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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

तुम और चाँद : कृष्ण कुमार यादव

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती कृष्ण कुमार यादव जी की एक कविता 'तुम और चाँद'.आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

रात का पहर
जब मैं झील किनारे
बैठा होता हूँ
चाँद झील में उतरकर
नहा रहा होता है
कुछ देर बाद
चाँद के साथ
एक और चेहरा
मिल जाता है
वह शायद तुम्हारा है
पता नहीं क्यों
बार-बार होता है ऐसा
मैं नहीं समझ पाता
सामने तुम नहा रही हो
या चाँद
आखिरकार, झील में
एक कंकड़ फेंककर
खामोशी से मैं
वहाँ से चला आता हूँ।
**************************************************************************
कृष्ण कुमार यादव :
10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.) के एक प्रतिष्ठित परिवार में श्री राम शिव मूर्ति यादव एवं श्रीमती बिमला यादव के प्रथम सुपुत्र-रूप में जन्म। आरंभिक शिक्षा बाल विद्या मंदिर, तहबरपुर (आजमगढ़), जवाहर नवोदय विद्यालय-जीयनपुर आजमगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद वि.वि. से 1999 में राजनीति शास्त्र में एम.ए. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ और कानपुर में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक पद पर आसीन। 28 नवम्बर, 2004 को आकांक्षा यादव से विवाह। दो पुत्रियाँ: अक्षिता (जन्म- 25 मार्च, 2007) और तान्या (जन्म-27 अक्तूबर 2010)।

प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम। अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित-'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005)'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years'(2006) एवं 'श्क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा' (2007)। देश-विदेश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, वर्तमान साहित्य, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारतीय, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, हिमप्रस्थ, गिरिराज, पंजाब सौरभ, अकार, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, हिन्दी चेतना (कनाडा), युग तेवर, शेष, अक्सर, अलाव, इरावती, उन्नयन, भारत-एशियाई साहित्य, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, लोकायत, शुक्रवार, इण्डिया न्यूज, द सण्डे इण्डियन, छपते-छपते, प्रगतिशील आकल्प, युगीन काव्या, आधारशिला, वीणा, दलित साहित्य वार्षिकी, बाल वाटिका, गोलकोेण्डा दर्पण, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, दक्षिण भारत, केरल ज्योति, द्वीप लहरी, इत्यादि में रचनाएँ प्रकाशित।

इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में काव्य-रचनाएँ संकलित। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, ब्लॉग- अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, लेखनी, कृत्या, उदंती.काम, काव्यांजलि, रचनाकार, विश्वगाथा, परिकल्पना ब्लॉगोत्सव, हिन्दी हाइकु, हिन्दी नेस्ट, हिंदी मीडिया, हिंदी साहित्य मंच, हमारी वाणी, स्वतंत्र आवाज डाॅट काम, स्वर्गविभा, कलायन, सार्थक सृजन, आखर कलश, शब्दकार, अपनी माटी, वांग्मय पत्रिका, ई-हिन्दी साहित्य, सुनहरी कलम से, नारायण कुञ्ज, कवि मंच, इत्यादि पर रचनाएँ प्रकाशित। व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर डाकिया डाक लाया और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ , ‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉग के माध्यम से सक्रियता।

आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार का प्रसारण। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ संकलित। ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन। सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’ (सितम्बर 2007) एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ‘गुफ्तगू‘ (मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित। व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित। भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘ व ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”काव्य शिरोमणि” एवं ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त।

संपर्क: कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
ई-मेलः kkyadav.y@rediffmail.com


गुरुवार, 28 जुलाई 2011

प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटते मुक्तक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटते नीलम पुरी जी के कुछ मुक्तक. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

