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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

एक सपना

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  अरविंद भटनागर ' शेखर'  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 


सपने, तान्या
एक दम छोटे से बच्चे 
जैसे होते हैं/
अपने मे खोए से / 
जाने क्या सोचते रहते हैं/
फिर हौले से मुस्कुरा देते हैं/
फिर कुछ गुनगुनाने लगते हैं/
फिर गाने लगते हैं/
फिर नाचने लगते हैं/
फिर चकित हो जाते हैं/
फिर खामोश हो जाते हैं/
फिर उदास हो जाते हैं/
फिर सुबकने लगते हैं/
फिर दर्द की भाप मे बदल जाते हैं/
ओर दिल से उठ कर 
आँखों की कोरों पर आ के 
बैठ जाते हैं/
ओर खोई खोई आँखों से 
अपनी तान्या को खोजने लगते हैं/
फिर उन्ही गालों पर
बहने लगते हैं
जिन्हे तुमने  चूमा था/
भीगे भीगे इस मौसम मे/
ऐसा ही एक सपना 
मेरे दिल से उठ कर /
मेरी आँखों की कोरों पर 
आ बैठा है/
ओर  खोज रहा है  तुम्हे |

-अरविंद भटनागर ' शेखर'

बुधवार, 25 सितंबर 2013

है चाहता बस मन तुम्हें

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण शलभ जी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

शीतल पवन, गंधित भुवन
आनन्द का वातावरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

शतदल खिले भौंरे जगे
मकरन्द फूलों से भरे
हर फूल पर तितली झुकी
बौछार चुम्बन की करे
सब ओर मादक अस्फुरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

संझा हुई सपने जगे
बाती जगी दीपक जला
टूटे बदन घेरे मदन
है चक्र रतिरथ का चला
कितने गिनाऊँ उद्धरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

नीलाभ जल की झील में
राका नहाती निर्वसन
सब देख कर मदहोश हैं
उन्मत्त चाँदी का बदन
रसरंग का है निर्झरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें.
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कृष्ण शलभ बाल रचनाकार के अतिरिक्त गीत और गज़लों के क्षेत्र में एक जाना माना नाम हैं। वे भारत की सभी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।जन्म- १८ जुलाई १९४५ को सहारनपुर में।

प्रकाशित कृतियाँ-
चार बालगीत संग्रह- ओ मेरी मछली, टिली लिली झर्र, चीं चीं चिड़िया और सूरज की चिट्ठी। सहित एक वृहद संकलन ५५१ बाल कविताएँ जिसमें हिंदी बाल गीतों पर एक शोध भी प्रस्तुत किया गया है।

सम्मान पुरस्कार-
हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के पुरस्कार, भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर, नागरी साहित्य संस्थान बलिया, सृजन संस्थान रुड़की तथा अन्य अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत सम्मानित

शनिवार, 14 सितंबर 2013

मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  उदयभानु ‘हंस’ जी  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

तू चाहे चंचलता कह ले,
तू चाहे दुर्बलता कह ले,
दिल ने ज्यों ही मजबूर किया,

 मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा।

यह प्यार दिए का तेल नहीं,
दो चार घड़ी का खेल नहीं,
यह तो कृपाण की धारा है,
कोई गुड़ियों का खेल नहीं।
तू चाहे नादानी कह ले,
तू चाहे मनमानी कह ले,
मैंने जो भी रेखा खींची, 

तेरी तस्वीर बना बैठा।

मैं चातक हूँ तू बादल है,
मैं लोचन हूँ तू काजल है,
मैं आँसू हूँ तू आँचल है,
मैं प्यासा तू गंगाजल है।
तू चाहे दीवाना कह ले,
या अल्हड़ मस्ताना कह ले,
जिसने मेरा परिचय पूछा, 

मैं तेरा नाम बता बैठा।

सारा मदिरालय घूम गया,
प्याले प्याले को चूम गया,
पर जब तूने घूँघट खोला,
मैं बिना पिए ही झूम गया।
तू चाहे पागलपन कह ले,
तू चाहे तो पूजन कह ले,
मंदिर के जब भी द्वार खुले, 

मैं तेरी अलख जगा बैठा।

मैं प्यासा घट पनघट का हूँ,
जीवन भर दर दर भटका हूँ,
कुछ की बाहों में अटका हूँ,
कुछ की आँखों में खटका हूँ।
तू चाहे पछतावा कह ले,
या मन का बहलावा कह ले,
दुनिया ने जो भी दर्द दिया, 

