘पाखी’ गोलकोण्डा दर्पण, कल्याण(गीता प्रेस), अक्षरपर्व, अट्टहास, त्रैमा.‘समांतर’, कथाबिम्ब,वसुधा(कनाडा), सार्थक, अक्षरम्‌ संगोष्ठी, व्यंग्य-यात्रा, सरस्वती सुमन, अक्षत्‌,युगीन-काव्या, मरु-गुलशन, चक्रवाक्‌, सरोपमा, गुफ़्तगू, व्यंग्य-तरंग,मेकलसुता, तेवरी-पक्ष, वार्षिक ‘हास्यम्‌-व्यंग्य‍म्‌’, हस्तक्षेप, आदि सहित
देश-विदेश की लगभग 200 पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। अनेकानेक महत्त्वपूर्ण समवेत संग्रहों में रचनाएँ संकलित।
सक्रिय योगदान : सम्पादकीय सलाहकार ‘प्रेरणा’(शाहजहाँपुर,उ.प्र.)/विशेष सहायोगी ‘प्रयास’(अलीगढ़,उ.प्र.) एवं ‘विविधा’(उत्तराखण्ड)।
प्रसारण : ई.टी.वी. के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘गुदगुदी’ में अनेक एपीसोड प्रसारित।आकाशवाणी से एकल काव्य-पाठ, साक्षात्कार एवं गोष्ठी आदि के दर्जनाधिक प्रसारण।
वेब मैग्ज़ीन्स एवं न्यूज़ पोर्टल्स पर रचनात्मक उपस्थिति।वीडियो एलबम में फ़िल्मांकित गीत शामिल।सिटी चैनल्स पर सरस कव्य-पाठ।
काव्य-मंच : संयोजन एवं प्रभावपूर्ण संचालन के लिए विशेष पहचान।ओजस्वी व मर्यादित हास्य-व्यंग्यपूर्ण काव्य-पाठ का प्रभावी निर्वाह।
भूमिका-लेखन : देश के अनेक सुप्रसिद्ध लेखकों की कृतियों में सारगर्भित भूमिका-लेखन।
अनुवाद : अंग्रेज़ी कथा-संग्रह ‘ऑफ़रिंग्स’ का हिन्दी अनुवाद।
संपादन : ‘अशोक अंजुम: व्यक्ति एवं अभिव्यक्ति’ (समग्र मूल्यांकनपरक कृति)।‘अरण्य का सौन्दर्य’ (डॉ. इन्दिरा अग्रवाल के सृजन पर आधारित समीक्षा-कृति)।‘त्योहारों के रंग, कविता के संग’ (तैयारी में...)।
विशेष : अनेक काव्य-रचनाएँ संगीतबद्ध एवं गायकों द्वारा गायन।राष्ट्रीय/ प्रान्तीय/ क्षेत्रीय स्तर पर विविध साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के निर्णायक-मण्डल में शामिल। उ. म. क्षे. सांस्कृतिक केन्द्र, (सांस्कृतिक मंत्रालय, भारत सरकार)एवं‘स्टार इण्डिया फ़ाउण्डेशन’ द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में ‘फोनेटिक्स’,‘सेल्फ़
डेवलपमेण्ट’,‘कम्यूनिकेशन एण्ड प्रेज़ेण्टेशन स्किल’, आदि विषयों पर कार्यशालाओं में रिसोर्स पर्सन/मुख्य वक्ता के रूप में प्रभावपूर्ण भागीदारी।
सम्मान/पुरस्कार:अनेक सम्मान एवं पुरस्कार (समारोहपूर्वक प्राप्त)। जैसे- पं. संतोष तिवारी स्मृति सम्मान, साहित्यश्री(के.औ.सु.ब. इकाई मप्र), नागार्जुन सम्मान, साहित्य भारती, महादेवी वर्मा सम्मान, आदि के अतिरिक्त विभिन्न प्रशस्तियाँ व स्मृति-चिह्न प्राप्त। प्रकाशित रचनाओपर 500-600 से अधिक प्रशंसा व आशीष-पत्र प्राप्त। अंतर्जाल पर जौहरवाणी के माध्यम से सक्रियता.
सम्प्रति : अंग्रेज़ी-अध्यापन (ए.बी.आई. कॉलेज, रेणुसागर, सोनभद्र, उप्र 231218), भारत.
सम्पर्क : आई आर- 13/6, रेणुसागर, सोनभद्र, (उ.प्र.) 231218 भारत.
मोबाइल नं. +91 9450320472.
ईमेल jjauharpoet@gmail.com