१)आँखों के अश्क बह नहीं पाए,
खामोश रहे किसी से कुछ कह नहीं पाए,
किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,
जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.
***********************
२).जब भी रातों मे तेरी याद आती है ,
वीरान रातों में चाँदनी उतर आती है,
सोचती हूँ तुम मिलोगे खवाबों मे,
मगर ना तुम आते हो ना नींद आती है.
***********************
३)मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,
हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,
ये खनक है शायद उनके आने की,
जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है.
*************************
४)खामोशियो मे भी गुनगुनाने को जी चाहता है,
तन्हायियो में भी महफिलें सजाने को जी चाहता है,
जाने क्या सर कर गया उसका पल दो पल का साथ,
बेगानों को भी अपना बनाने को जी चाहता है.
******************************
५)पल पल पलकों पर सजाये मैंने,
पल पल अश्क आँखों में छुपाये मैंने,
पल पल इंतज़ार किया और,
पल पल ज़िन्दगी के यूँही बिताये मैंने.
************************
६)अपने अश्कों को छलकाना चाहती हूँ,
तुझे अपने सीने से लगाना चाहती हूँ,
जहाँ मिलती है ज़मी आसमा से ,
वहां अपना आशियाना बनाना चाहती हूँ.
***********************
७) खामोशिओं के दरमियान सरगोशिया मत रखना,
मेरे तकिये तले कोई स्वप्न मत रखना ,
हर रात आधी अधूरी जीती हूँ मैं,
नीलम की दहलीज़ पर उम्मीद के दिए मत रखना.
**************************
८)सूरज की बाहों मे चाँद तड़प गया,
तारों की छाँव मे ,मैं कल रात भटक गया,
पोंछता रहा रात भर नाम पलकों से उसे,
और वो मेरी आँखों मे टूटे ख्वाब सा चटख गया.
************************
९)रात ढलती गयी ,
दिन भी गुज़रता गया,
उस से मिलने की उम्मीद का,
ये पल भी फिसलता गया.
************************
१०) दिल की गहराईओं मैं बस जाते हैं वो,
धड़कन की तरह जिस्म मे समाते हैं वो,
जब जब दिल धडकता है तो अहसास होता है,
आज भी मेरे लिए मुस्कुराते तो हैं वो.

 *********************************************************************************** नाम : नीलम पुरी / व्यवसाय: गृहिणी / शिक्षा-स्नातक/मैं "नीलम पुरी" बहुत ही साधारण से परिवार से जुडी अति-साधारण सी महिला हूँ. अपने पति और दो बच्चों की दुनिया में बेहद खुश हूँ. घर सँभालने के साथ अपने उद्वेगों को शांत करने के लिए कागज पर कलम घसीटती रहती हूँ और कभी सोचा न था कि मेरा लिखा कभी प्रकाशित भी होगा. खैर, कुछ दोस्तों की हौसलाअफजाई के चलते आज यहाँ हूँ. अंतर्जाल पर Ahsaas के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 18 जुलाई 2011

तुम्हारे अंक में


अंशल
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!
अनुराग के साथ
हमने थामा था
एक-दूजे का हाथ
अग्नि के संग-संग
फेरों में
वचनों ने हमें बांधा था
वह बंधन
सदा सुदृढ़ रहा
सरिता
सुजल प्रेम का
हर पल बहा
प्रिय!
सौखिक रहा
तेरा सहारा,
अंशल
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!
कभी ऊंच-नीच
कभी मनमुटाव
कभी वाक-युद्ध
कभी शांत भाव
कभी रूठना
कभी गुनगुनाना
कभी सोचना
कभी खिलखिलाना
हम-हम रहे
हम युग्म हुये
चलते रहे हैं साथ-साथ
प्रशस्त हुआ
मार्ग सारा,
अंशल,
तुम्हारे अंक में
अक्षुण्ण रहा
जीवन हमारा!

