फ़ॉलोअर

सोमवार, 30 मई 2011

प्रेम-गीत : अनामिका घटक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक का एक प्रेम-गीत . आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

कतरा-कतरा ज़िंदगी का
पी लेने दो
बूँद बूँद प्यार में
जी लेने दो

हल्का-हल्का नशा है
डूब जाने दो
रफ्ता-रफ्ता “मैं” में
रम जाने दो

जलती हुई आग को
बुझ जाने दो
आंसुओं के सैलाब को
बह जाने दो

टूटे हुए सपने को
सिल लेने दो
रंज-ओ-गम के इस जहां में
बस लेने दो

मकाँ बन न पाया फकीरी
कर लेने दो
इस जहां को ही अपना
कह लेने दो

तजुर्बा-इ-इश्क है खराब
समझ लेने दो
अपनी तो ज़िंदगी बस यूं ही
जी लेने दो

**********************************************************************************
नाम:अनामिका घटक
जन्मतिथि : २७-१२-१९७०
जन्मस्थान :वाराणसी
कर्मस्थान: नॉएडा
व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत
शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.

सोमवार, 23 मई 2011

आपके दामन से : यशोधरा यादव ‘यशो‘

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता यशोधरा यादव ‘यशो‘ का एक गीत. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

आपके दामन से मेरा, जन्म का नाता रहा है ,
प्यार की गहराइयों का, राज बतलाता रहा है।

मौन मत बैठो कहो कुछ, आज मौसम है सुहाना,
कलखी धुन ने बजाया, प्यार का मीठा तराना।
एक सम्मोहन धरा की, मूक भाषा बोलती है,
और नभ दे दुंदुभी, नवरागिनी गाता रहा है।
आपके दामन......................।

प्यार का मकरन्द भरकर, बादलों का टोल आया,
आम की अमराइयों में, हरित ने आँचल बिछाया।
सूर्य का लुक-छुप निकलना, मुस्कराना देखकर,
मन मयूरी नृत्य कर, कर मान इतराता रहा है।
आपके दमन......................।

भाव का कोई शब्द ही तो, मेरे उर को भेदता है,
गीत की हर पंक्ति बनकर, नव सुगंध बिखेरता है।
बंसुरी की धुन बजाता है, कहीं कान्हा सुरीली,
और चितवन राधिका का, पाँव थिरकाता रहा है।
आपके दामन......................।

दीप तेरा प्यार बनकर, झिलमिलाते द्वार मेरे,
आज कोयल गीत प्रियवर, गा रही उपवन सवेरे।
मन समुंदर की हिलोरे, चूमती बेताब तट की,
रूख हवाओं का विहंस कर, गुनगुनाता जा रहा है।
आपके दामन......................।
*********************************************************************************

यशोधरा यादव ‘यशो‘,
ग्राम-जामपुर पो0- चमरौला, एत्मादपुर (आगरा)-283201

अंतर्जाल पर 'यशोधरा के गीत' के माध्यम से सक्रियता !!

सोमवार, 16 मई 2011

प्राण मेरे तुम न आये : बच्चन लाल बच्चन


मैं बुलाती रह गई, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नयन-काजल धुल गए हैं
अश्रु की बरसात से
नींद आती है नहीं-
मुझको कई एक रात से

तिलमिला उर रह गया, पर प्राण मेरे तुम न आये।
तोड़ कर यूँ प्रीत-बंधन
चल पड़े क्यों दूर मुझसे
तुम कदाचित हो उठे थे-
पूर्णतः मजबूर मुझसे

मैं ठगी सी रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नेत्र पट पर छवि तुम्हारी
नाचती आठों पहर है
याद तेरी पीर बनकर
ढ़ाहती दिल पर कहर है

मैं बिलखती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
मैं बुलाती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।

बच्चन लाल बच्चन,
12/1, मयूरगंज रोड, कोलकाता-700023


रेखांकन : किशोर श्रीवास्तव

सोमवार, 9 मई 2011

एक प्रेमलता कुम्भलाई सी : प्रकाश यादव "निर्भीक"

