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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ओ प्रेम !

ओ प्रेम !
जन्मा ही कहाँ है
अभी तू मेरे कोख से कि कैसे कहूँ
तुझे जन्मदिन मुबारक

दुबका पड़ा है
अब भी मेरी कोख में
सहमा-सहमा सा कि कैसे चूमूँ
माथा तेरा
चूस रहा है
अब भी आँवल से
कतरा कतरा
लहू मेरा
कि कैसे पोषूँ
धवल से
नहीं जन्मना है
तुझे इस
कलयुगी दुनिया में
ले चले मुझे कोई ब्रह्माण्ड के उस पार !

-संगीता सेठी 
प्रशासनिक अधिकारी भारतीय जीवन बीमा निगम 
अम्बिकापुर
sangeeta.sethi@licindia.com

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

ये दुनिया हमारी सुहानी न होती


ये दुनिया हमारी सुहानी न होती,
कहानी ये अपनी कहानी न होती ।

ज़मीं चाँद -तारे सुहाने न होते,
जो प्रिय तुम न होते,अगर तुम न होते।
न ये प्यार होता,ये इकरार होता,
न साजन की गलियाँ,न सुखसार होता।

ये रस्में न क़समें,कहानी न होतीं,
ज़माने की सारी रवानी न होती ।
हमारी सफलता की सारी कहानी,
तेरे प्रेम की नीति की सब निशानी ।

ये सुंदर कथाएं फ़साने न होते,
सजनि! तुम न होते,जो सखि!तुम न होते ।


तुम्हारी प्रशस्ति जो जग ने बखानी,
कि तुम प्यार-ममता की मूरत,निशानी ।
ये अहसान तेरा सारे जहाँ पर,
तेरे त्याग -द्रढता की सारी कहानी ।

ज़रा सोचलो कैसे परवान चढ़ते,
हमीं जब न होते,जो यदि हम न होते।
हमीं हैं तो तुम हो सारा जहाँ है,
जो तुम हो तो हम है, सारा जहाँ है।

अगर हम न लिखते,अगर हम न कहते,
भला गीत कैसे तुम्हारे ये बनते।
किसे रोकते तुम, किसे टोकते तुम,
ये इसरार इनकार ,तुम कैसे करते ।

कहानी हमारी -तुम्हारी न होती,
न ये गीत होते, न संगीत होता।

सुमुखि !तुम अगर जो हमारे न होते,
सजनि!जो अगर हम तुम्हारे न होते॥

डा श्याम गुप्त
  के-३४८, आशियाना, लखनऊ २२६०१२
drgupta04@gmail.com

शनिवार, 13 जून 2015

जब से मैं रंगा हूँ तेरे प्रेम रंग में रंग रसिया

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सुभाष प्रसाद गुप्ता की  कविताएं. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

जब से मैं रंगा हूँ तेरे प्रेम रंग में रंग रसिया,
मेरा तन मन सब  इंद्रधनुषी होने  लगा हैI


जब से मिला है धरकन तेरे सुर में प्रेम पिया,
मध्यम के  बिना सुर सप्तक सजने लगा हैI


जब से चला है तेरे प्रेम का जादू मन माहिया,
मद्यपान  बिना मेरा सुध बुध खोने लगा हैI


जब से मिला है तेरा पथ साथ में सोने साथिया,
अब चाँद और धरा की दूरी सिमटने लगा हैI


जब से मन मगन है तेरे धुन में संग सांवरिया,
साज़ सरगम के बिना कदम थिरकने लगा हैI

जब से मिला है तेरे रूह में साँस वन बसिया,
चंपा चमेली खिले बिना सुबास होने लगा हैI




विरहों के अग्नि में लपटी है वर्षों से मेरी काया
दादूर पुकारती सांवरिया सावन की भाषा बोल दो


माघ की शीत वसन में सिमटी है तेरी माया
कोयल कूँ कूँ पुकारती सांवरिया रंग बसंती घोल दो