-राजेश कुमार
शिव निवास, पोस्टल पार्क चौराहा से पूरब, चिरैयाटांड,पटना-800001

सोमवार, 4 जुलाई 2011

कल जीवन से फिर मिला : आशीष

कल वो सामने बैठी थी
कुछ संकोच ओढे हुए
सजीव प्रतिमा, झुकी आंखे
पलकें अंजन रेखा से मिलती थी

मेरे मन के निस्सीम गगन में
निर्जनता घर कर आयी थी
आकुल मन अब विचलित है
मुरली बजने लगी जैसे निर्जन में

खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
सद्य स्नाता चंचला जैसे
निकल आयी हो चन्द्र किरण से

उसने जो दृष्टी उठाई तनिक सी
मिले नयन उर्ध्वाधर से
अधखुले अधरों में स्पंदन
छिड़ती मधुप तान खनक सी

ना जाने ले क्या अभिलाष
मेरे जीवन की नवल डाल
बौराए नव तरुण रसाल
नव जीवन की फिर दिखी आस

सुखद भविष्य के सपनो में
निशा की घन पलकों में झांक रहा
बिभावरी बीती, छलक रही उषा
जगी लालसा ह्रदय के हर कोने में !!
******************************************************************************

आशीष राय/ अभियांत्रिकी का स्नातक, भरण के लिए सम्प्रति कानपुर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चाकरी, साहित्य पढने की रूचि है तो कभी-कभी भावनाये उबाल मारती हैं तो साहित्य सृजन भी हो जाता है /अंतर्जाल पर युग दृष्टि के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 20 जून 2011

प्रेम गीत : रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ‘इंदू‘

जब से मैंने पढ़े प्यार के,
तेरे ढाई आखर।
तब से बसा नयन में मेरे,
चेहरा तेरा सुधाकर।

वह मुस्कान मधुर सी चितवन,
मीठे बोल धरे हैं अधरन।
बनी कमान भौंह कजरारी,
लिये लालिमा कंज कपोलन।।

जब से मिला हृदय को मेरे,
कमल खिला इक सागर।

नीर भरन जब जाए सजनिया,
लचके कमर बजै पैंजनिया।
भीगी लट रिमझिम बरसाती,
डोलत हिय ललचाय नथुनिया।

जब से मिली प्रणय को मेरे
नेह नीर की गागर।

चले मद भरी छैल छबीली,
धानी चूनर नीली-पीली।
सोंधी-सोंधी गंध समेटे,
चोली बांधे गाँठ गसीली।।

जब से हुआ बदन को मेरे,
मोहन मदन उजागर।

एक बूँद अमृत पाने को,
मैं तो कब से था विष पीता।
मन में मिलने की अभिलाषा,
‘इंदु‘ पोष कर पागल जीता।।

जब से लिखा अधर पर मेरे,
तेरा नाम पता घर।।


रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ‘इंदू‘
बड़ागाँव, झांसी (उ0प्र0)-284121

सोमवार, 13 जून 2011

प्यार का आलम : मानव मेहता

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती मानव मेहता की एक ग़ज़ल. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

चाँद के चेहरे से बदली जो हट गयी,

रात सारी फिर आँखों में कट गयी..


छूना चाहा जब तेरी उड़ती हुई खुशबू को,

सांसें मेरी तेरी साँसों से लिपट गयी..


तुमने छुआ तो रक्स कर उठा बदन मेरा,

मायूसी सारी उम्र की इक पल में छट गयी..


बंद होते खुलते हुए तेरे पलकों के दरम्यान,

ए जाने वफ़ा, मेरी कायनात सिमट गयी...

**********************************************************************************
मानव मेहता /स्थान -टोहाना/ शिक्षा -स्नातक (कला) स्नातकोतर (अंग्रेजी) बी.एड./ व्यवसाय -शिक्षक/अंतर्जाल पर सारांश -एक अंत.. के माध्यम से सक्रिय।





सोमवार, 6 जून 2011

मेरी कौन हो तुम : सुमन 'मीत'

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सुमन 'मीत' की एक कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !

मैं पथिक तुम राह
मैं तरु तुम छाँव
मैं रेत तुम किनारा
मैं बाती तुम उजियारा

पूछती हो मुझसे मेरी....!