मैं तेरा गीत बना बैठा।

मैं अब तक जान न पाया हूँ,
क्यों तुझसे मिलने आया हूँ,
तू मेरे दिल की धड़कन में,
मैं तेरे दर्पण की छाया हूँ।
तू चाहे तो सपना कह ले,
या अनहोनी घटना कह ले,
मैं जिस पथ पर भी चल निकला, 

तेरे ही दर पर जा बैठा।

मैं उर की पीड़ा सह न सकूँ,
कुछ कहना चाहूँ, कह न सकूँ,
ज्वाला बनकर भी रह न सकूँ,
आँसू बनकर भी बह न सकूँ।
तू चाहे तो रोगी कह ले,
या मतवाला जोगी कह ले,
मैं तुझे याद करते-करते,

 अपना भी होश भुला बैठा।

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उदयभानु ‘हंस’ 
जन्‍म: २ अगस्‍त १९२६ 

शिक्षा: प्रभाकर, शास्‍त्री एवं एम.ए. (हिन्‍दी)

कार्यक्षेत्र: अध्यापन एवं लेखन। सनातन धर्म संस्‍कृत कॉलेज, मुलतान (१९४५-४७), रामजस कॉलेज, दिल्‍ली (१९५२-५३), गवर्नमेंट कॉलेज, हिसार (१९५४) - प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्‍त (१९८८)। 

प्रकाशित कृतियाँ: 'उदयभानु हंस रचनावली' दो खंड (कविता) दो खंड (गद्य)।

सम्मान एवं पुरस्कार: अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से अलंकृत। देश विदेश में कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कवि, 'दूरदर्शन' के दिल्‍ली एवं जालन्‍धर केन्‍द्रों द्वारा तीस-तीस मिनट के दो 'वृत्‍तचित्रों' का निर्माण एवं प्रसारण, हिन्‍दी में 'रूबाई' के प्रवर्तक कवि १९४८ 'रूबाई सम्राट' नाम से लोकप्रिय।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

खिलता वसंत

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती फाल्गुनी की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

इन फूलों का नाम मैं नहीं जानती, 
जानती हूं उस वसंत को 
जो इन फूलों के साथ मेरे कमरे में आया है .... 

चाहती हूं 
तुमसे रूठ जाऊं 
कई दिनों तक नजर ना आऊं 

मगर कैसे 
वासंती मौसम के पीले फूल 
ठीक मेरे सामने हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 

सोचती हूं 
तुमसे मिले 
जब गुजर जमाना जाएगा
तब भी 
जीवन के हर एकांत में 
पीले फूलों का यह खिलता वसंत 
हर मौसम में मुझे 
मुझमें ही मिल जाएगा 
और तब तुम्हारा अनोखा प्यार 
मुझे बहुत याद आएगा।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

पर आँखें नहीं भरीं

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 

कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

सीमित उर में चिर-असीम 
सौंदर्य समा न सका 
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग 
मन रोके नहीं रुका 
यों तो कई बार पी-पीकर 
जी भर गया छका 
एक बूँद थी, किंतु, 
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं। 

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी 
कण-कण में बिखरी 
मिलन साँझ की लाज सुनहरी 
ऊषा बन निखरी, 
हाय, गूँथने के ही क्रम में 
कलिका खिली, झरी 
भर-भर हारी, किंतु रह गई 
रीती ही गगरी। 
कितनी बार तुम्हें देखा 
पर आँखें नहीं भरीं।


-शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

बुधवार, 11 सितंबर 2013

यूँ लगा मुझको

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर  आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती  अरविंद भटनागर ' शेखर'  की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... 


चाँद झाँका
बादलों की ओट से ,
चाँदनी चुपके से आ
खिड़की के रस्ते,
बिछ गई बिस्तर पे मेरे
और 
हवा  का एक झोंका,
सोंधी सी खुश्बू लिए
छू कर गया गालों को मेरे 
यूँ लगा मुझको कि
तुम सोई हो मेरे पास ,
मेरी बाहों के घेरे में 
लेकर होठों पर
एक इंद्रधनुषी मुस्कुराहट
तृप्त |

-  अरविंद भटनागर ' शेखर'

सोमवार, 4 मार्च 2013

लौट आओ...

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता सोम ठाकुर जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

लौट आओ,
माँग के सिंदूर की सौगंध
तुमको नयन का सावन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
आज पहिले प्यार की सौगन्ध
तुमको प्रीत का बचपन
निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
मानिनी, है मान की सौगन्ध
तुमको बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ,
हारती मनुहार की सौगंध तुमको
भीगता आँगन निमंत्रण दे रहा है !