अंधियारी दिवा में बिलखती है तेरी किशलया
पपीहरा पीयूँ  पुकारती सांवरिया अधर पट खोल दो


मधुर मिलन की आस में तरसती है तेरी छाया
भँवरे गुं गुं पुकारती सांवरिया प्रेम गीत मोल दो


तीव्र सप्तक  के लय में थिरकती है तेरी सौम्या
घुँघरू झनन  पुकारती सांवरिया पंचम रस घोल दो

***********************************************************
नाम                               : सुभाष प्रसाद गुप्ता
जन्म तिथि                      : ०७/ १/ १९७५
जन्म स्थान                     : बिहार में मिथिला और भोजपुरी की अभिसरण स्थली में बागमती नदी के किनारे
शिक्षा                 :        किरोड़ीमल महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) से स्नातकोत्तर (राजनीतिज्ञ विज्ञान)
                          :        केंद्रीय हिंदी संस्थान से परा स्नातकोत्तर डिप्लोमा (जनसंचार और पत्रकारिता)
प्रशिक्षण               : भारतीय विदेश व्यापार संस्थान, नई दिल्ली से विदेश व्यापार में उन्मुखीकरण कार्यक्रम
                              : भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलूरू से सार्वजनिक नीति प्रबंधन में उन्मुखीकरण कार्यक्रम
                              :  तुर्की भाषा में उच्चतर  डिप्लोमा (अंकारा विश्वविद्यालय, तुर्की )

 पेशा                  :      पेशेवर कूटनीतिज्ञ (भारतीय विदेश सेवा)
पदस्थापन             : भारतीय कूटनिक मिशन  जकार्ता , अंकारा और इस्तांबुल में विभिन्न कार्यों का संपादन
                            : वर्तमान में प्रथम सचिव (राजर्थिक), भारत का राजदूतावास, खार्तूम, सूडान
भाषिक ज्ञान           : संस्कृत, हिंदी और इसकी विभिन्न बोलियाँ, अंग्रेजी, ऊर्दू, तुर्की और अज़री

 परिवार                : पत्नी (डा० रूचि गुप्ता - दन्त चिकित्सक) पुत्री-शताक्षी सुरुचि और पुत्र: ऋत्विक सुभांश
अभिरुचि              : ग़ज़ल, गीत और रंगमंच लेखन, अभिनय, फोटोग्राफी, संगीत सुनना इत्यादिi
हिंदी में लेखन          : पिछले पच्चीस वर्षों से, गीत (शताधिक), नाटक (प्रायोजित मिडिया और घूंघट में                                           
                                 पंचायत) रचनाएँ अप्रकाशित
ब्लॉग                 : क्षितिज की तरफ़ अनवरत सफ़र (http://subhashpgupta.blogspot.com/)
लक्ष्य                 : वैश़्विक शांति और भारतीय हितों की प्रोन्नति

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

हर जनम में साथ रहना, हर समय तुम मुस्कराना

तुम अकेले रह गए तो भोर का तारा बनूं मै।
मै अकेला रह गया तो रात बनकर पास आना।

तुम कलम की नोक से उतरे हो अक्षर की तरह।
मै समय के मोड़ पर बिखरा हूँ प्रस्तर की तरह।
तुम अकेले बैठकर बिखरी हुई प्रस्तर शिला पर,
सांध्य का संगीत कोई मौन स्वर में गुनगुनाना।

एक परिचय था पिघलकर घुल गया है सांस में।
रात भर जलता रहा दीपक सृजन की आस में।
दृश्य अंकित है तुम्हारा मिट न पाया आज तक
बिखरे हुए सपनों को चुनकर प्यार का एक घर बसाना।

बह रहा दरिया न रोको भंवर का परिहास देखो।
कह रहा उठ गिर कहानी लहर का अनुप्रास देखो।
एक कश्ती की तरह मै तुम किनारे के पथिक हो
शाम होते ही नदी से अपने घर को लौट जाना।