मैं गीत तुम सरगम
मैं प्रीत तुम हमदम
मैं पंछी तुम गगन
मैं सुमन तुम चमन

पूछती हो मुझसे मेरी....!

मैं बादल तुम बारिश
मैं वक्त तुम तारिख
मैं साहिल तुम मौज
मैं यात्रा तुम खोज

पूछती हो मुझसे मेरी....!

मैं मन तुम विचार
मैं शब्द तुम आकार
मैं कृत्य तुम मान
मैं शरीर तुम प्राण

पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !!
***********************************************************************************

सुमन 'मीत'/मण्डी, हिमाचल प्रदेश/ मेरे बारे में-पूछी है मुझसे मेरी पहचान; भावों से घिरी हूँ इक इंसान; चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ; वादा है मेरा न छोडूगी हाथ; जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत; इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी “मीत”! अंतर्जाल पर बावरा मन के माध्यम से सक्रियता.






सोमवार, 30 मई 2011

प्रेम-गीत : अनामिका घटक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक का एक प्रेम-गीत . आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

कतरा-कतरा ज़िंदगी का
पी लेने दो
बूँद बूँद प्यार में
जी लेने दो

हल्का-हल्का नशा है
डूब जाने दो
रफ्ता-रफ्ता “मैं” में
रम जाने दो

जलती हुई आग को
बुझ जाने दो
आंसुओं के सैलाब को
बह जाने दो

टूटे हुए सपने को
सिल लेने दो
रंज-ओ-गम के इस जहां में
बस लेने दो

मकाँ बन न पाया फकीरी
कर लेने दो
इस जहां को ही अपना
कह लेने दो

तजुर्बा-इ-इश्क है खराब
समझ लेने दो
अपनी तो ज़िंदगी बस यूं ही
जी लेने दो

**********************************************************************************
नाम:अनामिका घटक
जन्मतिथि : २७-१२-१९७०
जन्मस्थान :वाराणसी
कर्मस्थान: नॉएडा
व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत
शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.

सोमवार, 23 मई 2011

आपके दामन से : यशोधरा यादव ‘यशो‘

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता यशोधरा यादव ‘यशो‘ का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

आपके दामन से मेरा, जन्म का नाता रहा है ,
प्यार की गहराइयों का, राज बतलाता रहा है।

मौन मत बैठो कहो कुछ, आज मौसम है सुहाना,
कलखी धुन ने बजाया, प्यार का मीठा तराना।
एक सम्मोहन धरा की, मूक भाषा बोलती है,
और नभ दे दुंदुभी, नवरागिनी गाता रहा है।
आपके दामन......................।

प्यार का मकरन्द भरकर, बादलों का टोल आया,
आम की अमराइयों में, हरित ने आँचल बिछाया।
सूर्य का लुक-छुप निकलना, मुस्कराना देखकर,
मन मयूरी नृत्य कर, कर मान इतराता रहा है।
आपके दमन......................।

भाव का कोई शब्द ही तो, मेरे उर को भेदता है,
गीत की हर पंक्ति बनकर, नव सुगंध बिखेरता है।
बंसुरी की धुन बजाता है, कहीं कान्हा सुरीली,
और चितवन राधिका का, पाँव थिरकाता रहा है।
आपके दामन......................।

दीप तेरा प्यार बनकर, झिलमिलाते द्वार मेरे,
आज कोयल गीत प्रियवर, गा रही उपवन सवेरे।
मन समुंदर की हिलोरे, चूमती बेताब तट की,
रूख हवाओं का विहंस कर, गुनगुनाता जा रहा है।
आपके दामन......................।
*********************************************************************************

यशोधरा यादव ‘यशो‘,
ग्राम-जामपुर पो0- चमरौला, एत्मादपुर (आगरा)-283201

अंतर्जाल पर 'यशोधरा के गीत' के माध्यम से सक्रियता !!

