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गुरुवार, 19 नवंबर 2015

मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे

मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे,
गीत का स्वर मधुर माधुरी हो गया।
अक्षर अक्षर सरस आम्रमंजरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी हो गया।

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे।
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत ब्रज की भगति- बावरी हो गया। ...मेरे गीतों में ..... ॥

प्रेम की भक्ति सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे।
पन्ना पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद हो गया।

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबीरा का निर्गुण सबद हो गया।
तुमने छंदों में सज कर सराहा इन्हें ,
मधुपुरी की चतुर नागरी हो गया। .....मेरे गीतों में..... ॥

मस्त में तो यूहीं गीत गाता रहा,
तुम सजाते रहे,मुस्कुराते रहे।
गीत इठलाके तुम को बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी हो गया।

तुम जो हंस हंस के मुझको बुलाते रहे,
दूर से छलना बन कर लुभाते रहे।
भाव भंवरा बने, गुनगुनाने लगे ,
गीत कालिका -नवल-पांखुरी हो गया। .....मेरे गीतों में... ॥
@ डा. श्याम गुप्त 

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नाम— डा. श्याम गुप्त      
पिता—स्व.श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, माता—स्व.श्रीमती रामभेजीदेवी, पत्नी—श्रीमती सुषमा गुप्ता एम.ए.(हि.).
जन्म— १० नवम्बर,१९४४ ई....ग्राम-मिढाकुर, जि. आगरा, उ.प्र.  भारत ..
शिक्षा—एम.बी.,बी.एस.,एम.एस.(शल्य), सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय,आगरा.
व्यवसाय-चिकित्सक (शल्य)-उ.रे.चिकित्सालय, लखनऊ से व.चि.अधीक्षक पद से सेवा निवृत ।
साहित्यिक-गतिविधियां--विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध, काव्य की सभी विधाओं—कविता-गीत,   अगीत, गद्य-पद्य, निबंध, कथा-कहानी-उपन्यास, आलेख, समीक्षा आदि में लेखन। ब्लोग्स व इन्टर्नेट पत्रिकाओं में लेखन.
प्रकाशित कृतियाँ -- १. काव्य दूत २.काव्य निर्झरिणी ३.काव्य मुक्तामृत (काव्य सन्ग्रह)  ४. सृष्टि–अगीत-विधा महाकाव्य ५.प्रेम-काव्य-गीति-विधा महाकाव्य ६.शूर्पणखा खंड-काव्य,  ७. इन्द्रधनुष उपन्यास, ८. अगीत साहित्य दर्पण- अगीत कविता विधा का छंद विधान, ९.ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में काव्य संग्रह ) एवं १०. कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए,रुबाई व शेर का संग्रह )
शीघ्र-प्रकाश्य- तुम तुम और तुम (गीत-सन्ग्रह), गज़ल सन्ग्रह, श्याम स्मृति, अगीत-त्रयी, ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद.....  
मेरे ब्लोग्स( इन्टर्नेट-चिट्ठे)—श्याम स्मृति (http://shyamthot.blogspot.com), साहित्य श्याम, अगीतायन, छिद्रान्वेषी, विजानाति-विजानाति-विज्ञान एवं हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान...
सम्मान आदि—
१.न.रा.का.स.,राजभाषा विभाग,(उ प्र) द्वारा राजभाषा सम्मान (काव्य संग्रह काव्यदूत व काव्य-निर्झरिणी हेतु).
२.अभियान जबलपुर संस्था (म.प्र.) द्वारा हिन्दी भूषण सम्मान( महाकाव्य ‘सृष्टि’ हेतु )
३.विन्ध्यवासिनी हिन्दी विकास संस्थान, नई दिल्ली द्वारा बावा दीप सिन्घ स्मृति सम्मान,
४.अ.भा.अगीतपरिषद द्वारा-श्री कमलापति मिश्र सम्मान व अ.भा.साहित्यकार दिवस पर प.सोहनलाल द्विवेदी सम्मान|
५. अ.भा.अगीत परिषद द्वारा अगीत-विधा महाकाव्य सम्मान( अगीत-विधा महाकाव्य सृष्टि हेतु)
६.जाग्रति प्रकाशन, मुम्बई द्वारा-साहित्य-भूषण एवं पूर्व पश्चिम गौरव सम्मान,
७.इन्द्रधनुष सन्स्था बिज़नौर द्वारा..काव्य-मर्मज्ञ सम्मान.
८.छ्त्तीसगढ शिक्षक साहित्यकार मंच, दुर्ग द्वारा-हिरदे कविरत्न सम्मान,
९.युवा कवियों की सन्स्था; ’सृजन’’ लखनऊ द्वारा महाकवि सम्मान एवं सृजन-साधना वरिष्ठ कवि सम्मान.
१०.शिक्षा साहित्य व कला विकास समिति,श्रावस्ती द्वारा श्री ब्रज बहादुर पांडे स्मृति सम्मान
११.अ.भा.साहित्य संगम,उदयपुर द्वारा राष्ट्रीय-प्रतिभा-सम्मान व शूर्पणखा काव्य-उपन्यास हेतु 'काव्य-केसरी' उपाधि |
१२. जगत सुन्दरम कल्याण ट्रस्ट द्वारा महाकवि जगत नारायण पांडे स्मृति सम्मान.
१३. बिसारिया शिक्षा एवं सेवा समिति, लखनऊ द्वारा ‘अमृत-पुत्र पदक
१४. कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, बेंगालूरू द्वारा सारस्वत सम्मान(इन्द्रधनुष –उपन्यास हेतु)
१५.विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान,इलाहाबाद द्वारा ‘विहिसा-अलंकरण’-२०१२....आदि..
१६.युवा रचनाकार मंच द्वारा डा अनंत माधव चिपलूणकर स्मृति सम्मान -२०१५
१७.साहित्यामंडल श्रीनाथ द्वारा –द्वारा हिन्दी साहित्य विभूषण सम्मान
पता—  डा श्याम गुप्त,  सुश्यानिदी

