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सोमवार, 22 नवंबर 2010

सिकता के कणों पर

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

सिकता के कणों पर खींचती हूं चित्र मैं
स्वयं ही, फिर स्वयं ही उन्हें मिटाती हूं;
रात्रि भर जागकर देखती हूं दिवास्वप्न,
उजास में स्वयं सयत्न सब भूल जाती हूं.

दस कदम चलती हूं उनके साथ साथ,
फिर अजनबी बनकर आगे बढ़ जाती हूं;
अनजाने आकाश में स्वयं बढ़ाती पेंग,
ऊंचाई पर पहुंचकर भयभीत हो जाती हूं.

परागरस से भरी हुई हूं अन्तस्तल तक,
भ्रमर की मांग को फिर भी ठुकराती हूं;
कुमुदिनी सी मूंदना चाहती हूं स्वयं में
उसे, भौंरे के निकट आने पर घबराती हूं.

अनवरत द्वन्द्व ही है इस जीवन का सच,
पर स्वयं को निर्द्वन्द्वता का पाठ पढ़ाती हूं,
ह्रदय जब भर रहा होता है लम्बी कुलांचें,
मैं सौम्यता की जीवन्त मूर्ति बन जाती हूं.


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नाम: महेश चंद्र द्विवेदी/जन्म-स्थान एवं जन्मतिथिः मानीकोठी, इटावा / 7 जुलाई, 1941/ शिक्षाः एम. एस. सी./भैतिकी/-लखनऊ विश्वविद्यालय /गोल्ड मेडलिस्ट/-एम. एस. सी./सोशल प्लानिंग/-लंदन स्कूल आफ़ इकोनोमिक्स- डिप्लोमा इन पब्लिक एडमिनिसट्रेशन- विशारद/. देश-विदेश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी और अंग्रेजी में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन और आकाशवाणी-दूरदर्शन इत्यादि पर प्रसारण. भारत सहित विदेशों में भी मंचों पर पाठ. रामायण ज्ञान केन्द्र, यू. के. /बर्मिंघम-2007 और विश्व हिंदी सम्मेलन, /न्यूयार्क-२००७ में भागीदारी. विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित- अलंकृत.कुल 7 पुस्तकें प्रकाशित और तीन प्रकाशनाधीन . प्रकाशित पुस्तकें- 1.उर्मि- उपन्यास 2.सर्जना के स्वर- कविता संग्रह 3.एक बौना मानव- कहानी संग्रह 4. सत्यबोध- कहानी संग्रह 5.क्लियर फ़ंडा- व्यंग्य संग्रह 6.भज्जी का जूता- व्यंग्य संग्रह 7. प्रिय अप्रिय प्रशासकीय प्रसंग- संस्मरण 8. अनजाने आकाश में- कविता संग्रह . प्रकाशनाधीन- 1.भीगे पंख- उपन्यास २. मानिला की योगिनी- उपन्यास 3.कहानी संग्रह. आई. पी. एस.- पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत. सम्प्रति साहित्य और समाज सेवा में रत. डा. जितेंन्द्र कुमार सिंह ‘संजय’ द्वारा श्री महेश चंद्र द्विवेदी एवं उनकी पत्नी के साहित्य पर ‘साहित्यकार द्विवेदी दम्पति’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित, एम. फ़िल, लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा कु.श्रुति शुक्ल द्वारा श्री महेश चंद्र द्विवेदी के साहित्य पर शोध. संपर्क :‘ज्ञान प्रसार संस्थान’, 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनऊ -226010 / फोनः 2304276 / 9415063030ई मेलः maheshdewedy@yahoo.com

8 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

अनवरत द्वन्द्व ही है इस जीवन का सच,
पर स्वयं को निर्द्वन्द्वता का पाठ पढ़ाती हूं,
ह्रदय जब भर रहा होता है लम्बी कुलांचें,
मैं सौम्यता की जीवन्त मूर्ति बन जाती हूं.
वाह! मनोभावों का बेहतरीन चित्रण्।

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

सिकता के कणों पर खींचती हूं चित्र मैं
स्वयं ही, फिर स्वयं ही उन्हें मिटाती हूं;
रात्रि भर जागकर देखती हूं दिवास्वप्न,
उजास में स्वयं सयत्न सब भूल जाती हूं.
khoobsurat shabdon , sunder andaaz,
uprokt rachna hetu महेश चंद्र द्विवेदी जी ko hardik badhai or ek sarthak pryash hetu aapka abhaar....

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

भावपूर्ण अभिव्यक्ति.............

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

भावपूर्ण अभिव्यक्ति.............

Manav Mehta 'मन' ने कहा…

बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति.........

http://saaransh-ek-ant.blogspot.com

Unknown ने कहा…

....बेहद खूबसूरत प्रस्तुति...बधाइयाँ.

raghav ने कहा…

रात्रि भर जागकर देखती हूं दिवास्वप्न,
उजास में स्वयं सयत्न सब भूल जाती हूं.

....Bahut khub.

उमेश महादोषी ने कहा…

achchhe bhaw hain.......