हर शाम का वह पहर
जब हर किसी में होड होती है
जल्दी जाने को अपना घर
शहर की तेज रफ़्तार जिन्दगी में
होती नहीं किसी को तनिक फ़िकर
एक प्रेमलता के दर्द की
जिसका पत्थर ही बना हमसफ़र
खडी है सहारे जिसके आजतक
निहारती रही अपलक उसकी डगर
जो किया था प्रेमालाप कभी
इसी जगह इसी मोड पर
प्रेमलता कुम्भला सी गई अब
प्रियतम के दीदार को एक नजर
मिली न छाया स्नेह का उसे
झुलसती प्रतीक्षा में दिनभर
रजनी आई पास जब
साथ लेकर जख्में जिगर
विह्वल हो गई वह अचानक
थरथरा उठे व्याकुल अधर
पर कह न सकी दर्द दिल का
रोती रही दोनों रातभर
सुबह होते ही ये अश्रुकण
शबनम बन गये बिखर
रात साथ छोड चली गई
संग रह गया फिर वही पत्थर
***********************************************************************************

प्रकाश यादव "निर्भीक"
अधिकारी, बैंक ऑफ बड़ौदा, तिलहर शाखा,
जिला शाहजहाँपुर, उ0प्र0 मो. 09935734733
E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in

मंगलवार, 3 मई 2011

क्यूं छुपाऊं तुमसे - सूरज पी. सिंह

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती सूरज पी. सिंह की कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

तुम्हीं उतरते हो
घास की पत्तियों में बनकर मिठास
जल की शीतलता तुमसे ही है
नदियों की गति तुम ही तो हो
तुम्हीं, तपन बनकर
सूरज में रहते हो
और तुम्हीं
चांदनी की रेशम भी बुनते हो.

माटी में कोई बीज रखूं, तो
अंकुर बन कौन फूटता है?
पेड़ों से गुज़रती हवाओं की सरसराहट
एक रहस्य है
खोलने बैठूं, तो
तुम्हारी ही आहट सुन जाता हूं.

एक गिलहरी
मेरी ओर प्यार से देखती है
एक गोरैया
फुदककर मेरे बाज़ू बैठती है
एक कली
खिलकर, मेरी ओर
थोड़ा रंग, थोड़ी ख़ुशबू उछालती है.
भला क्या करूं मैं, कि इन सबमें
मुझे तेरी शरारत झांकती-सी लगती है?

हर तरफ़, जो तुम ही तुम हो
कहां रखूं
मैं अपना प्यार तुमसे छुपाकर ?

सूरज पी. सिंह
A/301, हंसा अपार्टमेंट, साबेगांव रोड दिवा (पूर्व), थाणे, मुम्बई

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मैं तुम्हारी संगिनी हूँ : अनामिका घटक

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती अनामिका घटक की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

मुझे उस पर नहीं जाना
क्योंकि इस पार
मैं तुम्हारी संगिनी हूँ
उस पार निस्संग जीवन है.

स्वागत के लिए
इस पार मैं सहधर्मिणी
कहलाती हूँ
मातृत्व सुख से परिपूर्ण हूँ
मातापिता हैं देवता स्वरुप पूजने के लिए.

उस पार मै स्वाधीन हूँ
पर स्वाधीनता का
रसास्वादन एकाकी है
गरल सामान.

इस पार रिश्तों की पराधीनता मुझे
सहर्ष स्वीकार है
इस पार प्रिये तुम हो
मैं तुम्हारी संगिनी हूँ !!
************************************************************************************
नाम:अनामिका घटक

जन्मतिथि : २७-१२-१९७०

जन्मस्थान :वाराणसी

कर्मस्थान: नॉएडा

व्यवसाय : अर्द्धसरकारी संस्थान में कार्यरत.

शौक: साहित्य चर्चा , लेखन और शास्त्रीय संगीत में गहन रूचि.

ई-मेल : ghatak.27@gmail.com

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

छुअन : संगीता स्वरुप

स्मृति की मञ्जूषा से
एक और पन्ना
निकल आया है .
लिए हाथ में
पढ़ गयी हूँ विस्मृत
सी हुई मैं .