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

फिर वसंत की आत्मा आई - सुमित्रानंदन पंत


फिर वसंत की आत्मा आई,
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
देख चुका मन कितने पतझर,
ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
फिर वसंत की आत्मा आई,
विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,
स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !
सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
तुम आओगी वे थीं साधन,
तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण? 
फिर वसंत की आत्मा आई,
देव, हुआ फिर नवल युगागम,
स्वर्ग धरा का सफल समागम !

(प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की वसंत पर एक गीत)

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

पर आँखें नहीं भरीं

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

सीमित उर में चिर-असीम 
सौंदर्य समा न सका 
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग 
मन रोके नहीं रुका 
यों तो कई बार पी-पीकर 
जी भर गया छका 
एक बूँद थी, किंतु, 
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी 
कण-कण में बिखरी 
मिलन साँझ की लाज सुनहरी 
ऊषा बन निखरी, 
हाय, गूँथने के ही क्रम में 
कलिका खिली, झरी 
भर-भर हारी, किंतु रह गई 
रीती ही गगरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं।


-शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

सोमवार, 4 मार्च 2013

लौट आओ...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता सोम ठाकुर जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

लौट आओ,
माँग के सिंदूर की सौगंध
तुमको नयन का सावन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
आज पहिले प्यार की सौगन्ध
तुमको प्रीत का बचपन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
मानिनी, है मान की सौगन्ध
तुमको बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
हारती मनुहार की सौगंध तुमको
भीगता आँगन निमंत्रण दे रहा है !

- सोम ठाकुर


 

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

मैं तुझमें तू कहाँ खो गयी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता  जय कृष्ण राय 'तुषार' का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

यह भी क्षण
कितना सुन्दर है
मैं तुझमें तू कहीं खो गयी |
इन्द्रधनुष
की आभा से ही
प्यासी धरती हरी हो गयी |

जीवन बहती नदी
नाव तुम ,हम
लहरें बन टकराते हैं ,
कुछ की किस्मत
रेत भुरभुरी कुछ
मोती भी पा जाते हैं ,
मेरी किस्मत
बंजारन थी
जहाँ पेड़ था वहीँ सो गयी |

तेरी इन
अपलक आँखों में
आगत दिन के कुछ सपने हैं ,
पांवों के छाले
मुरझाये अब
फूलों के दिन अपने हैं ,
मेरा मन
कोरा कागज था
उन पर तुम कुछ गीत बो गयी |
 

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

काश तुम ......