पर्वतों के पार जाकर मै तुम्हे आवाज दूंगा।
प्रीति के तारों से निर्मित मै तुम्हें एक साज दूंगा।
मेरी नज़रों में उतरकर आखिरी अनुबंध कर लो
हर जनम में साथ रहना हर समय तुम मुस्कराना।

-रविनंदन सिंह 
संपादक -'हिंदुस्तानी' शोध पत्रिका  

हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

प्रेम जीवन की परिभाषा है...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज  'वेलेंटाइन डे' पर  प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती लीला तिवानी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 



प्रेम मन की आशा है, 
करता दूर निराशा है, 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम जीवन की परिभाषा है. 

प्रेम से ही सुमन महकते हैं, 

प्रेम से ही पक्षी चहकते हैं, 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम से ही सूरज-चांद-तारे चमकते हैं, 

प्रेम शीतल-मंद-सुवासित बयार है, 
ऋतुओं में बसंत बहार है, 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम आनंद का आधार है. 

प्रेम हमारी आन है. 
प्रेम देश की शान है. 
चन्द शब्दों में कहें तो, 
प्रेम प्रभु का वरदान है. 

रविवार, 3 नवंबर 2013

यही प्यार है


डायरी के पुराने पन्नों को पलटिये तो बहुत कुछ सामने आकर घूमने लगता है. ऐसे ही इलाहाबाद विश्विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्यार को लेकर एक कविता लिखी थी. आज आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ-

दो अजनबी निगाहों का मिलना
मन ही मन में गुलों का खिलना
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों ने आपस में ही कुछ इजहार किया
हरेक मोड़ पर एक दूसरे का इंतजार किया
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों की बातें दिलों में उतरती गई
रातों की करवटें और लम्बी होती गई
हाँ, यही प्यार है............ !!

सूनी आँखों में किसी का चेहरा चमकने लगा
हर पल उनसे मिलने को दिल मचलने लगा
हाँ, यही प्यार है............ !!

चाँद व तारे रात के साथी बन गये
न जाने कब वो मेरी जिन्दगी के बाती बन गये
हाँ, यही प्यार है............ !!


कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

एक सपना

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  अरविंद भटनागर ' शेखर'  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 


सपने, तान्या
एक दम छोटे से बच्चे 
जैसे होते हैं/
अपने मे खोए से / 
जाने क्या सोचते रहते हैं/
फिर हौले से मुस्कुरा देते हैं/
फिर कुछ गुनगुनाने लगते हैं/
फिर गाने लगते हैं/
फिर नाचने लगते हैं/
फिर चकित हो जाते हैं/
फिर खामोश हो जाते हैं/
फिर उदास हो जाते हैं/
फिर सुबकने लगते हैं/
फिर दर्द की भाप मे बदल जाते हैं/
ओर दिल से उठ कर 
आँखों की कोरों पर आ के 
बैठ जाते हैं/
ओर खोई खोई आँखों से 
अपनी तान्या को खोजने लगते हैं/
फिर उन्ही गालों पर
बहने लगते हैं
जिन्हे तुमने  चूमा था/
भीगे भीगे इस मौसम मे/
ऐसा ही एक सपना 
मेरे दिल से उठ कर /
मेरी आँखों की कोरों पर 
आ बैठा है/
ओर  खोज रहा है  तुम्हे |

-अरविंद भटनागर ' शेखर'

बुधवार, 25 सितंबर 2013

है चाहता बस मन तुम्हें

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण शलभ जी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

शीतल पवन, गंधित भुवन
आनन्द का वातावरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

शतदल खिले भौंरे जगे
मकरन्द फूलों से भरे
हर फूल पर तितली झुकी
बौछार चुम्बन की करे
सब ओर मादक अस्फुरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

संझा हुई सपने जगे
बाती जगी दीपक जला
टूटे बदन घेरे मदन
है चक्र रतिरथ का चला
कितने गिनाऊँ उद्धरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