- सोम ठाकुर


 

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

मैं तुझमें तू कहाँ खो गयी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता  जय कृष्ण राय 'तुषार' का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

यह भी क्षण
कितना सुन्दर है
मैं तुझमें तू कहीं खो गयी |
इन्द्रधनुष
की आभा से ही
प्यासी धरती हरी हो गयी |

जीवन बहती नदी
नाव तुम ,हम
लहरें बन टकराते हैं ,
कुछ की किस्मत
रेत भुरभुरी कुछ
मोती भी पा जाते हैं ,
मेरी किस्मत
बंजारन थी
जहाँ पेड़ था वहीँ सो गयी |

तेरी इन
अपलक आँखों में
आगत दिन के कुछ सपने हैं ,
पांवों के छाले
मुरझाये अब
फूलों के दिन अपने हैं ,
मेरा मन
कोरा कागज था
उन पर तुम कुछ गीत बो गयी |
 

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सखी तू मत हो उदास

 
हल्दू हल्दू बसंत का मौसम
शीतल हवा कभी गर्म है मौसम
रक्तिम रक्तिम फूले प्लास
सखी तू क्यों है उदास?

सज़ल नेत्र क्यों खड़ी हुई है ?
दुखियारी सी बनी हुई है
क्यों छोड़ रही गहरी श्वास
सखी तू क्यों भई उदास?

केश तुम्हारे खुले हुए हैं
बादल जैसे मचल रहे हैं
बसंत मे सावन कि आस
सखी तू क्यों है उदास?

वृक्ष पल्लवित हो रहे हैं
पीत पत्र संग छोड़ रहे हैं
नव जीवन सी सजी आस
सखी तू कैसे बनी उदास?

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
भंवरे उन पर मचल रहे हैं
तितली भी मकरंद कि आस
सखी तू किसलिए भई उदास?

कलियाँ खिलती,भंवरे गाते
पेड़ों पर पक्षी शोर मचाते
चहुँ और सजा है मधु मास
सखी तू कैसे भई उदास?

पिया मिलन जल्दी होगा
भँवरा फूल संग होगा
रखो जीवन मे विश्वास
सखी तू मत हो उदास|

डॉ अ कीर्तिवर्धन

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

काश तुम ......

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता राकेश श्रीवास्तव का एक प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
 
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते
काश तुम ......
जब से ये जाना मोहब्बत का नाम
मोहब्बत को दे दिया तेरा ही नाम
मोहब्बत का पैगाम , कब का पेश कर दिए होते
काश तुम ......
मेरे होठ सिले के सिले रह गए
इजहारे मोहब्बत , न हम कर सके
मोहब्बत है तुझसे , हम तुमको बता देते
काश तुम ......
तेरा नाम लेके मै जीती रही
तेरा नाम लेके मै मरती रही
तुम करते हो प्यार मुझसे
काश पहले ही बता देते
काश हमदोनो एक दुसरे को बता देते
काश हम अजनबी तेरे लिए होते
इजहारे मोहब्बत , सरेआम किये होते .
 
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भारतीय रेल में कार्यरत. फ़िलहाल कपूरथला में. अध्ययन-लेखन में अभिरूचि. अपने हिंदी ब्लॉग 'राकेश की रचनाएँ' के माध्यम से सक्रियता.

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

रंग बिरंगी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अवनीश कुमार की एक कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...
 
तुम-
 
गुलाबी हो
जैसे नवजात की नज़र

 
तुम-
 
हरी हो
जैसे नवेली वसंत की ऊष्मा

 
तुम-
 
नीली हो
जैसे बड़े परदे की बड़ी सी फिल्म
 
तुम-
 
उजली हो
जैसे हर रोज़ धुलती कमीज़
 
तुम-
 
नारंगी हो
जैसे छनती हुई रौशनी

 
तुम-
 
लाल हो
जैसे मध्य भारत की मिट्टी

 
तुम-
 
भूरी हो
जैसे शाम के वक़्त चौखट
 
रंग-बिरंगी हो
जैसे स्कूल से लौटी बच्ची
जैसे आंग्ल-भाषाई चपलता
जैसे हमारी बातचीत
 
-अवनीश
 
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अवनीश कुमार. लेखन-अध्ययन में रूचि . फ़िलहाल अपने ब्लॉग असहमति की कविता और सशब्द-विद्रोह के माध्यम से सक्रियता.

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

ना बदले कभी प्रेम के रंग

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक' का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...