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता राकेश श्रीवास्तव का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
 
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते
काश तुम ......
जब से ये जाना मोहब्बत का नाम
मोहब्बत को दे दिया तेरा ही नाम
मोहब्बत का पैगाम , कब का पेश कर दिए होते
काश तुम ......
मेरे होठ सिले के सिले रह गए
इजहारे मोहब्बत , न हम कर सके
मोहब्बत है तुझसे , हम तुमको बता देते
काश तुम ......
तेरा नाम लेके मै जीती रही
तेरा नाम लेके मै मरती रही
तुम करते हो प्यार मुझसे
काश पहले ही बता देते
काश हमदोनो एक दुसरे को बता देते
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते .
 
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भारतीय रेल में कार्यरत. फ़िलहाल कपूरथला में. अध्ययन-लेखन में अभिरूचि. अपने हिंदी ब्लॉग 'राकेश की रचनाएँ' के माध्यम से सक्रियता.

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

ना बदले कभी प्रेम के रंग

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक' का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...


प्रेमिका:
.
तुझसे लागी प्रीत साजना,
तुझसे लागे मेरे नैन.
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
मैन मन हारी,
मैन तन हारी,
तुझ पर ओ रे मेरे साजन,
मैने पुरी दुनिया वारी.
.
खोकर सुध-बुध,होकर बेसुध,
तुझको पूजू सुबह-शाम,
ओ साजन मै तेरी राधा,
तुम मेरे प्रियवर घनश्याम.
.
घात लगा क्यो हृदय मे बैठे,
ओ मतवारे क्यो छीने चैन,
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
प्रेमी:
.
चाह में जिसके डूबी दुनिया,
तुम उस यौवन कि हाला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
कोई गीत लिखू, कोई काव्य लिखू,
या सुन्दरता का हर भाव लिखू,
इस चन्द्रकिरण से चेरे पर,
हर एक हृदय कि आह लिखू|
.
नैनों में मदिरा है जिनकी,
और अधरों में प्याला हो,
कैसे रोके खुद को कोई,
जब हृदय इतना मतवाला हो|
.
कहाँ रंग हो, कहाँ छंद हो,
अब क्यों दीपों कि माला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
दोनों संयुक्त:
.
अब ना बीते रैन साँवरे,
जब हम तुम हो संग-संग,
ना गुजरे अब बरस प्रेम के,
ना बदले कभी प्रेम के रंग|

- प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक'

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के तहत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय गोपालसिंह नेपाली जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,
सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चाँद जाँचा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो,
मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में
दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो.


 

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा : श्रीलाल शुक्ल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा
प्यासे नयन ज्यों नयन में समा जाएँ
सारे निराधार आधार पा जाएँ
जाओ तभी जब हृदय-कम्प खो जाएँ
मेरे अधर पर तुम्हारा खिले हाथ
मेरा उदय खींच के ज्योति घेरा
छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा

- श्रीलाल शुक्ल


मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

प्रेम-गीत : तुम्हारे नहीं होने पर यहाँ कुछ भी नहीं होता

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता जय कृष्ण राय 'तुषार' का प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तुम्हारे
नहीं होने पर
यहाँ कुछ भी नहीं होता |
सुबह से
शाम मैं
खामोशियों में जागता -सोता |
तुम्हारे
साथ पतझर में
भी जंगल सब्ज लगता है ,
सुलगते
धुँए सा सिगरेट के,
अब चाँद दिखता है ,
भरे दरिया में
भी लगता है
जैसे जल नहीं होता |

नहीं हैं रंग
वो स्वप्निल
क्षितिज के इन्द्रधनुओं में ,
न ताजे
फूल में खुशबू
चमक गायब जुगुनुओं में ,
प्रपातों में
कोई खोया हुआ
बच्चा दिखा रोता |