नीलाभ जल की झील में
राका नहाती निर्वसन
सब देख कर मदहोश हैं
उन्मत्त चाँदी का बदन
रसरंग का है निर्झरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें.
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कृष्ण शलभ बाल रचनाकार के अतिरिक्त गीत और गज़लों के क्षेत्र में एक जाना माना नाम हैं। वे भारत की सभी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।जन्म- १८ जुलाई १९४५ को सहारनपुर में।

प्रकाशित कृतियाँ-
चार बालगीत संग्रह- ओ मेरी मछली, टिली लिली झर्र, चीं चीं चिड़िया और सूरज की चिट्ठी। सहित एक वृहद संकलन ५५१ बाल कविताएँ जिसमें हिंदी बाल गीतों पर एक शोध भी प्रस्तुत किया गया है।

सम्मान पुरस्कार-
हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के पुरस्कार, भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर, नागरी साहित्य संस्थान बलिया, सृजन संस्थान रुड़की तथा अन्य अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत सम्मानित

शनिवार, 14 सितंबर 2013

मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  उदयभानु ‘हंस’ जी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

तू चाहे चंचलता कह ले,
तू चाहे दुर्बलता कह ले,
दिल ने ज्यों ही मजबूर किया,

 मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा।

यह प्यार दिए का तेल नहीं,
दो चार घड़ी का खेल नहीं,
यह तो कृपाण की धारा है,
कोई गुड़ियों का खेल नहीं।
तू चाहे नादानी कह ले,
तू चाहे मनमानी कह ले,
मैंने जो भी रेखा खींची, 

तेरी तस्वीर बना बैठा।

मैं चातक हूँ तू बादल है,
मैं लोचन हूँ तू काजल है,
मैं आँसू हूँ तू आँचल है,
मैं प्यासा तू गंगाजल है।
तू चाहे दीवाना कह ले,
या अल्हड़ मस्ताना कह ले,
जिसने मेरा परिचय पूछा, 

मैं तेरा नाम बता बैठा।

सारा मदिरालय घूम गया,
प्याले प्याले को चूम गया,
पर जब तूने घूँघट खोला,
मैं बिना पिए ही झूम गया।
तू चाहे पागलपन कह ले,
तू चाहे तो पूजन कह ले,
मंदिर के जब भी द्वार खुले, 

मैं तेरी अलख जगा बैठा।

मैं प्यासा घट पनघट का हूँ,
जीवन भर दर दर भटका हूँ,
कुछ की बाहों में अटका हूँ,
कुछ की आँखों में खटका हूँ।
तू चाहे पछतावा कह ले,
या मन का बहलावा कह ले,
दुनिया ने जो भी दर्द दिया, 

मैं तेरा गीत बना बैठा।

मैं अब तक जान न पाया हूँ,
क्यों तुझसे मिलने आया हूँ,
तू मेरे दिल की धड़कन में,
मैं तेरे दर्पण की छाया हूँ।
तू चाहे तो सपना कह ले,
या अनहोनी घटना कह ले,
मैं जिस पथ पर भी चल निकला, 

तेरे ही दर पर जा बैठा।

मैं उर की पीड़ा सह न सकूँ,
कुछ कहना चाहूँ, कह न सकूँ,
ज्वाला बनकर भी रह न सकूँ,
आँसू बनकर भी बह न सकूँ।
तू चाहे तो रोगी कह ले,
या मतवाला जोगी कह ले,
मैं तुझे याद करते-करते,

 अपना भी होश भुला बैठा।

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उदयभानु ‘हंस’ 
जन्‍म: २ अगस्‍त १९२६ 

शिक्षा: प्रभाकर, शास्‍त्री एवं एम.ए. (हिन्‍दी)

कार्यक्षेत्र: अध्यापन एवं लेखन। सनातन धर्म संस्‍कृत कॉलेज, मुलतान (१९४५-४७), रामजस कॉलेज, दिल्‍ली (१९५२-५३), गवर्नमेंट कॉलेज, हिसार (१९५४) - प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्‍त (१९८८)। 