सोमवार, 16 मई 2011

प्राण मेरे तुम न आये : बच्चन लाल बच्चन


मैं बुलाती रह गई, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नयन-काजल धुल गए हैं
अश्रु की बरसात से
नींद आती है नहीं-
मुझको कई एक रात से

तिलमिला उर रह गया, पर प्राण मेरे तुम न आये।
तोड़ कर यूँ प्रीत-बंधन
चल पड़े क्यों दूर मुझसे
तुम कदाचित हो उठे थे-
पूर्णतः मजबूर मुझसे

मैं ठगी सी रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नेत्र पट पर छवि तुम्हारी
नाचती आठों पहर है
याद तेरी पीर बनकर
ढ़ाहती दिल पर कहर है

मैं बिलखती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
मैं बुलाती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।

बच्चन लाल बच्चन,
12/1, मयूरगंज रोड, कोलकाता-700023


रेखांकन : किशोर श्रीवास्तव

सोमवार, 9 मई 2011

एक प्रेमलता कुम्भलाई सी : प्रकाश यादव "निर्भीक"

हर शाम का वह पहर
जब हर किसी में होड होती है
जल्दी जाने को अपना घर
शहर की तेज रफ़्तार जिन्दगी में
होती नहीं किसी को तनिक फ़िकर
एक प्रेमलता के दर्द की
जिसका पत्थर ही बना हमसफ़र
खडी है सहारे जिसके आजतक
निहारती रही अपलक उसकी डगर
जो किया था प्रेमालाप कभी
इसी जगह इसी मोड पर
प्रेमलता कुम्भला सी गई अब
प्रियतम के दीदार को एक नजर
मिली न छाया स्नेह का उसे
झुलसती प्रतीक्षा में दिनभर
रजनी आई पास जब
साथ लेकर जख्में जिगर
विह्वल हो गई वह अचानक
थरथरा उठे व्याकुल अधर
पर कह न सकी दर्द दिल का
रोती रही दोनों रातभर
सुबह होते ही ये अश्रुकण
शबनम बन गये बिखर
रात साथ छोड चली गई
संग रह गया फिर वही पत्थर
***********************************************************************************

प्रकाश यादव "निर्भीक"
अधिकारी, बैंक ऑफ बड़ौदा, तिलहर शाखा,
जिला शाहजहाँपुर, उ0प्र0 मो. 09935734733
E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in

मंगलवार, 3 मई 2011

क्यूं छुपाऊं तुमसे - सूरज पी. सिंह

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सूरज पी. सिंह की कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तुम्हीं उतरते हो
घास की पत्तियों में बनकर मिठास
जल की शीतलता तुमसे ही है
नदियों की गति तुम ही तो हो
तुम्हीं, तपन बनकर
सूरज में रहते हो
और तुम्हीं
चांदनी की रेशम भी बुनते हो.

माटी में कोई बीज रखूं, तो
अंकुर बन कौन फूटता है?
पेड़ों से गुज़रती हवाओं की सरसराहट
एक रहस्य है
खोलने बैठूं, तो
तुम्हारी ही आहट सुन जाता हूं.

एक गिलहरी
मेरी ओर प्यार से देखती है
एक गोरैया
फुदककर मेरे बाज़ू बैठती है
एक कली
खिलकर, मेरी ओर
थोड़ा रंग, थोड़ी ख़ुशबू उछालती है.
भला क्या करूं मैं, कि इन सबमें
मुझे तेरी शरारत झांकती-सी लगती है?

हर तरफ़, जो तुम ही तुम हो
कहां रखूं
मैं अपना प्यार तुमसे छुपाकर ?

सूरज पी. सिंह
A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मैं तुम्हारी संगिनी हूँ : अनामिका घटक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

मुझे उस पर नहीं जाना
क्योंकि इस पार
मैं तुम्हारी संगिनी हूँ
उस पार निस्संग जीवन है.