मनाना
रूठना फिर
गुनगुनाना और बतियाना ,
किताबों में
मोहब्बत का
नहीं होता ये अफ़साना ,
हमारे सिर
का भारी बोझ
अब कोई नहीं ढोता |

किचन भी
हो गया सूना
नहीं अब बोलते बर्तन ,
महावर पर
कोई कविता नहीं
लिखता है अन्तर्मन |
टंगे हैं
खूंटियों पर अब
कोई कपड़े नहीं धोता |

खिड़कियों से
डूबता सूरज
नहीं हम देख पाते ,
अब परिन्दों
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
लौट आओ
झील में डूबें -
लगाएं साथ गोता |
*******************************************

जन्म 01-01-1969 को ग्राम -पसिका पोस्ट -बरदह जनपद -आजमगढ़ में माँ चन्द्रावती राय और पिता स्व० त्रिवेणी राय के पुत्र के रूप में हुआ |मेरा दस्तावेजों में नाम जयकृष्ण नारायण शर्मा है |मेरी प्रारम्भिक शिक्षा आजमगढ़ में हुई |उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |सम्प्रति उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत |मेरी कविताएँ बी० बी०सी० हिंदी पत्रिका लन्दन ,नया ज्ञानोदय ,आजकल ,अहा!जिंदगी ,दैनिक भाष्कर ,जनसत्ता ,आधारशिला ,नये -पुराने हिन्दुस्तानी एकेडमी ,नव निकष , अक्षर पर्व ,अप्रतिम अपरिहार्य ,युगीन काव्या नवगीत के नए प्रतिमान आदि अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं |सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में कविताएँ प्रकाशित ,आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा प्राइवेट चैनलों से कविताओं का प्रसारण |प्रथम हरिवंश राय बच्चन पुरस्कार 2006 से सम्मानित |इंटरनेट पर छान्दसिक अनुगायन और सुनहरी कलम से साहित्यिक ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय |सम्पर्क जयकृष्ण राय तुषार 63जी/7बेलीकालोनी ,स्टैनली रोड ,इलाहाबाद[ यू० पी० ]पिन -211002 Mob.no.09005912929

सोमवार, 20 जून 2011

प्रेम गीत : रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ‘इंदू‘

जब से मैंने पढ़े प्यार के,
तेरे ढाई आखर।
तब से बसा नयन में मेरे,
चेहरा तेरा सुधाकर।

वह मुस्कान मधुर सी चितवन,
मीठे बोल धरे हैं अधरन।
बनी कमान भौंह कजरारी,
लिये लालिमा कंज कपोलन।।

जब से मिला हृदय को मेरे,
कमल खिला इक सागर।

नीर भरन जब जाए सजनिया,
लचके कमर बजै पैंजनिया।
भीगी लट रिमझिम बरसाती,
डोलत हिय ललचाय नथुनिया।

जब से मिली प्रणय को मेरे
नेह नीर की गागर।

चले मद भरी छैल छबीली,
धानी चूनर नीली-पीली।
सोंधी-सोंधी गंध समेटे,
चोली बांधे गाँठ गसीली।।

जब से हुआ बदन को मेरे,
मोहन मदन उजागर।

एक बूँद अमृत पाने को,
मैं तो कब से था विष पीता।
मन में मिलने की अभिलाषा,
‘इंदु‘ पोष कर पागल जीता।।

जब से लिखा अधर पर मेरे,
तेरा नाम पता घर।।


रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ‘इंदू‘
बड़ागाँव, झांसी (उ0प्र0)-284121

सोमवार, 30 मई 2011

प्रेम-गीत : अनामिका घटक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक का एक प्रेम-गीत . आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

कतरा-कतरा ज़िंदगी का
पी लेने दो
बूँद बूँद प्यार में
जी लेने दो

हल्का-हल्का नशा है
डूब जाने दो
रफ्ता-रफ्ता “मैं” में
रम जाने दो

जलती हुई आग को
बुझ जाने दो
आंसुओं के सैलाब को
बह जाने दो

टूटे हुए सपने को
सिल लेने दो
रंज-ओ-गम के इस जहां में
बस लेने दो

मकाँ बन न पाया फकीरी
कर लेने दो
इस जहां को ही अपना
कह लेने दो

तजुर्बा-इ-इश्क है खराब
समझ लेने दो
अपनी तो ज़िंदगी बस यूं ही
जी लेने दो

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नाम:अनामिका घटक
जन्मतिथि : २७-१२-१९७०
जन्मस्थान :वाराणसी
कर्मस्थान: नॉएडा
व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत
शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.