प्रकाशित कृतियाँ: 'उदयभानु हंस रचनावली' दो खंड (कविता) दो खंड (गद्य)।

सम्मान एवं पुरस्कार: अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से अलंकृत। देश विदेश में कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कवि, 'दूरदर्शन' के दिल्‍ली एवं जालन्‍धर केन्‍द्रों द्वारा तीस-तीस मिनट के दो 'वृत्‍तचित्रों' का निर्माण एवं प्रसारण, हिन्‍दी में 'रूबाई' के प्रवर्तक कवि १९४८ 'रूबाई सम्राट' नाम से लोकप्रिय।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

खिलता वसंत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती फाल्गुनी की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

इन फूलों का नाम मैं नहीं जानती, 
जानती हूं उस वसंत को 
जो इन फूलों के साथ मेरे कमरे में आया है .... 

चाहती हूं 
तुमसे रूठ जाऊं 
कई दिनों तक नजर ना आऊं 

मगर कैसे 
वासंती मौसम के पीले फूल 
ठीक मेरे सामने हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 

सोचती हूं 
तुमसे मिले 
जब गुजर जमाना जाएगा
तब भी 
जीवन के हर एकांत में 
पीले फूलों का यह खिलता वसंत 
हर मौसम में मुझे 
मुझमें ही मिल जाएगा 
और तब तुम्हारा अनोखा प्यार 
मुझे बहुत याद आएगा।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

पर आँखें नहीं भरीं

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

सीमित उर में चिर-असीम 
सौंदर्य समा न सका 
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग 
मन रोके नहीं रुका 
यों तो कई बार पी-पीकर 
जी भर गया छका 
एक बूँद थी, किंतु, 
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी 
कण-कण में बिखरी 
मिलन साँझ की लाज सुनहरी 
ऊषा बन निखरी, 
हाय, गूँथने के ही क्रम में 
कलिका खिली, झरी 
भर-भर हारी, किंतु रह गई 
रीती ही गगरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं।


-शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

बुधवार, 11 सितंबर 2013

यूँ लगा मुझको

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  अरविंद भटनागर ' शेखर'  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 


चाँद झाँका
बादलों की ओट से ,
चाँदनी चुपके से आ
खिड़की के रस्ते,
बिछ गई बिस्तर पे मेरे
और 
हवा  का एक झोंका,
सोंधी सी खुश्बू लिए
छू कर गया गालों को मेरे 
यूँ लगा मुझको कि
तुम सोई हो मेरे पास ,
मेरी बाहों के घेरे में 
लेकर होठों पर
एक इंद्रधनुषी मुस्कुराहट
तृप्त |

-  अरविंद भटनागर ' शेखर'

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सखी तू मत हो उदास

 
हल्दू हल्दू बसंत का मौसम
शीतल हवा कभी गर्म है मौसम
रक्तिम रक्तिम फूले प्लास
सखी तू क्यों है उदास?

सज़ल नेत्र क्यों खड़ी हुई है ?
दुखियारी सी बनी हुई है
क्यों छोड़ रही गहरी श्वास
सखी तू क्यों भई उदास?

केश तुम्हारे खुले हुए हैं
बादल जैसे मचल रहे हैं
बसंत मे सावन कि आस
सखी तू क्यों है उदास?

वृक्ष पल्लवित हो रहे हैं
पीत पत्र संग छोड़ रहे हैं
नव जीवन सी सजी आस
सखी तू कैसे बनी उदास?

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
भंवरे उन पर मचल रहे हैं
तितली भी मकरंद कि आस
सखी तू किसलिए भई उदास?

कलियाँ खिलती,भंवरे गाते
पेड़ों पर पक्षी शोर मचाते
चहुँ और सजा है मधु मास
सखी तू कैसे भई उदास?

