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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

पर आँखें नहीं भरीं

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

सीमित उर में चिर-असीम 
सौंदर्य समा न सका 
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग 
मन रोके नहीं रुका 
यों तो कई बार पी-पीकर 
जी भर गया छका 
एक बूँद थी, किंतु, 
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी 
कण-कण में बिखरी 
मिलन साँझ की लाज सुनहरी 
ऊषा बन निखरी, 
हाय, गूँथने के ही क्रम में 
कलिका खिली, झरी 
भर-भर हारी, किंतु रह गई 
रीती ही गगरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं।


-शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

सोमवार, 4 मार्च 2013

लौट आओ...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता सोम ठाकुर जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

लौट आओ,
माँग के सिंदूर की सौगंध
तुमको नयन का सावन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
आज पहिले प्यार की सौगन्ध
तुमको प्रीत का बचपन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
मानिनी, है मान की सौगन्ध
तुमको बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
हारती मनुहार की सौगंध तुमको
भीगता आँगन निमंत्रण दे रहा है !

- सोम ठाकुर


 

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के तहत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय गोपालसिंह नेपाली जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,
सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चाँद जाँचा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो,
मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में
दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो.


 

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा : श्रीलाल शुक्ल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा
प्यासे नयन ज्यों नयन में समा जाएँ
सारे निराधार आधार पा जाएँ
जाओ तभी जब हृदय-कम्प खो जाएँ
मेरे अधर पर तुम्हारा खिले हाथ
मेरा उदय खींच के ज्योति घेरा
छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा

- श्रीलाल शुक्ल