सोमवार, 23 मई 2011

आपके दामन से : यशोधरा यादव ‘यशो‘

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता यशोधरा यादव ‘यशो‘ का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

आपके दामन से मेरा, जन्म का नाता रहा है ,
प्यार की गहराइयों का, राज बतलाता रहा है।

मौन मत बैठो कहो कुछ, आज मौसम है सुहाना,
कलखी धुन ने बजाया, प्यार का मीठा तराना।
एक सम्मोहन धरा की, मूक भाषा बोलती है,
और नभ दे दुंदुभी, नवरागिनी गाता रहा है।
आपके दामन......................।

प्यार का मकरन्द भरकर, बादलों का टोल आया,
आम की अमराइयों में, हरित ने आँचल बिछाया।
सूर्य का लुक-छुप निकलना, मुस्कराना देखकर,
मन मयूरी नृत्य कर, कर मान इतराता रहा है।
आपके दमन......................।

भाव का कोई शब्द ही तो, मेरे उर को भेदता है,
गीत की हर पंक्ति बनकर, नव सुगंध बिखेरता है।
बंसुरी की धुन बजाता है, कहीं कान्हा सुरीली,
और चितवन राधिका का, पाँव थिरकाता रहा है।
आपके दामन......................।

दीप तेरा प्यार बनकर, झिलमिलाते द्वार मेरे,
आज कोयल गीत प्रियवर, गा रही उपवन सवेरे।
मन समुंदर की हिलोरे, चूमती बेताब तट की,
रूख हवाओं का विहंस कर, गुनगुनाता जा रहा है।
आपके दामन......................।
*********************************************************************************

यशोधरा यादव ‘यशो‘,
ग्राम-जामपुर पो0- चमरौला, एत्मादपुर (आगरा)-283201

अंतर्जाल पर 'यशोधरा के गीत' के माध्यम से सक्रियता !!

सोमवार, 16 मई 2011

प्राण मेरे तुम न आये : बच्चन लाल बच्चन


मैं बुलाती रह गई, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नयन-काजल धुल गए हैं
अश्रु की बरसात से
नींद आती है नहीं-
मुझको कई एक रात से

तिलमिला उर रह गया, पर प्राण मेरे तुम न आये।
तोड़ कर यूँ प्रीत-बंधन
चल पड़े क्यों दूर मुझसे
तुम कदाचित हो उठे थे-
पूर्णतः मजबूर मुझसे

मैं ठगी सी रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नेत्र पट पर छवि तुम्हारी
नाचती आठों पहर है
याद तेरी पीर बनकर
ढ़ाहती दिल पर कहर है

मैं बिलखती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
मैं बुलाती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।

