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मंगलवार, 21 सितंबर 2010

यौवन

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता कवि कुलवंत सिंह का गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

सोने की थाली में यदि
मैं चांदनी भर पाऊँ,
प्रेम रूप पर गोरी तेरे
भर भर हाथ लुटाऊँ।

हवा में घुल पाऊँ यदि
तेरी सांसो मे बस जाऊँ,
धड़कन हृदय की
वक्ष के स्पंदन मैं बन जाऊँ।

अलसाया सा यौवन तेरा
अंग अंग में तरुणाई,
भर लूँ मैं बांहे फ़ैला
बन कर तेरी ही अंगड़ाई।

चंदन बन यदि तन से लिपटूं
महकूँ कुंआरे बदन सा,
मदिरा बन मैं छलकूँ
अलसाये नयनों से प्रीत सा।

स्वछंद-सुवासित-अलकों में
वेणी बन गुंध जाऊँ,
बन नागिन सी लहराती चोटी
कटि स्पर्श सुख पाऊँ।

अरुण अधर कोमल कपोल
बन चंद्र किरन चूम पाऊँ,
सेज मखमली बन
तेरे तन से लिपट जाऊँ।
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( सप्तरंगी प्रेम पर कुलवंत सिंह की अन्य रचनाओं के लिए क्लिक करें)

शनिवार, 12 जून 2010

झंकृत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता कवि कुलवंत सिंह का गीत 'झंकृत'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

झन - झन झंकृत हृदय आज है
वपु में बजते सभी साज हैं ।
पी आने का मिला भास है
मिटेगा चिर विछोह त्रास है ।

मंद - मंद मादक बयार है
खिल प्रकृति ने किया शृंगार है ।
आनन सरोज अति विलास है
कानन कुसुम मधु उल्लास है ।

अंग - अंग आतप शुमार है
देह नही उर कि पुकार है ।
दंभ, मान, धन सब विकार है
प्रेम ही जीवन आधार है ।

रोम - रोम रस, रुधित राग है
मिला जो तेरा अनुराग है ।
मन सुरभित, तन नित निखार है
नभ - मुक्त, तल नव विस्तार है ।

घन - घन घोर घटा अपार है
संग तुम मेरा अभिसार है ।
अनंत चेतना का निधान है
मिलन हमारा प्रभु विधान है ।


(कुलवंत सिंह जी के जीवन-परिचय के लिए क्लिक करें)

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

प्रणय गीत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता कवि कुलवंत सिंह का प्रणय-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।

शीतल अनिल अनल दहकाती,
सोम कौमुदी मन बहकाती,
रति यामिनी बीती जाती,
प्राण प्रणय आ सेज सजा दो ।
गीत प्रणय का अधर सजा दो ।

गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।

ताल नलिन छटा बिखराती,
कुंतल लट बिखरी जाती,
गुंजन मधुप विषाद बढाती,
प्रिय वनिता आभास दिला दो ।
गीत प्रणय का अधर सजा दो ।

गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।

नंदन कानन कुसुम मधुर गंध,
तारक संग शशि नभ मलंद,
अनुराग मृदुल शिथिल अंग,
रोम रोम मद पान करा दो ।
गीत प्रणय का अधर सजा दो ।

गीत प्रणय का अधर सजा दो ।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो ।

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नाम- कुलवंत सिंह
स्थान- मुंबई
रुचियां - कवि सम्मेलनो में भाग लेना। मंच संचालन। क्विज मास्टर। विज्ञान प्रश्न मंच प्रतियोगिता आयोजन। मानव सेवा धर्म - डायबिटीज, जोड़ों का दर्द, आर्थराइटिस, कोलेस्ट्रोल का प्राकृतिक रूप से स्थाई इलाज। अंतर्जाल पर गीत सुनहरे के माध्यम से सक्रियता.