आँखों की लुनाई
छिपी नहीं थी
तुम्हारा वो एकटक देखना
सिहरा सा देता था मुझे
और मैं अक्सर
नज़रें चुरा लेती थी .

प्रातः बेला में
बगीचे में घूमते हुए
तोड़ ही तो लिया था
एक पीला गुलाब मैंने .
और ज्यों ही
केशों में टांकने के लिए
हाथ पीछे किया
कि थाम लिया था
गुलाब तुमने
और कहा कि
फूल क्या खुद
लगाये जाते हैं वेणी में ?
लाओ मैं लगा दूँ
मेरा हाथ
लरज कर रह गया था.
और तुमने
फूल लगाते लगाते ही
जड़ दिया था
एक चुम्बन
मेरी ग्रीवा पर .
आज भी गर्दन पर
तुम्हारे लबों की
छुअन का एहसास है .
******************************************
नाम- संगीता स्वरुप
जन्म- ७ मई १९५३
जन्म स्थान- रुड़की (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र)
व्यवसाय- गृहणी (पूर्व में केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका रह चुकी हूँ)
शौक- हिंदी साहित्य पढ़ने का, कुछ टूटा फूटा अभिव्यक्त भी कर लेती हूँ । कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ... मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं.
निवास स्थान- दिल्ली
ब्लॉग - गीत

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

वफ़ा के गीत : यशवंत माथुर

तेरी आँखों के ये आँसूं,मेरे दिल को भिगोते हैं,

तुझे याद कर-कर हम भी,रात-रात भर रोते हैं,

बिन तेरे चैन कहाँ,बिन तेरे रैन कहाँ,

जाएँ तो जाएँ कहाँ,हर जगह तेरा निशाँ,

तेरे लब जब थिरकते हैं,बहुत हम भी मचलते हैं,

चाहते हैं कुछ कहना,मगर कहने से डरते हैं॥


कितने हैं शायर यहाँ,कितने हैं गायक यहाँ,

मेरा है वजूद वहां,जाए तू जाए जहाँ,

कैसी ये प्रीत मेरी,कैसी ये रीत तेरी,

अर्ज़ है क़ुबूल कर ले,आज मोहब्बत मेरी,

तेरे अनमोल ये मोती,जाने क्यों क्यूँ यूँ बिखरते हैं,

अधरों से पीले इनको, वफ़ा के गीत कहते हैं॥
*************************************************************************
यशवंत माथुर, लखनऊ से. जीवन के 28 वें वर्ष में एक संघर्षरत युवक. व्यवहार से एक भावुक और सादगी पसंद इंसान.लिखना-पढना,संगीत सुनना,फोटोग्राफी,और घूमना-फिरना शौक हैं. पिताजी श्री विजय माथुर लेखन के क्षेत्र में प्रेरक एवं मार्गदर्शक हैं.अंतर्जाल पर जो मेरा मन कहे के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

प्रेम अक्षुण्ण रहे! : अनुपमा पाठक

दो दिल
एक एहसास से
बंध कर
जी लेते हैं!
मिले
जो भी गम
सहर्ष
पी लेते हैं!
क्यूंकि-
प्रेम
देता है
वो शक्ति
जो-
पर्वत सी
पीर को..
रजकण
बता देती है!
जीवन की
दुर्गम राहों को..
सुगम
बना देती है!

बस यह प्रेम
अक्षुण्ण रहे
प्रार्थना में
कह लेते हैं!
भावनाओं के
गगन पर
बादलों संग
बह लेते हैं!
क्यूंकि-
प्रेम देता है
वो निश्छल ऊँचाई
जो-
विस्तार को
अपने आँचल का..
श्रृंगार
बता देती है!
जिस गुलशन में
ठहर जाये
सुख का संसार
बसा देती है!
***********************************************************************************
अनुपमा पाठक, स्टाकहोम, स्वीडन.
अंतर्जाल पर अनुशील के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 28 मार्च 2011

गजल : उपेन्द्र 'उपेन'