बच्चन लाल बच्चन,
12/1, मयूरगंज रोड, कोलकाता-700023


रेखांकन : किशोर श्रीवास्तव

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

वफ़ा के गीत : यशवंत माथुर

तेरी आँखों के ये आँसूं,मेरे दिल को भिगोते हैं,

तुझे याद कर-कर हम भी,रात-रात भर रोते हैं,

बिन तेरे चैन कहाँ,बिन तेरे रैन कहाँ,

जाएँ तो जाएँ कहाँ,हर जगह तेरा निशाँ,

तेरे लब जब थिरकते हैं,बहुत हम भी मचलते हैं,

चाहते हैं कुछ कहना,मगर कहने से डरते हैं॥


कितने हैं शायर यहाँ,कितने हैं गायक यहाँ,

मेरा है वजूद वहां,जाए तू जाए जहाँ,

कैसी ये प्रीत मेरी,कैसी ये रीत तेरी,

अर्ज़ है क़ुबूल कर ले,आज मोहब्बत मेरी,

तेरे अनमोल ये मोती,जाने क्यों क्यूँ यूँ बिखरते हैं,

अधरों से पीले इनको, वफ़ा के गीत कहते हैं॥
*************************************************************************
यशवंत माथुर, लखनऊ से. जीवन के 28 वें वर्ष में एक संघर्षरत युवक. व्यवहार से एक भावुक और सादगी पसंद इंसान.लिखना-पढना,संगीत सुनना,फोटोग्राफी,और घूमना-फिरना शौक हैं. पिताजी श्री विजय माथुर लेखन के क्षेत्र में प्रेरक एवं मार्गदर्शक हैं.अंतर्जाल पर जो मेरा मन कहे के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

बाँसुरी प्रीति की - नीरजा द्विवेदी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीरजा द्विवेदी जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
गुनगुनी धूप है सहला रही तन-बदन,
खिलखिलाती कली उड़ा रही है सुगन्ध,
सनसनाती हुई बह रही शीतल पवन,
अनसुनी प्रिय कथा सुना रही है मगन.

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
गुलाल किन्चती निशा, छुप गयी है गगन.
छुई-मुई सी उषा, लजा गयी बन दुल्हन.
प्रकृति ज्यों रति बनी, बढ़ा रही है अगन.
बयार सन्दली बही, जला रही तन-बदन.

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
धौंकनी श्वांस की बजा रही जल तरंग,
कामदेव तीर पर सजा रहे हैं सुमन,
करती नृत्य राधिका, ताल दे रहे मोहन,
जी की कैसे कहूँ, आओ न मेरे सजन.
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नामः नीरजा द्विवेदी/ शिक्षाः एम.ए.(इतिहास).वृत्तिः साहित्यकार एवं गीतकार. समाजोत्थान हेतु चिंतन एवं पारिवारिक समस्याओं के निवारण हेतु सक्रिय पहल कर अनेक परिवारों की समस्याओं का सफल निदान. सामाजिक एवं मानवीय सम्बंधों पर लेखन. ‘ज्ञान प्रसार संस्थान’ की अध्यक्ष एवं उसके तत्वावधान में निर्बल वर्ग के बच्चों हेतु निःशुल्क विद्यालय एवं पुस्तकालय का संचालन एवं शिक्षण कार्य.
प्रकाशन/ प्रसारण - कादम्बिनी, सरिता, मनोरमा, गृहशोभा, पुलिस पत्रिका, सुरभि समग्र आदि अनेकों पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में लेख, कहानियां, संस्मरण आदि प्रकाशित. भारत, ब्रिटेन एवं अमेरिका में कवि गोष्ठियों में काव्य पाठ, बी. बी. सी. एवं आकाशवाणी पर कविता/कहानी का पाठ। ‘
कैसेट जारी- गुनगुना उठे अधर’ नाम से गीतों का टी. सीरीज़ का कैसेट.
कृतियाँ- उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण एवं शोध विधाओं पर आठ पुस्तकें प्रकाशित- दादी माँ का चेहरा, पटाक्षेप, मानस की धुंध(कहानी संग्रह,कालचक्र से परे (उपन्यास, गाती जीवन वीणा, गुनगुना उठे अधर (कविता संग्रह), निष्ठा के शिखर बिंदु (संस्मरण), अशरीरी संसार (साक्षात्कार आधारित शोध पुस्तक). प्रकाश्य पुस्तकः अमेरिका प्रवास के संस्मरण.
सम्मानः विदुषी रत्न-अखिल भारतीय ब्रज साहित्य संगम, मथुरा, गीत विभा- साहित्यानंद परिषद, खीरी, आथर्स गिल्ड आफ़ इंडिया- 2001, गढ़-गंगा शिखर सम्मान- अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, भारत भारती- महाकोशल साहित्य एवं संस्कृति परिषद, जबलपुर, कलाश्री सम्मान, लखनऊ, महीयसी महादेवी वर्मा सम्मान- साहित्य प्रोत्साहन संस्थान लखनऊ, यू. पी. रत्न- आल इंडिया कान्फ़रेंस आफ़ इंटेलेक्चुअल्स, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान- सर्जना पुरस्कार.
अन्य- अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश पुलिस परिवार कल्याण समिति के रूप में उत्तर प्रदेश के पुलिसजन के कल्याणार्थ अतिश्लाघनीय कार्य. भारतीय लेखिका परिषद, लखनऊ एवं लेखिका संघ, दिल्ली की सक्रिय सदस्य.
संपर्क- 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनऊ. दूरभाषः 2304276 , neerjadewedy@yahoo.com