स्वागत के लिए
इस पार मैं सहधर्मिणी
कहलाती हूँ
मातृत्व सुख से परिपूर्ण हूँ
मातापिता हैं देवता स्वरुप पूजने के लिए.

उस पार मै स्वाधीन हूँ
पर स्वाधीनता का
रसास्वादन एकाकी है
गरल सामान.

इस पार रिश्तों की पराधीनता मुझे
सहर्ष स्वीकार है
इस पार प्रिये तुम हो
मैं तुम्हारी संगिनी हूँ !!
************************************************************************************
नाम:अनामिका घटक

जन्मतिथि : २७-१२-१९७०

जन्मस्थान :वाराणसी

कर्मस्थान: नॉएडा

व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत.

शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.

ई-मेल : ghatak.27@gmail.com

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

छुअन : संगीता स्वरुप

स्मृति की मञ्जूषा से
एक और पन्ना
निकल आया है .
लिए हाथ में
पढ़ गयी हूँ विस्मृत
सी हुई मैं .

आँखों की लुनाई
छिपी नहीं थी
तुम्हारा वो एकटक देखना
सिहरा सा देता था मुझे
और मैं अक्सर
नज़रें चुरा लेती थी .

प्रातः बेला में
बगीचे में घूमते हुए
तोड़ ही तो लिया था
एक पीला गुलाब मैंने .
और ज्यों ही
केशों में टांकने के लिए
हाथ पीछे किया
कि थाम लिया था
गुलाब तुमने
और कहा कि
फूल क्या खुद
लगाये जाते हैं वेणी में ?
लाओ मैं लगा दूँ
मेरा हाथ
लरज कर रह गया था.
और तुमने
फूल लगाते लगाते ही
जड़ दिया था
एक चुम्बन
मेरी ग्रीवा पर .
आज भी गर्दन पर
तुम्हारे लबों की
छुअन का एहसास है .
******************************************
नाम- संगीता स्वरुप
जन्म- ७ मई १९५३
जन्म स्थान- रुड़की (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र)
व्यवसाय- गृहणी (पूर्व में केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका रह चुकी हूँ)
शौक- हिंदी साहित्य पढ़ने का, कुछ टूटा फूटा अभिव्यक्त भी कर लेती हूँ । कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ... मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं.
निवास स्थान- दिल्ली
ब्लॉग - गीत

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

वफ़ा के गीत : यशवंत माथुर

तेरी आँखों के ये आँसूं,मेरे दिल को भिगोते हैं,

तुझे याद कर-कर हम भी,रात-रात भर रोते हैं,

बिन तेरे चैन कहाँ,बिन तेरे रैन कहाँ,

जाएँ तो जाएँ कहाँ,हर जगह तेरा निशाँ,

तेरे लब जब थिरकते हैं,बहुत हम भी मचलते हैं,

चाहते हैं कुछ कहना,मगर कहने से डरते हैं॥


कितने हैं शायर यहाँ,कितने हैं गायक यहाँ,

मेरा है वजूद वहां,जाए तू जाए जहाँ,

कैसी ये प्रीत मेरी,कैसी ये रीत तेरी,

अर्ज़ है क़ुबूल कर ले,आज मोहब्बत मेरी,

तेरे अनमोल ये मोती,जाने क्यों क्यूँ यूँ बिखरते हैं,

अधरों से पीले इनको, वफ़ा के गीत कहते हैं॥
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यशवंत माथुर, लखनऊ से. जीवन के 28 वें वर्ष में एक संघर्षरत युवक. व्यवहार से एक भावुक और सादगी पसंद इंसान.लिखना-पढना,संगीत सुनना,फोटोग्राफी,और घूमना-फिरना शौक हैं. पिताजी श्री विजय माथुर लेखन के क्षेत्र में प्रेरक एवं मार्गदर्शक हैं.अंतर्जाल पर जो मेरा मन कहे के माध्यम से सक्रियता.