प्रेमिका:
.
तुझसे लागी प्रीत साजना,
तुझसे लागे मेरे नैन.
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
मैन मन हारी,
मैन तन हारी,
तुझ पर ओ रे मेरे साजन,
मैने पुरी दुनिया वारी.
.
खोकर सुध-बुध,होकर बेसुध,
तुझको पूजू सुबह-शाम,
ओ साजन मै तेरी राधा,
तुम मेरे प्रियवर घनश्याम.
.
घात लगा क्यो हृदय मे बैठे,
ओ मतवारे क्यो छीने चैन,
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
.
प्रेमी:
.
चाह में जिसके डूबी दुनिया,
तुम उस यौवन कि हाला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
कोई गीत लिखू, कोई काव्य लिखू,
या सुन्दरता का हर भाव लिखू,
इस चन्द्रकिरण से चेरे पर,
हर एक हृदय कि आह लिखू|
.
नैनों में मदिरा है जिनकी,
और अधरों में प्याला हो,
कैसे रोके खुद को कोई,
जब हृदय इतना मतवाला हो|
.
कहाँ रंग हो, कहाँ छंद हो,
अब क्यों दीपों कि माला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
.
दोनों संयुक्त:
.
अब ना बीते रैन साँवरे,
जब हम तुम हो संग-संग,
ना गुजरे अब बरस प्रेम के,
ना बदले कभी प्रेम के रंग|

- प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक'

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के तहत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय गोपालसिंह नेपाली जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,
सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चाँद जाँचा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो,
मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में
दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो.


 

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा : श्रीलाल शुक्ल

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर 'धरोहर' के अंतर्गत आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा
प्यासे नयन ज्यों नयन में समा जाएँ
सारे निराधार आधार पा जाएँ
जाओ तभी जब हृदय-कम्प खो जाएँ
मेरे अधर पर तुम्हारा खिले हाथ
मेरा उदय खींच के ज्योति घेरा
छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा
आया नहीं है अभी तक सवेरा

- श्रीलाल शुक्ल


मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

प्रेम-गीत : तुम्हारे नहीं होने पर यहाँ कुछ भी नहीं होता

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता जय कृष्ण राय 'तुषार' का प्रेम-गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तुम्हारे
नहीं होने पर
यहाँ कुछ भी नहीं होता |
सुबह से
शाम मैं
खामोशियों में जागता -सोता |
तुम्हारे
साथ पतझर में
भी जंगल सब्ज लगता है ,
सुलगते
धुँए सा सिगरेट के,
अब चाँद दिखता है ,
भरे दरिया में
भी लगता है
जैसे जल नहीं होता |

नहीं हैं रंग
वो स्वप्निल
क्षितिज के इन्द्रधनुओं में ,
न ताजे
फूल में खुशबू
चमक गायब जुगुनुओं में ,
प्रपातों में
कोई खोया हुआ
बच्चा दिखा रोता |

मनाना
रूठना फिर
गुनगुनाना और बतियाना ,
किताबों में
मोहब्बत का
नहीं होता ये अफ़साना ,
हमारे सिर
का भारी बोझ
अब कोई नहीं ढोता |

किचन भी
हो गया सूना
नहीं अब बोलते बर्तन ,
महावर पर
कोई कविता नहीं
लिखता है अन्तर्मन |
टंगे हैं
खूंटियों पर अब
कोई कपड़े नहीं धोता |

खिड़कियों से
डूबता सूरज
नहीं हम देख पाते ,
अब परिन्दों
के सुगम -
संगीत मन को नहीं भाते ,
लौट आओ
झील में डूबें -
लगाएं साथ गोता |
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जन्म 01-01-1969 को ग्राम -पसिका पोस्ट -बरदह जनपद -आजमगढ़ में माँ चन्द्रावती राय और पिता स्व० त्रिवेणी राय के पुत्र के रूप में हुआ |मेरा दस्तावेजों में नाम जयकृष्ण नारायण शर्मा है |मेरी प्रारम्भिक शिक्षा आजमगढ़ में हुई |उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |सम्प्रति उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत |मेरी कविताएँ बी० बी०सी० हिंदी पत्रिका लन्दन ,नया ज्ञानोदय ,आजकल ,अहा!जिंदगी ,दैनिक भाष्कर ,जनसत्ता ,आधारशिला ,नये -पुराने हिन्दुस्तानी एकेडमी ,नव निकष , अक्षर पर्व ,अप्रतिम अपरिहार्य ,युगीन काव्या नवगीत के नए प्रतिमान आदि अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं |सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में कविताएँ प्रकाशित ,आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा प्राइवेट चैनलों से कविताओं का प्रसारण |प्रथम हरिवंश राय बच्चन पुरस्कार 2006 से सम्मानित |इंटरनेट पर छान्दसिक अनुगायन और सुनहरी कलम से साहित्यिक ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय |सम्पर्क जयकृष्ण राय तुषार 63जी/7बेलीकालोनी ,स्टैनली रोड ,इलाहाबाद[ यू० पी० ]पिन -211002 Mob.no.09005912929