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

कैसे मीत बनूँ मैं तेरा : कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय‘


कैसे मीत बनूँ मैं तेरा।
काँटों भरा सफर है मेरा।।

कौन सारथी बने हमारा।
विरह सिन्धु में कौन सहारा ?
कैसे लड़ूँ वाहव्य वैरी से,
मैं अपनों से हारा।
क्या आयेगा पुनः सवेरा।।

कितना गम है किसे सुनाऊँ?
अपना सीना चीर दिखाऊँ।
कोई मुझे नहीं पढ़ पाया,
विवश भाव से होंठ चबाऊँ।
ऊपर से घनघोर अंधेरा।।

कैसे मीत बनूँ मैं तेरा।
काँटों भरा सफर है मेरा।।


कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय‘
ग्राम-सहिनवा पो0 गौसैसिंहपुर, सुल्तानपुर (उ0प्र0)

सोमवार, 31 जनवरी 2011

कमनीय स्वप्न : आशीष

कौन थी वो प्रेममयी , जो हवा के झोके संग आई
जिसकी खुशबू फ़ैल रही है , जैसे नव अमराई
क्षीण कटि, बसंत वसना, चंचला सी अंगड़ाई

खुली हुई वो स्निग्ध बाहें , दे रही थी आमंत्रण
नवयौवन उच्छश्रीन्खल. लहराता आंचल प्रतिक्षण
लावण्य पाश से बंधा मै, क्यों छोड़ रहा था हठ प्रण

मृगनयनी,तन्वांगी , तरुणी, उन्नत पीन उरोज
अविचल चित्त , तिर्यक दृग ,अधर पंखुड़ी सरोज
क्यों विकल हो रहा था ह्रदय , ना सुनने को कोई अवरोध

कामप्रिया को करती लज्जित , देख अधीर होता ऋतुराज
देखकर दृग कोर से मै , क्यों बजने लगे थे दिल के साज
उसके , ललाट से कुंचित केश हटाये,झुके नयन भर लाज

नहीं मनु मै, ना वो श्रद्धा, पुलकित नयन गए थे मिल
आलिंगन बद्ध होते ही उनकी , मुखार्व्रिंद गए थे खिल
हम खो गए थे अपने अतीत में , आयी समीप पुनः मंजिल .
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आशीष / अभियांत्रिकी का स्नातक, भरण के लिए सम्प्रति कानपुर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चाकरी ,साहित्य पढने की रूचि है तो कभी-कभी भावनाये उबाल मारती हैं तो साहित्य सृजन भी हो जाता है /अंतर्जाल पर युग दृष्टि के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 10 जनवरी 2011

सुनो सनम : अनामिका (सुनीता)

सुनो सनम आज
मुझे श्रृंगारित कर दो
अपने आगोश में लेकर
इस तन को
सुशोभित कर दो...
सुनो सनम आज
मुझे श्रृंगारित कर दो ...


अब तक सुनती आई हूँ..
नदी सागर में गिरती है
पर आज तुम सागर बन कर
मुझ नदी में समा जाओ
प्यार की बदली बन कर
मुझ पर बरस जाओ
सुनो सनम आज
अपने हाथों से
मुझे श्रृंगारित कर दो ...


मेरी मांग सिन्दूरी करो ..
मेरी जुल्फों की
चूडा-मणि खोल
मेरी जुल्फों की खुशबू में
अपनी साँसों को घोलो ..
आज मुझ में
खुद को डुबो लो...