पिया मिलन जल्दी होगा
भँवरा फूल संग होगा
रखो जीवन मे विश्वास
सखी तू मत हो उदास|

डॉ अ कीर्तिवर्धन

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

रंग बिरंगी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अवनीश कुमार की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
तुम-
 
गुलाबी हो
जैसे नवजात की नज़र

 
तुम-
 
हरी हो
जैसे नवेली वसंत की ऊष्मा

 
तुम-
 
नीली हो
जैसे बड़े परदे की बड़ी सी फिल्म
 
तुम-
 
उजली हो
जैसे हर रोज़ धुलती कमीज़
 
तुम-
 
नारंगी हो
जैसे छनती हुई रौशनी

 
तुम-
 
लाल हो
जैसे मध्य भारत की मिट्टी

 
तुम-
 
भूरी हो
जैसे शाम के वक़्त चौखट
 
रंग-बिरंगी हो
जैसे स्कूल से लौटी बच्ची
जैसे आंग्ल-भाषाई चपलता
जैसे हमारी बातचीत
 
-अवनीश
 
**********************************************************************************
 
अवनीश कुमार. लेखन-अध्ययन में रूचि . फ़िलहाल अपने ब्लॉग असहमति की कविता और सशब्द-विद्रोह के माध्यम से सक्रियता.

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

यादें - नीलम पुरी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीलम पुरी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

ए जाने जाना ,
ए नादान हसीना ,
तुम जब इठलाती हो और इतराती हो ,
मुझे बल खाती नदी सी लगती हो ,
बिलकुल ऐसे जैसे ...
लहरों का उठना फिर नदी में ही समां जाना .
कभी लगती हो शोख तितली सी ..
फूलों से रंग चुरा कर ज्यूँ तितली उड़ जाती है ,
तुम भी जब आती हो ...
मेरे सारे रंग समेट कर चली जाती हो .
तेरा ये मरमरी जिस्म ..
मेरे होश उड़ा देता है ..
तुम मासूम सी ,कुछ नादान सी ,
जब भी तुम्हे देखता हूँ तब होश नहीं रहता ,
तुम्हारा बदन है या संगेमरमर से तराशी हुई मूरत कोई ,
तुम्हे देखता हूँ तो होश गँवा बैठता हूँ ,
फिर भी तुम्हे दिल मे समां लेना चाहता हूँ .
खुद को खो देना चाहता हूँ तेरे ही अंदर कहीं ,
तेरे आने की इक आह्ट ,
भर देती है इन्द्रधनुषी रंगों से मेरी आँखें ,
क्यूँ तेरे आने से सारा आलम महक जाता है ,
क्यूँ तेरी खुशबु मदहोश कर जाती है मुझे ,
जब भी आती हो अपनी यादें दे जाती हो ,
तब य़े अरमान जाग उठते हैं ,
कसम खायंगे फलक तक साथ निभाएँगे ,
रहें ना रहें हम साथ साथ ,
फिर भी साथ निभाएंगे ,
और तुम अक्सर ,बिना कोई वादा किये लौट जाती हो,
तुम्हारे ख्यालों का अहसास ,
तुम्हारे बदन की तपिश ,
दे जाती है दर्द भरा सुकून ,
और छोड़ जाती हो भीनी भीनी अपनी खुशबु के साथ ,
मुझे यूँ ही तनहा ,
लेकिन अपनी हसीं यादों के साथ !

*********************************************************************************** नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

तुम और चाँद : कृष्ण कुमार यादव

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण कुमार यादव जी की एक कविता 'तुम और चाँद'.आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