शर्मा गई चांदनी जब रूख से नकाब हट देखा

इस ज़मीन पर भी एक सुंदर सा चाँद खिला देका

फ़ैल गयी हर जगह रोशनी रोशन हो उठी फिजां

बड़े आश्चर्य से सबने हुश्न -ऐ- चिराग जला देखा

छिपता फिर रहा चाँद बादलों में इधर से उधर

इस चाँद के आगे सबने उस चाँद को बुझा- बुझा देखा

छाई रही मस्ती मदहोश हो गए देखने वाले

रूक गयी धड़कने सबने वक्त भी रुका रुका देका

खामोश हो गया चाँद खामोश हो गयें उसके चर्चे

"उपेन्द्र " हर चर्चे में सिर्फ तेरा हुश्न शामिल हुआ देखा.
************************************************************************************
नाम-उपेन्द्र 'उपेन' । जन्म - 22 अक्टूबर सन् 1974 को आजमगढ़ में । प्रारंभिक तथा स्कूली शिक्षा आजमगढ़ में, फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. पू्र्वांचल विश्वविद्यालय (शिवली नेशनल कालेज,आजमगढ़) से हिन्दी साहित्य में पीजी एवं अन्नामलाई विश्वविद्यालय से विज्ञापन में पीजी डिप्लोमा। कविता-कहानी का लेखन एवं विज्ञापन में फ्रीलांसिग कापीराइटिंग भी । पचास के करीब कहानियां, कवितायें व लघुकथायें विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित। संप्रति- रक्षा मंत्रालय।
संपर्क : upen1100@yahoo.com
अंतर्जाल पर सृजन_शिखर के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 21 मार्च 2011

दिल क्यूँ चाहता है : अभिजीत शुक्ल

मैं जानता हूँ की ये सफ़र हमारा साथ कहीं छुड़ा देगा,


पर दिल क्यूँ चाहता है की तुम दो कदम साथ चलो?


मैं जानता हूँ सुबह का सूरज मुझे नींद से जगा देगा,


पर दिल क्यूँ चाहता है तुम इन आँखों में रात करो?


मैं जानता हूँ की प्यासा ही रह जाऊंगा मैं शायद,


पर दिल क्यूँ चाहता है तुम मेरी बरसात बनो?


मैं जानता हूँ अंत नहीं कोई इस सिलसिले का,


पर दिल क्यूँ चाहता है तुम इसकी शुरुआत करो !!
*************************************************************************************
नाम- अभिजीत शुक्ल
शिक्षा- B.Tech. (IT-BHU), PGDBM (XLRI)
वर्तमान शहर- जमशेदपुर
अंतर्जाल पर Reflections के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 14 मार्च 2011

तेरा इठलाना : मुकेश कुमार सिन्हा

ऐ नादान हसीना
क्यूं तेरा इठलाना
तेरा इतराना
ऐसे लगता है जैसे
बलखाती नदी की
हिलोंरे मरती लहरों
का ऊपर उठाना
और फिर नीचे गिरना


क्यूं तुम
फूलों से रंग चुरा कर
भागती हो शरमा कर
बलखा कर


क्यूँ तेरा हुश्न
होश उड़ाए
फिर नजरो से
दिल में छा जाये


क्यूं तेरे आने
की एक आहट
भर दे ख्यालो में
सतरंगी रंगत


क्यूं इसके
महके महके आलम से
इतने दीवाने
हो जाते हैं हम


क्यूं जगे अरमां
जो कहे फलक तक साथ चल
ऐ मेरे दिलनशी
हमसफ़र


पर क्यूं
दिलरुबा जैसे ही नजरों
से ओझल हुई
लगता है
चांदनी
बिखर गयी.....


फिर भी क्यूं
उसके जाने पर भी
खयालो में उसका अहसास
और उसकी तपिश
देती है एक शुकून....
एक अलग सी खुशबू
*************************************************************************
मुकेश कुमार सिन्हा झारखंड के धार्मिक राजधानी यानि देवघर (बैद्यनाथधाम) का रहने वाला हूँ! वैसे तो देवघर का नाम बहुतो ने सुना भी न होगा,पर यह शहर मेरे दिल मैं एक अजब से कसक पैदा करता है, ग्यारह ज्योतिर्लिंग और १०८ शक्ति पीठ में से एक है, पर मेरे लिए मेरा शहर मुझे अपने जवानी की याद दिलाता है, मुझे अपने कॉलेज की याद दिलाता है और कभी कभी मंदिर परिसर तथा शिव गंगा का तट याद दिलाता है,तो कभी दोस्तों के संग की गयी मस्तियाँ याद दिलाता है..काश वो शुकून इस मेट्रो यानि आदमियों के जंगल यानि दिल्ली मैं भी मिल पाता. पर सब कुछ सोचने से नहीं मिलता और जो मिला है उससे मैं खुश हूँ.क्योंकि इस बड़े से शहर मैं मेरी दुनिया अब सिमट कर मेरी पत्नी और अपने दोनों शैतानों (यशु-रिशु)के इर्द-गिर्द रह गयी है और अपने इस दुनिया में ही अब मस्त हूँ, खुश हूँ.अंतर्जाल पर जिंदगी की राहें के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 7 मार्च 2011

तेरा अहसास : सुमन 'मीत'

तेरा अहसास..‘मन’ मेरे

मेरे वजूद को

सम्पूर्ण बना देता है

और मैं

उस अहसास के

दायरे में सिमटी

बेतस लता सी

लिपट जाती हूँ

तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से

तब

मेरा वजूद

पा लेता है

एक

नया स्वरूप

उस तरंग सा

जो उभर आती है

शांत जल में

सूर्य की पहली किरण से

झिलमिलाती है ज्यूँ

हरी दूब में

ओस की नन्ही बूंद

तेरी वो खुली बाहें

मुझे समा लेती हैं

जब

अपने आगोश में

तो ‘मन’ मेरे

मेरा होना सार्थक

हो जाता है

मेरा अस्तित्व

पूर्णता पा जाता है

और उस

समर्पण से अभिभूत हो

मेरी रूह के

जर्रे जर्रे से

तेरी खुशबू आने लगती है

और

महक जाता है

मेरा रोम रोम......

पुलकित हो उठता है

एक ‘सुमन’ सा

तेरे अहसास का

ये दायरा

पहचान करा देता है

मेरी

मेरे वजूद से

और

मेरे शब्दों को

आकार दे देता है

मेरी कल्पना को

मूरत दे देता है....

मैं

उड़ने लगती हूँ

स्वछ्न्द गगन में

उन्मुक्त

तुम संग

निर्भीक ,निडर

उस पंछी समान

जिसकी उड़ान में

कोई बन्धन नहीं

बस हर तरफ

राहें ही राहें हों.....

‘मन’ मेरे

तेरा ये अहसास

मुझे खुद से मिला देता है

मुझे जीना सिखा देता है

‘मन’ मेरे.....

‘मन’ मेरे
*******************************************************************************

सुमन 'मीत'/मण्डी, हिमाचल प्रदेश/ मेरे बारे में-पूछी है मुझसे मेरी पहचान; भावों से घिरी हूँ इक इंसान; चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ; वादा है मेरा न छोडूगी हाथ; जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत; इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी “मीत”!अंतर्जाल पर बावरा मन के माध्यम से सक्रियता.

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

बाँसुरी प्रीति की - नीरजा द्विवेदी

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती नीरजा द्विवेदी जी की कविता. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा...

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
गुनगुनी धूप है सहला रही तन-बदन,
खिलखिलाती कली उड़ा रही है सुगन्ध,
सनसनाती हुई बह रही शीतल पवन,
अनसुनी प्रिय कथा सुना रही है मगन.

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
गुलाल किन्चती निशा, छुप गयी है गगन.
छुई-मुई सी उषा, लजा गयी बन दुल्हन.
प्रकृति ज्यों रति बनी, बढ़ा रही है अगन.
बयार सन्दली बही, जला रही तन-बदन.

बाँसुरी प्रीति की बजने लगी है विजन
सनसनी सी उठी, आओ न मेरे सजन.
धौंकनी श्वांस की बजा रही जल तरंग,
कामदेव तीर पर सजा रहे हैं सुमन,
करती नृत्य राधिका, ताल दे रहे मोहन,
जी की कैसे कहूँ, आओ न मेरे सजन.
**********************************************************************************
नामः नीरजा द्विवेदी/ शिक्षाः एम.ए.(इतिहास).वृत्तिः साहित्यकार एवं गीतकार. समाजोत्थान हेतु चिंतन एवं पारिवारिक समस्याओं के निवारण हेतु सक्रिय पहल कर अनेक परिवारों की समस्याओं का सफल निदान. सामाजिक एवं मानवीय सम्बंधों पर लेखन. ‘ज्ञान प्रसार संस्थान’ की अध्यक्ष एवं उसके तत्वावधान में निर्बल वर्ग के बच्चों हेतु निःशुल्क विद्यालय एवं पुस्तकालय का संचालन एवं शिक्षण कार्य.
प्रकाशन/ प्रसारण - कादम्बिनी, सरिता, मनोरमा, गृहशोभा, पुलिस पत्रिका, सुरभि समग्र आदि अनेकों पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में लेख, कहानियां, संस्मरण आदि प्रकाशित. भारत, ब्रिटेन एवं अमेरिका में कवि गोष्ठियों में काव्य पाठ, बी. बी. सी. एवं आकाशवाणी पर कविता/कहानी का पाठ। ‘
कैसेट जारी- गुनगुना उठे अधर’ नाम से गीतों का टी. सीरीज़ का कैसेट.
कृतियाँ- उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण एवं शोध विधाओं पर आठ पुस्तकें प्रकाशित- दादी माँ का चेहरा, पटाक्षेप, मानस की धुंध(कहानी संग्रह,कालचक्र से परे (उपन्यास, गाती जीवन वीणा, गुनगुना उठे अधर (कविता संग्रह), निष्ठा के शिखर बिंदु (संस्मरण), अशरीरी संसार (साक्षात्कार आधारित शोध पुस्तक). प्रकाश्य पुस्तकः अमेरिका प्रवास के संस्मरण.
सम्मानः विदुषी रत्न-अखिल भारतीय ब्रज साहित्य संगम, मथुरा, गीत विभा- साहित्यानंद परिषद, खीरी, आथर्स गिल्ड आफ़ इंडिया- 2001, गढ़-गंगा शिखर सम्मान- अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, भारत भारती- महाकोशल साहित्य एवं संस्कृति परिषद, जबलपुर, कलाश्री सम्मान, लखनऊ, महीयसी महादेवी वर्मा सम्मान- साहित्य प्रोत्साहन संस्थान लखनऊ, यू. पी. रत्न- आल इंडिया कान्फ़रेंस आफ़ इंटेलेक्चुअल्स, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान- सर्जना पुरस्कार.
अन्य- अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश पुलिस परिवार कल्याण समिति के रूप में उत्तर प्रदेश के पुलिसजन के कल्याणार्थ अतिश्लाघनीय कार्य. भारतीय लेखिका परिषद, लखनऊ एवं लेखिका संघ, दिल्ली की सक्रिय सदस्य.
संपर्क- 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर, लखनऊ. दूरभाषः 2304276 , neerjadewedy@yahoo.com

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

कैसे मीत बनूँ मैं तेरा : कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय‘


कैसे मीत बनूँ मैं तेरा।
काँटों भरा सफर है मेरा।।

कौन सारथी बने हमारा।
विरह सिन्धु में कौन सहारा ?
कैसे लड़ूँ वाहव्य वैरी से,
मैं अपनों से हारा।
क्या आयेगा पुनः सवेरा।।

कितना गम है किसे सुनाऊँ?
अपना सीना चीर दिखाऊँ।
कोई मुझे नहीं पढ़ पाया,
विवश भाव से होंठ चबाऊँ।
ऊपर से घनघोर अंधेरा।।

कैसे मीत बनूँ मैं तेरा।
काँटों भरा सफर है मेरा।।


कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय‘
ग्राम-सहिनवा पो0 गौसैसिंहपुर, सुल्तानपुर (उ0प्र0)