मेरे माथे पर
अपने प्यासे लबों से
बिंदिया सजा दो ..
अपने कमल नयन से दर्पण में
मुझे मेरी सूरत दिखा दो ..


अपने प्यार की मुहर
मेरे रुखसारों पर दे दो
मेरे शुष्क होठों पर
अपने लरज़ते होठों की
लाली दे दो ..
सुनो सनम आज
मुझे श्रृंगारित कर दो ...!!


अपनी बाहों का
हार पहना दो ..
अपने स्पर्श से
मेरे बदन की डाली को
खिला दो..
आज आसमान बन
इस धरती को ढक दो


हाँ, सनम
आज मैं कुछ ज्यादा ही
मांगती हूँ तुमसे..
कि मेरे दिल पर
अपना हाथ रखो
मेरी धडकनों को
अपनी धडकनें सुना दो ..


आज कुछ मनुहार करो
अपनी बाहों में समेटो
कंप-कंपाते अरमानों को
अपने प्यार की
तपिश दे दो.
आज मुझे अपने हाथों से
दुल्हन सा सजा दो...!!


अंदर जो सदियों की आग है
अपने प्यार की बरखा से
तन-मन की प्यास बुझा दो
इस प्यासी ज़मीं को
आज पुलकित कर दो
अपने प्यार के सैलाब से
इसे जल-जल कर दो


सुनो सनम
आज कुछ ज्यादा ही
मांगती हूँ तुमसे
कि आज मुझे
श्रृंगारित कर दो ..!!

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नाम : अनामिका (सुनीता)जन्म : 5 जनवरी, 1969निवास : फरीदाबाद (हरियाणा)शिक्षा : बी।ए , बी.एड.व्यवसाय : नौकरीशौक : कुछः टूटा-फूटा लिख लेना, पुराने गाने सुनना।मेरे पास अपना कुछ नहीं है, जो कुछ है मन में उठी सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएं चाहे वो दुःख की हों या सुख की....मेरे भीतर चलती हैं॥ ...... महसूस होती हैं ...और मेरी कलम में उतर आती हैं.
ब्लोग्स : अनामिका की सदायें और अभिव्यक्तियाँ

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

आभास : महेश चंद्र द्विवेदी

दिवस के श्रम से श्लथ थकित
अवनि हो जाती है जब निद्रित
नील-नभ को घेर लेती कालिमा
और नक्षत्र भी सब होते हैं तंद्रित

ऐसे काले कुंतल केश वाली सुंदरि सुमुखि,
सघन तिमिर का रहस्यमय आकाश हो तुम।

ब्रह्मवेला में एक कोकिला बन
चहकती हो देकर चपल चितवन
छा जाती है तव व्रीड़ा पर लालिमा
सलज नयनों से जब देती निमंत्रण

मम हृदय में प्रीति के प्रस्फुटन का सन्देश लाती,
रक्तिम-रवि की प्रथम किरण का प्रकाश हो तुम।

अग्नि बरसाती धरा पर रविकिरन
वायु भी जब करती संतापित बदन
दग्ध धरती और दग्ध जड़-चेतन
पशु-पक्षी सब ढूंढते छाया सधन

मन के इक कोने में जगाकर स्वस्पर्श की कल्पना,
अग्नि-दग्ध इस हृदय की बुझाती प्यास हो तुम।

सूर्य जब जाने लगता है अस्तांचल
एकांत के संताप से मन होता विकल
दैदीप्यमान हो जाती स्मृति तुम्हारी
हृदय होता उतना ही अधिक विह्वल

तब शांति देती तुम्हारी आराधना की आरती ही,
गोधूलिवेला के पवन की मलयज सुवास हो तुम।

ग्रीवा में मयूर-सम मोहक चमक
तब बदन में गमके बेला की महक
तब अंगड़ाई उठाये हृत में कसक
तब दृष्टि में छिपी है गहन तड़ित

तू ही ग्रीष्म, तू ही पावस, और तू ही है शरत,
मधुर मधुमास के आगमन का आभास हो तुम।

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महेश चंद्र द्विवेदी