रात का पहर
जब मैं झील किनारे
बैठा होता हूँ
चाँद झील में उतरकर
नहा रहा होता है
कुछ देर बाद
चाँद के साथ
एक और चेहरा
मिल जाता है
वह शायद तुम्हारा है
पता नहीं क्यों
बार-बार होता है ऐसा
मैं नहीं समझ पाता
सामने तुम नहा रही हो
या चाँद
आखिरकार, झील में
एक कंकड़ फेंककर
खामोशी से मैं
वहाँ से चला आता हूँ।
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कृष्ण कुमार यादव :
10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.) के एक प्रतिष्ठित परिवार में श्री राम शिव मूर्ति यादव एवं श्रीमती बिमला यादव के प्रथम सुपुत्र-रूप में जन्म। आरंभिक शिक्षा बाल विद्या मंदिर, तहबरपुर (आजमगढ़), जवाहर नवोदय विद्यालय-जीयनपुर आजमगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद वि.वि. से 1999 में राजनीति शास्त्र में एम.ए. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ और कानपुर में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक पद पर आसीन। 28 नवम्बर, 2004 को आकांक्षा यादव से विवाह। दो पुत्रियाँ: अक्षिता (जन्म- 25 मार्च, 2007) और तान्या (जन्म-27 अक्तूबर 2010)।

प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम। अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित-'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005)'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years'(2006) एवं 'श्क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा' (2007)। देश-विदेश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, वर्तमान साहित्य, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारतीय, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, गिरिराज, पंजाब सौरभ, अकार, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, हिन्दी चेतना (कनाडा), युग तेवर, शेष, अक्सर, अलाव, इरावती, उन्नयन, भारत-एशियाई साहित्य, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, लोकायत, शुक्रवार, इण्डिया न्यूज, द सण्डे इण्डियन, छपते-छपते, प्रगतिशील आकल्प, युगीन काव्या, आधारशिला, वीणा, दलित साहित्य वार्षिकी, बाल वाटिका, गोलकोेण्डा दर्पण, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, दक्षिण भारत, केरल ज्योति, द्वीप लहरी, इत्यादि में रचनाएँ प्रकाशित।

इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में काव्य-रचनाएँ संकलित। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, ब्लॉग- अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, लेखनी, कृत्या, उदंती.काम, काव्यांजलि, रचनाकार, विश्वगाथा, परिकल्पना ब्लॉगोत्सव, हिन्दी हाइकु, हिन्दी नेस्ट, हिंदी मीडिया, हिंदी साहित्य मंच, हमारी वाणी, स्वतंत्र आवाज डाॅट काम, स्वर्गविभा, कलायन, सार्थक सृजन, आखर कलश, शब्दकार, अपनी माटी, वांग्मय पत्रिका, ई-हिन्दी साहित्य, सुनहरी कलम से, नारायण कुञ्ज, कवि मंच, इत्यादि पर रचनाएँ प्रकाशित। व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर डाकिया डाक लाया और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ , ‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉग के माध्यम से सक्रियता।

आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार का प्रसारण। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ संकलित। ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’ (सितम्बर 2007) एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ‘गुफ्तगू‘ (मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित। व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित। भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘ व ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”काव्य शिरोमणि” एवं ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त।

संपर्क: कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com


सोमवार, 18 जुलाई 2011

तुम्हारे अंक में


अंशल
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!
अनुराग के साथ
हमने थामा था
एक-दूजे का हाथ
अग्नि के संग-संग
फेरों में
वचनों ने हमें बांधा था
वह बंधन
सदा सुदृढ़ रहा
सरिता
सुजल प्रेम का
हर पल बहा
प्रिय!
सौखिक रहा
तेरा सहारा,
अंशल
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!
कभी ऊंच-नीच
कभी मनमुटाव
कभी वाक-युद्ध
कभी शांत भाव
कभी रूठना
कभी गुनगुनाना
कभी सोचना
कभी खिलखिलाना
हम-हम रहे
हम युग्म हुये
चलते रहे हैं साथ-साथ
प्रशस्त हुआ
मार्ग सारा,
अंशल,
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!

-राजेश कुमार
शिव निवास, पोस्टल पार्क चौराहा से पूरब, चिरैयाटांड,पटना-800001

सोमवार, 4 जुलाई 2011

कल जीवन से फिर मिला : आशीष

कल वो सामने बैठी थी
कुछ संकोच ओढे हुए
सजीव प्रतिमा, झुकी आंखे
पलकें अंजन रेखा से मिलती थी

मेरे मन के निस्सीम गगन में
निर्जनता घर कर आयी थी
आकुल मन अब विचलित है
मुरली बजने लगी जैसे निर्जन में

खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
सद्य स्नाता चंचला जैसे
निकल आयी हो चन्द्र किरण से

उसने जो दृष्टी उठाई तनिक सी
मिले नयन उर्ध्वाधर से
अधखुले अधरों में स्पंदन
छिड़ती मधुप तान खनक सी

ना जाने ले क्या अभिलाष
मेरे जीवन की नवल डाल
बौराए नव तरुण रसाल
नव जीवन की फिर दिखी आस

सुखद भविष्य के सपनो में
निशा की घन पलकों में झांक रहा
बिभावरी बीती, छलक रही उषा
जगी लालसा ह्रदय के हर कोने में !!
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आशीष राय/ अभियांत्रिकी का स्नातक, भरण के लिए सम्प्रति कानपुर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चाकरी, साहित्य पढने की रूचि है तो कभी-कभी भावनाये उबाल मारती हैं तो साहित्य सृजन भी हो जाता है /अंतर्जाल पर युग दृष्टि के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 6 जून 2011

मेरी कौन हो तुम : सुमन 'मीत'

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सुमन 'मीत' की एक कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !

मैं पथिक तुम राह
मैं तरु तुम छाँव
मैं रेत तुम किनारा
मैं बाती तुम उजियारा

पूछती हो मुझसे मेरी....!

मैं गीत तुम सरगम
मैं प्रीत तुम हमदम
मैं पंछी तुम गगन
मैं सुमन तुम चमन

पूछती हो मुझसे मेरी....!

मैं बादल तुम बारिश
मैं वक्त तुम तारिख
मैं साहिल तुम मौज
मैं यात्रा तुम खोज

पूछती हो मुझसे मेरी....!

मैं मन तुम विचार
मैं शब्द तुम आकार
मैं कृत्य तुम मान
मैं शरीर तुम प्राण

पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !!
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सुमन 'मीत'/मण्डी, हिमाचल प्रदेश/ मेरे बारे में-पूछी है मुझसे मेरी पहचान; भावों से घिरी हूँ इक इंसान; चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ; वादा है मेरा न छोडूगी हाथ; जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत; इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी “मीत”! अंतर्जाल पर बावरा मन के माध्यम से सक्रियता.






सोमवार, 9 मई 2011

एक प्रेमलता कुम्भलाई सी : प्रकाश यादव "निर्भीक"

हर शाम का वह पहर
जब हर किसी में होड होती है
जल्दी जाने को अपना घर
शहर की तेज रफ़्तार जिन्दगी में
होती नहीं किसी को तनिक फ़िकर
एक प्रेमलता के दर्द की
जिसका पत्थर ही बना हमसफ़र
खडी है सहारे जिसके आजतक
निहारती रही अपलक उसकी डगर
जो किया था प्रेमालाप कभी
इसी जगह इसी मोड पर
प्रेमलता कुम्भला सी गई अब
प्रियतम के दीदार को एक नजर
मिली न छाया स्नेह का उसे
झुलसती प्रतीक्षा में दिनभर
रजनी आई पास जब
साथ लेकर जख्में जिगर
विह्वल हो गई वह अचानक
थरथरा उठे व्याकुल अधर
पर कह न सकी दर्द दिल का
रोती रही दोनों रातभर
सुबह होते ही ये अश्रुकण
शबनम बन गये बिखर
रात साथ छोड चली गई
संग रह गया फिर वही पत्थर
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प्रकाश यादव "निर्भीक"
अधिकारी, बैंक ऑफ बड़ौदा, तिलहर शाखा,
जिला शाहजहाँपुर, उ0प्र0 मो. 09935734733
E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in