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गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

ना बदले कभी प्रेम के रंग

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक' का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...


प्रेमिका:
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तुझसे लागी प्रीत साजना,
तुझसे लागे मेरे नैन.
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
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मैन मन हारी,
मैन तन हारी,
तुझ पर ओ रे मेरे साजन,
मैने पुरी दुनिया वारी.
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खोकर सुध-बुध,होकर बेसुध,
तुझको पूजू सुबह-शाम,
ओ साजन मै तेरी राधा,
तुम मेरे प्रियवर घनश्याम.
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घात लगा क्यो हृदय मे बैठे,
ओ मतवारे क्यो छीने चैन,
बैर हो गयी दुनिया सारी,
बैर हो गये ये दिन-रैन.
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प्रेमी:
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चाह में जिसके डूबी दुनिया,
तुम उस यौवन कि हाला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
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कोई गीत लिखू, कोई काव्य लिखू,
या सुन्दरता का हर भाव लिखू,
इस चन्द्रकिरण से चेरे पर,
हर एक हृदय कि आह लिखू|
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नैनों में मदिरा है जिनकी,
और अधरों में प्याला हो,
कैसे रोके खुद को कोई,
जब हृदय इतना मतवाला हो|
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कहाँ रंग हो, कहाँ छंद हो,
अब क्यों दीपों कि माला हो,
सागर हो तुम मधुरस का,
तुम प्रेम भरी मधुशाला हो|
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दोनों संयुक्त:
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अब ना बीते रैन साँवरे,
जब हम तुम हो संग-संग,
ना गुजरे अब बरस प्रेम के,
ना बदले कभी प्रेम के रंग|

- प्रदीप सिंह चम्याल 'चातक'
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