'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सूरज पी. सिंह की कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
तुम्हीं उतरते हो
घास की पत्तियों में बनकर मिठास
जल की शीतलता तुमसे ही है
नदियों की गति तुम ही तो हो
तुम्हीं, तपन बनकर
सूरज में रहते हो
और तुम्हीं
चांदनी की रेशम भी बुनते हो.
माटी में कोई बीज रखूं, तो
अंकुर बन कौन फूटता है?
पेड़ों से गुज़रती हवाओं की सरसराहट
एक रहस्य है
खोलने बैठूं, तो
तुम्हारी ही आहट सुन जाता हूं.
एक गिलहरी
मेरी ओर प्यार से देखती है
एक गोरैया
फुदककर मेरे बाज़ू बैठती है
एक कली
खिलकर, मेरी ओर
थोड़ा रंग, थोड़ी ख़ुशबू उछालती है.
भला क्या करूं मैं, कि इन सबमें
मुझे तेरी शरारत झांकती-सी लगती है?
हर तरफ़, जो तुम ही तुम हो
कहां रखूं
मैं अपना प्यार तुमसे छुपाकर ?
सूरज पी. सिंह
A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई
तुम्हीं उतरते हो
घास की पत्तियों में बनकर मिठास
जल की शीतलता तुमसे ही है
नदियों की गति तुम ही तो हो
तुम्हीं, तपन बनकर
सूरज में रहते हो
और तुम्हीं
चांदनी की रेशम भी बुनते हो.
माटी में कोई बीज रखूं, तो
अंकुर बन कौन फूटता है?
पेड़ों से गुज़रती हवाओं की सरसराहट
एक रहस्य है
खोलने बैठूं, तो
तुम्हारी ही आहट सुन जाता हूं.
एक गिलहरी
मेरी ओर प्यार से देखती है
एक गोरैया
फुदककर मेरे बाज़ू बैठती है
एक कली
खिलकर, मेरी ओर
थोड़ा रंग, थोड़ी ख़ुशबू उछालती है.
भला क्या करूं मैं, कि इन सबमें
मुझे तेरी शरारत झांकती-सी लगती है?
हर तरफ़, जो तुम ही तुम हो
कहां रखूं
मैं अपना प्यार तुमसे छुपाकर ?
सूरज पी. सिंह
A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई